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Home ज़रूर पढ़ें

फ़िक्शन अफ़लातून#10 द्वंद्व (लेखिका: संयुक्ता त्यागी)

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
March 17, 2023
in ज़रूर पढ़ें, नई कहानियां, बुक क्लब
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फ़िक्शन अफ़लातून#10 द्वंद्व (लेखिका: संयुक्ता त्यागी)
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कई बार, कुछ लोग, कुछ फ़ैसलों के लिए अपने लोगों को भी माफ़ नहीं कर पाते. उनके भीतर एक द्वंद्व चल रहा होता है, जिसमें वे अपने हिस्से के दुखों, अपने हिस्से के सच और समाज की सोच और समाज के नज़रिए को कहीं ज़्यादा वरीयता देना पसंद करते हैं. हमारे समाज में ही रह रहे ऐसे तबके के लोगों को उजागर करती कहानी.

‘‘केतकी… केतकी! कहां गई ये लड़की? सारे घर में ढूंढ़ लिया, पता नहीं कहां गई!” अपना मोबाइल उठाती सुनैना के मन में एक अनजाना डर समाने लगा था. रात के दस बज रहे थे और उसकी बीस साल की बेटी घर से बिना बताए ग़ायब थी. केतकी को फ़ोन किया तो स्विच ऑफ़ था. सुनैना को कुछ समझ नहीं आया. पति आलोक आज सुबह ही बेटे विशाल का एडमिशन करवाने हैदराबाद गए थे. सुनैना ने कांपते हाथों से आलोक को फ़ोन मिलाया.

“आलोक! केतकी घर पर नहीं है.”
“घर पर नहीं है… मतलब?”
“मैंने और उसने एक साथ डिनर किया था. खाने के बाद मैं किचन समेटने गई, वापस आकर सारे घर में केतकी को ढूढ़ लिया… कहीं नहीं मिली, फ़ोन भी ऑफ़ आ रहा है.” कहते हुए सुनैना की रुलाई छूट गई.
आलोक भी सकते में आ गए. इतनी रात को कहां गई होगी, कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी काम से निकली और किसी मुसीबत में फंस गई हो? हे भगवान! मैं भी घर से इतनी दूर हूं इस समय.
संतान की चिंता माता-पिता के लिए मौत से भी ज़्यादा भयावह होती है. ऐसी ही चिंता से आलोक और सुनैना जूझ रहे थे.

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“सुनैना तुम उसकी फ्रेंड्स को फ़ोन करके देखो. मैं मनोहर को बोलता हूं!”
“हम्म….” सुनैना की तो ज़बान जैसे हलक में अटक गई थी.
केतकी की दो-चार सहेलियों के नंबर थे सुनैना के फ़ोन में, उन्हें फ़ोन करने लगी फिर रुकी एक पल, ‘मेरे ऐसे पता करने से तो सबको उसके घर से ग़ायब होने का पता चल जाएगा, लेकिन अब और कोई रास्ता भी तो नहीं है.’ एक-एक कर सब को फ़ोन करने पर निराशा ही हाथ लगी. इतनी देर में दरवाज़े की घंटी बजी.

“केतकी!” कहती हुई सुनैना दरवाज़े की तरफ़ दौड़ी लेकिन उनके पड़ोसी और पारिवारिक मित्र मनोहर और उनकी पत्नी आरती थे. सुनैना आरती के गले लग बिलख उठी.
“हिम्मत से काम लिजिए भाभी जी, केतकी मिल जाएगी.” आरती ने सुनैना को संभालते हुए कहा.
उधर मनोहर आलोक से फ़ोन पर बात कर रहा था.
“पुलिस भी चौबीस घंटे से पहले रिपोर्ट नहीं लिखेगी आलोक. कहीं केतकी को कोई अगवा करके तो नहीं ले गया?”

उन लोगों की बातें सुन सुनैना की धड़कनें बेक़ाबू हो गई. ऐसा लग रहा था कोई शरीर से आत्मा को नोंच कर ले गया. मन में एक के बाद एक आशंकाएं सिर उठाने लगीं. कहीं किसी लड़के के चक्कर में तो नहीं थी केतकी! अगर ऐसा कुछ था भी तो मुझसे कभी ज़िक्र क्यों नहीं किया. कहीं कोई उसे धमका कर तो नहीं ले गया!” सोचते सोचते सिर की नसें जैसे फटने को तैयार हो गईं.

“भाभी जी! भाभी जी!” मनोहर के पुकारने पर सुनैना अपनी सोच से बाहर निकली.
“भाभी जी, आलोक को आपसे बात करनी है.” मनोहर से फ़ोन ले सुनैना ने फ़ोन कान पर लगा लिया.
“मेरी बात ध्यान से सुनो, कल मैं बैंक से विशाल के एडमिशन के लिए पैसे निकाल कर लाया था, उसमें से पचास हजार मैंने अलमारी में केतकी से ही रखवाए थे. ज़रा जाकर देखो और उसके डाक्यूमेंट्स भी चेक करो!”
“आप कहना क्या चाहते हैं आलोक? वो बेटी है हमारी! वो हमारे साथ ऐसा नहीं कर सकती,मुझे पूरा विश्वास है. ज़रूर उसे किसी ने किडनैप किया है.”
“सुनैना, इस समय परिस्थिति की मांग है कि हम देख लें कि ये दोनों चीज़ें घर पर हैं या नहीं! तुम देख कर आओ!”

सुनैना किसी तरह उठ कर अलमारी तक गई तो ज़रूर, लेकिन अंदर पैसे देखने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी. ‘अगर यहां पैसे नहीं मिले तो इसका मतलब होगा कि हमारी बेटी, अपने ही घर से चोरी करके पूरी प्लानिंग के साथ घर से गई है!’ अलमारी खोली और वहीं ज़मीन पर बैठ गई. मनोहर से इशारे से देखने के लिए कहा और आंखें बंद कर लीं.
“भाभी जी यहां पैसे नहीं हैं!” ऐसा लगा कि किसी ने पिघलता सीसा कानों में डाल दिया. केतकी तू हमारा विश्वास तोड़ गई. इससे तो मुझे ज़हर भी देती जाती. ग़लती तो मेरी ही है, जो तुझे सही परवरिश नहीं दे सकी.

आलोक का बताया दूसरा काम पूरा करने के लिए सुनैना ने केतकी की मेज की तरफ़ क़दम बढ़ा दिए. केतकी के डाक्यूमेंट्स भी नहीं थे. अब शक़ की कोई गुंजाइश नहीं बची थी. मनोहर ने आलोक को फ़ोन करके सारी बात बता दी. आलोक ने सुबह की पहली फ़्लाइट से आना तय किया. अब पुलिस में रिपोर्ट करवानी है या नहीं ये आने के बाद ही डिसाइड होना था.

“मम्मा दीदी! क्यों चली गई?” विशाल के सवाल से सुनैना निरुत्तर हो गई. कोई जवाब नहीं होता उस मां के पास, जिसकी बेटी घर छोड़ कर चली जाती है. वो मां ताउम्र ऐसी सज़ा को जीती है, जिसकी गुनहगार उसकी औलाद होती है.

मनोहर अपने घर चले गए, वहीं आरती सुनैना के साथ ही रुक गई. जानती थी एक मां दर्द में है. अपनी ही संतान के दिए दर्द में! अपनी ही कोख के दिए विश्वासघात के दुख में!

“भाभी जी, आप लेट जाइए. पूरी रात कैसे कटेगी?”

“तुम एक रात की बात करती हो आरती… पूरी ज़िंदगी कैसे कटेगी? अभी तो दुनिया-समाज और रिश्तेदारों के तंज, हिकारत भरी नज़रें और हमारी परवरिश को लेकर उठते सवालों का सामना करना है. इतना ही नहीं सारी उम्र इस बोझ के साथ कैसे जिऊंगी कि हमारी बेटी…हमारा ख़ून हमें छल कर चली गई!” सुनैना की पीड़ा का बांध टूट गया था, वो आरती की गोद में सिर रख कर फूट-फूट कर रो रही थी. दिल कर रहा था कि रो-रोकर आंसुओं के साथ हर दर्द को बहा दे.

“पता नहीं आरती, किसके साथ गई है केतकी? कौन है…कैसा है? जानती हो ना आजकल लड़कियों के साथ क्या क्या हो रहा है…बहला फुसलाकर ले जाते हैं और… और बेच देते हैं…” हुई सुनैना चिंता के कारण सफ़ेद पड़ गई. कल्पना मात्र से ही उसका रोम-रोम कांप उठा.

एक सदी सी लंबी रात के गहराने के साथ ही सुनैना के मन में दुःख, क्षोभ और चिंता भी गहराती जा रही थी. किसी तरह रात बीती,सुबह आलोक वापस आ गए.

“आलोक! क्यों उठाया हमारी केतकी ने ये क़दम?” आलोक के सीने से लगी सुनैना अब पत्थर सी होने लगी थी.
आलोक मनोहर को ले कर सीधे पुलिस स्टेशन पहुंचे और तक़रीबन एक घंटे बाद वापस लौटे.
“सुनैना!’ सिर्फ़ इतना कह आलोक ने सुनैना का हाथ थाम लिया और फफक पड़ा.
“उसने शादी कर ली है सुनैना… पुलिस स्टेशन में हमारे पहुंचने से पहले ही अपना मैरिज सर्टिफ़िकेट जमा करवा दिया था, जिससे हम कोई कार्रवाई ना कर सकें.”
“शादी… हमारी केतकी की शादी हो गई,आलोक! मैं तो केतकी के पैदा होते ही उसकी शादी के सपने देखने लगी थी और… और उसने शादी कर भी ली.” सुनैना दर्द और ग़ुस्से से बौखला गई.
“हां… कर ली उसने शादी. अपने किसी दोस्त से, दूसरे धर्म का था इसलिए हमें बताना या पूछना ज़रूरी नहीं समझा… क्या हम उसकी ज़िंदगी में इतनी ही अहमियत रखते थे, सुनैना? कैसे किसी लड़के का साल-छः महीने का प्यार हमारे निस्वार्थ वात्सल्य पर भारी पड़ सकता है!”

उस दिन आलोक और सुनैना जी भर कर रो लिए. शर्मदार मां बाप के लिए इससे ज़्यादा बदनामी का और कोई कारण नहीं हो सकता. जब औलाद नाम रोशन करती है तब मां बाप गर्व से छाती चौड़ी करके घूमते हैं, वहीं नाक कटवाने पर बिना ग़लती मुंह छुपाते हैं. उन रिश्तेदारों के भी फ़ोन आने लगे जिन्होंने सालों से सुध नहीं ली थी. घर से निकलने पर अपनी ओर उठती हर निगाह में उपहास या घृणा का मिलना कलेजा चीर जाता था.

“अच्छा हुआ आलोक कि विशाल यहां नहीं है… कैसे बर्दाश्त करता वो ये सब?”
“सुनैना, वह आज भले ही यहां नहीं है, लेकिन ये कालिख तो उसके चेहरे पर भी लग चुकी है जिसे लाख रगड़ने के बाद भी छुटा नहीं पाएगा… न वो और न हम!”
एक गहरी सांस ले आलोक ख़ामोश हो गया. आलोक अब अक्सर चुप रहता, अपने विचारों के द्वंद्व में घिरा हुआ… शायद इसीलिए ब्लडप्रेशर भी हाई रहने लगा. वहीं विशाल चाह कर भी पढ़ाई में मन नहीं लगा पा रहा था.

“भाभी, कुछ पता चला केतकी कहां है… कैसी है?”
“नहीं दीदी! ना हमें पता और ना ही जानना चाहते.”
“कैसी मां हो ,दिल नहीं तड़पता तुम्हारा अपनी बेटी के लिए? पता करो वो कहां है और अपना लो, आख़िर मां-बाप माफ़ नहीं करेंगे तो कौन करेगा?”

ननद की बात सुनैना के कलेजे में लगी. छोटी सी केतकी का चेहरा आंखों के सामने घूम गया. उसकी हंसी-शरारतें… हर एक बात याद आ रही थी. दिल कर रहा था कहीं से सामने आ जाए तो सीने से लगा लूं! मां का मन ऐसा ही होता है ममता बड़े से बड़े आघात को सहने के बाद भी जल्दी से मरती नहीं. सुनैना भी एक मां थी… ममत्व के द्वंद्व में घिरी मां.

आज तीन महीने बाद सुनैना के फ़ोन पर अनजान नंबर से कॉल आया…
“हैलो मम्मा!”
केतकी की आवाज़ को पहचानने में एक पल भी कहां लगा उसे.
“मम्मा… आप मुझ से बात नहीं करोगी? बेटी हूं आपकी… मानती हूं मुझसे ग़लती हो गई,अब तो माफ़ कर दो! मैं आपसे मिलना चाहती हूं.” बोलते हुए केतकी का गला भर्रा गया.

“बेटी! मेरी बेटी को मरे तीन महीने हो चुके हैं मैडम! आपको शायद पता नहीं वो जब घर से गई थी तो अपने मां-बाप को मरा हुआ समझ कर गई थी. सारी ज़िंदगी के लाड़ प्यार, विश्वास और संस्कार सबका गला घोंटने के बाद ही तो उसके क़दम दहलीज़ को पार कर पाए थे. रही बात ग़लती और माफ़ करने की तो सुनो… मां बाप अपने बच्चे से बेइंतहा प्यार करते हैं और इसलिए उनसे बच्चे की बड़ी से बड़ी ग़लती को माफ़ करने की उम्मीद की जाती है, लेकिन वो ऐसी संतान को क्यों माफ़ कर दें जो उन्हें चौराहे पर निर्वस्त्र कर गई? माफ़ी ग़लती के लिए मिलती हैं, गुनाह के लिए नहीं. मुझे रिश्ते की दुहाई देने से पहले अपने गुनाह को याद कर लो. मेरा हंसता-खेलता परिवार आज बर्बाद हो गया है. मेरे पति बीमार हैं और हमेशा अव्वल आने वाला मेरा बेटा पढ़ नहीं पा रहा! मेरा परिवार समाज से नज़रें नहीं मिला पा रहा और तुम मुझसे माफ़ी मांग रही हो? एक बात और बता देती हूं कि तुम जैसी लड़कियां मायका तो खो ही देतीं हैं, ससुराल भी उन्हें कभी नहीं अपना पाता. जिस सम्मान पर एक बहू का अधिकार होता है वो सम्मान, प्यार उन्हें सारी ज़िंदगी नहीं मिल पाता.
’’आज तो फ़ोन कर लिया है, आज के बाद कभी फ़ोन मत करना, क्योंकि तुम्हें अब इस घर से कुछ नहीं मिलेगा… माफ़ी भी नहीं!”

फ़ोन रख दिया सुनैना ने उसके भीतर का द्वंद्व शांत हो गया था.

फ़ोटो: पिन्टरेस्ट

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