शुरुआत जेन एक्स से कर रही हूं, थोड़ा झेल लेना ब्रो!
डियर जेन ज़ी,
हम, जो जेन एक्स के हैं और तुम्हारे पैरेंट्स हैं, उनमें से मुझे ये मान लेने से मुझे गुरेज़ नहीं है कि हम तुम्हारे जितने बेबाक, सशक्त, विद्रोही और ज़िद के पक्के नहीं थे। दरअसल, हमारी परवरिश करने वाले हमारे पैरेंट्स ने दुनिया, समाज और संस्कारों की बेड़ियों के साथ हमें बड़ा किया। और इन बेड़ियों में मौजूद ख़ामियों की ओर ध्यान दिलाने और उसे ठीक करने के लिए हमने उनसे सवाल तो पूछे, पर हर बार उतनी शिद्दत से नहीं पूछे, जैसे कि पूछने चाहिए थे। लेकिन तुमने हमसे हर बार वो सवाल पूछे और पूरी शिद्दत से पूछे, खुलकर पूछे।
हम जेन एक्स वालों ने बहुत बदलाव देखे, फ़ोन, टीवी, कम्प्यूटर, Y2K, डेस्कटॉप पेजर, मोबाइल फ़ोन, लैपटॉप, स्मार्ट फ़ोन वगैरह और सबके साथ सामंजस्य बिठाया। हमारे पैरेंट्स ने हमें पढ़ाया-लिखाया भी। हमारी जनरेशन की महिलाओं ने ख़ुद को नौकरीपेशा बनाकर, घर भी संभालकर ये प्रूव किया कि महिलाओं को अवसर मिलें तो वो सब कुछ कर सकती हैं।
जब हम पैरेंट्स बने और तुम जेन ज़ी वाले इस दुनिया में आए तो हमने पाया कि तुम्हारे क्यों, क्या, कैसे– जैसे सवाल उसकी तुलना में कहीं ज़्यादा मज़बूत थे, जब हम बच्चे थे और अपने पैरेंट्स से ऐसे सवाल पूछा करते थे। अब चूंकि हम सतत बदलाव के साथ तालमेल बिठाने वाली जनरेशन से थे और एजुकेटेड भी तो हमने तुम्हारी क्यों, क्या, कैसे के सही जवाब इंटरनेट पर ढूंढ़े, विशेषज्ञों से पूछे और तुम्हें दिए।
जब आप किसी को उसके सवालों के सही जवाब देते हैं और वो जवाब उन्हें रुच जाते हैं तो सवाल पूछने वाला उस मुद्दे को और गहराई से जानना चाहता है। और तुम लोगों को तो यूं भी मोबाइल और इंटरनेट जैसी चीज़ें पैदा होने के साथ ही मिली थीं। तुम ज़्यादा इन्क्विज़िटिव हुए, तुमने अपने सवालों के जवाब ख़ुद भी इंटरनेट पर खंगाले और मिले हुए जवाबों को अपनी समझ से प्रॉसेस भी किया। तुम केवल स्कूल में पढ़ाए गए सलेबस में ही नहीं अटके रहे, तुमने इसके इतर भी बहुत कुछ देखा, सीखा और जाना। ज़ाहिर है, इंटरनेट के ज़रिए। और ये तुम्हारा अपना हासिल था/है।
इस नॉलेज से तुम और भी कॉन्फ़िडेंट हुए। और हमारी हर उस बात पर, जो हमने अपने पैरेंट्स की संस्कार वाली बेड़ियों से सीखकर तुम्हें समझाना/सिखाना चाहा, तुमने हमेशा वाजिब सवाल उठाए। जैसे-
हमने कहा – बड़ों की बात मानते हैं!
तुमने पूछा – सारी बातें? क्या बड़े ग़लत नहीं हो सकते? और यदि बड़े ग़लत हों तो भी? उन्हें ग़लत होने पर टोका क्यों नहीं जा सकता?
हमने कहा – बड़ों से तमीज़ से बात करो।
तुमने कहा – फिर उनका टोन भी तो तमीज़ भरा होना चाहिए। रिस्पेक्ट तो म्यूचुअल है, दोगे तो मिलेगा।
हमने कहा – लड़के रोते थोड़े ही हैं?
तुमने पूछा – क्यों? क्या उनके भीतर इमोशन्स नहीं होते?
हमने कहा – लड़कियों को इतनी रात तक बाहर नहीं रहना चाहिए।
तुमने पूछा – क्यों? यदि हमें लड़कों से ख़तरा है तो उन्हें बांधकर रखो, लड़कियों पर समय की पाबंदी क्यों लाद रहे हो?
तुम्हारे ऐसे जवाब सुन-सुनकर हमें हर बार कल्चरल शॉक लगते रहे, पर चूंकि हम एजुकेटेड थे, अडैप्ट करने की, तालमेल बिठाने की क्षमता थी हममें इसलिए जब भी गहराई से तुम्हारे जवाबों पर ग़ौर किया तो पाया कि तुम्हारे सवाल जायज़ हैं, अपनी जगह सही हैं। उनके जवाब ढूंढ़ने के क्रम में अक्सर हम तुमसे सहमत हुए बिना नहीं रह सके।
पर यक़ीन मानो, तुम्हें बड़ा करने के दौरान तुम्हारे विद्रोही स्वभाव ने हमें हमेशा इस डाउट में रखा कि पता नहीं हम तुम्हें सही परवरिश दे भी पा रहे हैं या नहीं। ये भी हम ही जानते हैं कि अपनी हर जायज़ मांग को पूरा करवाने के लिए तुम हमेशा अड़े रहे और अपने संस्कारों की बेड़ियों वाली परवरिश के बावजूद, तुम्हारी सही मांगों के आगे हम झुकते भी रहे, तुमसे सीखते भी रहे।
दरअसल, बच्चों और पैरेंट्स के बीच का रिश्ता ऐसा होता है कि दोनों ही एक-दूसरे से सीखते हैं। पहले तो बच्चे अपने पैरेंट्स से सीखते हैं, पर उन्हें सिखाते हुए पैरेंट्स भी तो पैरेंट्स बनना सीखते हैं न? फिर पैरेंट्स अपने बच्चों से भी बहुत कुछ सीखते हैं। हमने तुम्हें क्या सिखाया ये तो तुम बताओगे (कुछ तो बता ही चुके हो!) पर तुमने हमें क्या सिखाया (जो हमने शॉक लगा… शॉक लगा… शॉक लगा… गाते हुए सीखा), वो ये रहा:
– लिमिट्स और बाउंडरीज़ सेट करना
– सेल्फ़ रेस्पेक्ट को तवज्जो देना
– सही बात पर अड़ जाना, उसे मनवा लेना
– अपने हक़ के लिए लड़ना, साथ मिलकर लड़ना
– दूसरों के ओपिनियन को वैल्यू करना
– रिलेशनशिप्स को खुले नज़रिए से देखना
– दुनिया को लड़कियों के लिए महफ़ूज़ बनाना
और हां! शिक्षा को लेकर अपने हक़ के लिए जो आंदोलन तुमने किया, जिस बेबाकी से किया, जिस हौसले से किया, जिस दबंगता से किया और इस तरह डटे रहे कि वहां मौजूद लड़कियों को, युवतियों को किसी तरह की दहशत नहीं हुई, बल्कि सुरक्षित महसूस हुआ… हम पैरेंट्स/ जेन एक्स तुम्हें लेकर मुतमइन हैं कि इस दुनिया को, जहां कई अच्छी बातें भी हैं और कई मुश्क़िलात भी, एक समझदार और ज़िम्मेदार जनरेशन मिल गई है।
लव यू जेन ज़ी! प्राउड ऑफ़ यू!







