जो डलहौजी न कर पाया: आम आदमी के पक्षधर अदम गोंडवी की ग़ज़ल
वर्ष 1947 में आज ही के दिन यानी 22 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश के परसपुर (गोंडा) के आटा ग्राम में...
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वर्ष 1947 में आज ही के दिन यानी 22 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश के परसपुर (गोंडा) के आटा ग्राम में...
हमने आपको कई बार बताया है कि त्वचा और बालों की बाहरी देखभाल उन्हें उतना सेहतमंद और मज़बूत नहीं बनाती,...
विलायत से पढ़कर लौटे एक व्यक्ति को प्रेम का पाठ पढ़ा देती है एक भारतीय बाला. पढ़ें, गुरुदेव रबिंद्रनाथ टैगोर...
‘इन बूढ़े पहाड़ों पर, कुछ भी तो नहीं बदला’ गुलज़ार साहब का लिखा ग़ैरफ़िल्मी गीत है, जिसमें बीच-बीच में उनकी...
कहानी एक बेवा और शादी की उम्र की हो चुकीं उसकी दो बेटियों की. क्या-क्या नहीं किया बी-अम्मां ने बेटी...
समय बड़ा बलवान होता है. समय का पहिया जब चलता है, तब राजा को रंक और फटेहाल को करोड़पति बना...
त्यौहारों को ख़ास बनाने में मीठे पकवानों से बेहतर भला और क्या होगा. इस त्यौहारी सीज़न में पढ़ें, शेफ़ अल्तमश...
पत्रकार-कवि सुनील कुमार की यह कविता वैसे तो है बड़ी ही छोटी सी, पर इसके मायने बहुत बड़े हैं. क्यों...
जितनी तक़लीफ़ें, यातनाएं एक वृक्ष को सहनी पड़ती हैं, उतनी हम मनुष्यों को नहीं. फिर भी वृक्ष के बीज हमेशा...
भूख के सामने दुनियाभर के शबाब का कोई मोल नहीं होता, बता रही है अदम गोंडवी यह कविता. ज़ुल्फ़-अंगड़ाई-तबस्सुम-चांद-आईना-गुलाब भुखमरी...
हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.
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