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Home ज़रूर पढ़ें

फ़िक्शन अफ़लातून#14 मैं हार गई (लेखिका: मीता जोशी)

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
March 22, 2023
in ज़रूर पढ़ें, नई कहानियां, बुक क्लब
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फ़िक्शन अफ़लातून#14 मैं हार गई (लेखिका: मीता जोशी)
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रिश्तों में घुलने वाली ग़लतफ़हमियां और अहम् हमेशा ही रिश्तों के लिए घातक होते हैं. कई बार जब तक हम इन बातों को समझ पाते हैं, बहुत देर हो जाती है. हम चाह कर भी चीज़ों को वापस पहले जैसा नहीं कर सकते. इस बात को रेखांकित करती कहानी.

“मां, आज राखी है. सबके घर उनकी बुआ आई हैं. क्या मेरी कोई बुआ नहीं है?”
बिटिया के मुंह से बुआ शब्द सुन कुमुद की आंखें फटी की फटी रह गईं. प्रश्न भरी निगाहों से ऋषि की तरफ़ देखा. वो नज़रें चुरा रहा था.
ऋषि से बोली, “क्या जवाब दूं? बताइए न!”

दूर से, तरसती आंखों से मां भी बेटे के जवाब का इंतज़ार कर रही थी, फिर उसे दुविधा में देख बोली.
“बेटा, है ना तुम्हारी बुआ! बहुत दूर रहती है. जो बुआ पास होती है राखी पर वही आती है.”
पर बाल मन हठ पर अड़ गया तो कोई नहीं समझा सकता.
“उनकी फ़ोटो तो होगी जब वह यहां रहती होंगी तब तो पापा को राखी बांधती होंगी.”
दादी बोलीं, “ज़रूर दिखाऊंगी और भी बहुत सारी बातें बताऊंगी, लेकिन,चलो पहले अपने भाई को राखी बांधो.”
बिटिया उठी और तिलक का थाल ले पापा की ओर चल दी.
“पापा मेरी दोस्त उर्मि भी अपने पापा को बुआ की भेजी राखी बांधती है. अब से मैं आपको राखी बांधूंगी, तब-तक, जब-तक बुआ नहीं आती.”

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उसकी हठ से आज त्यौहार थोड़ा फीका-सा हो गया. ऐसा लग रहा था जैसे कोई विशाल बादल मंडरा रहे हों और लगातार आती बिजली की आवाज़ किसी आने वाले तूफ़ान के लिए आगाह कर रही हो.

बुआ और पापा के बचपन की फ़ोटो देख, उनके बचपन की ख़ूब सारी शरारतों की बातें सुन बिटिया रानी तो सो गई लेकिन घर में पुरानी यादों की बाढ़ सी लौट आई. लगा ज़ख़्म फिर हरे हो गए.

वही हाल बहन स्नेहा के घर भी था. दोनों बच्चों को राखी बांधते देख अपने बचपन को याद करने लगी. कई वर्षों से भाई को राखी नहीं बांधी है, पर हर साल, एक राखी, उनके नाम की निकाल कर रख देती और मन ही मन सोचती, ‘मिलूंगी तब हर एक राखी का हिसाब चुकता करूंगी. देखती हूं कितने दिन बहन से रूठ कर रहते हो.’

कई बार सोचती बड़ी हो गई हूं, दो बच्चों की मां. अब सब भुला दादा को फ़ोन कर लेती हूं .हिम्मत कर फ़ोन तक गई भी पर अपनी बात का स्मरण हो आया.
“कभी लौटकर नहीं आऊंगी आपकी चौखट पर.”

भाई को भी ताव आ गया था, “हां जाओ. एक बात याद रखना, एक बार नाराज़ होकर इस घर के दरवाज़े से बाहर निकलीं तो जीते जी अपना मुंह नहीं दिखाऊंगा.”
भाई के शब्द याद आते ही फ़ोन पर पहुंचा हाथ उसने पीछे कर लिया और पल्लू से आंखें पोछ अपनी भावनाओं को वही दबा दिया. हर साल की तरह यह साल भी बीत गया.
बच्चे बड़े होने लगे. तरह-तरह के प्रश्न पूछते और उन्हें उनकी उम्र के हिसाब से समझा दिया जाता.
मां कभी चोरी-छुपे स्नेहा को फ़ोन कर लेती और पीहर के हाल सुना देती. जानती थी कि स्नेहा मुंह से कभी नहीं कहेगी, लेकिन भाई के लिए भी जानने को उतनी ही आतुर होगी इसलिए मां पीहर की सारी कथा बांच देती, कहती, “तेरी फ़ोटो देख कर उसकी बिटिया कहती है, “पापा, बुआ तो बिल्कुल मेरे जैसी है. आप उन्हें भी उतना ही प्यार करते थे जितना मुझसे?”

यह सुन स्नेहा रुक ना पाई. भाई के मन तक पहुंचने का ये एक सुनहरा अवसर था. अपने आंसू दबाते हुए पूछ बैठी, “क्या कहा उन्होंने?”
उसने तपाक से जवाब दिया, “तुमसे भी ज़्यादा. मेरी प्यारी गुड़िया रानी थी वो. दादा-दादा कह, हर समय मेरे आगे-पीछे घूमती रहती थी…”
सब सुनने के बाद रुआंसी हो स्नेहा आदतन मां से कहती, “उनका क्यों बताए जा रही हो.मैं किसी को याद नहीं करती, मैंने मोह छोड़ दिया है. नहीं जानना चाहती मैं उनकी कोई बात.”

मां जानती थी आग दोनों तरफ़ बराबर है. बेटी के वाक्य सुन रो पड़ती, “क्यों री बिट्टो पहले तू बोल लेगी तो क्या होगा? बड़ा भाई है तेरा. पता नहीं जीते जी पूरे परिवार को एक होते ये आंखें देख भी पाएंगी या नहीं.”

बच्चे बड़े हो गए स्कूल से कॉलेज में आ गए. उम्र के साथ-साथ उनकी सोच बड़ी हो गई, दायरा बड़ा हो गया.

स्नेहा अक्सर अपने बच्चों को समझाती, “किसी भी बात को तूल दे आपस में बैर कभी मत करना.बा हर वाले तो फिर भी एक हो जाते हैं, अगर अपना रूठ जाए तो ‘पहले तुम’ की दीवार खड़ी हो जाती है.”
आज बच्चे दादी के पीछे पड़ गए. बुआ और पापा के न बोलने की वजह जानना चाहते थे. दादी को अपनी कसम दे उन्हें मजबूर कर दिया. दादी असमंजस में थीं, लेकिन बच्चों की हठ के आगे झुकना पड़ा.

“हां-हां बताती हूं. मैं नहीं बताऊंगी तो तुम्हें कौन बताएगा? बहुत प्यार करते थे दोनों एक-दूसरे से. एक-दूजे के बिना खाना, आना-जाना, पहनना, सोना सब हराम था.”

“दादी जब इतना प्यार था तो अचानक ऐसा क्या हुआ जो दोनों…”

एक बार तुम्हारे पापा का तबादला दूर हो गया.
वह जगह तुम्हारे ननिहाल से पास पड़ती थी इसलिए अक्सर वो छुट्टी में वहां निकल जाते. एक बार तीन-चार दिन की छुट्टी में वो यहां आने वाले थे. उन दिनों तुम्हारे दादाजी की तबियत भी थोड़ा नरम चल रही थी. अचानक तुम्हारे नाना जी की बीमारी की सूचना मिली. तुम्हारी मां अपने पीहर अक्सर तुम्हारे पापा को साथ लेकर ही जाती थी, क्योंकि वहां भी उन्हें संभालने वाला कोई न था. उन्हें वहां जाना पड़ा.
स्नेहा को ये सुन बड़ा बुरा लगा कि पापा बीमार हैं और भाई वहां चला गया है. मां अकेली है,वह कुछ नहीं कहती इसका मतलब ये तो नहीं की उनका यहां के प्रति कोई फ़र्ज़ नहीं. पता चला भाई ने वापस तबादला यहीं करवा लिया है. अब दो-तीन दिन ससुराल रह सास-ससुर को डॉ को दिखा समान लेकर ही आएगा. स्थिति से अनजान ऋषि को कहीं से भी आभास नहीं था कि पिताजी को दिखाना इतना ज़रूरी है. उसके ससुराल जाने के बाद अचानक यहां इनकी तबियत बिगड़ गई. जब तुम्हारे दादाजी को अटैक आ आया उस समय मेरे पास कोई न था. हॉस्पिटल देर से पहुंचने के कारण स्थिति पर क़ाबू नहीं पाया जा सका और तुम्हारे दादाजी… बस, इसी बात पर दोनों में मनमुटाव हो गया और एक खाई सी बन गई. आपसी बहस और खींचा-तानी ने खाई को और गहरा कर दिया.”

“ओह! ये तो बहुत बुरा हुआ दादी. ग़लती किसी की भी न थी. पर परिस्थिति ऐसी बनी कि इसे पापा का दुर्भाग्य ही कह सकते हैं.”

“हां बेटा दुर्भाग्य ही है. जिस दिन से स्नेहा गई मैंने कभी इसके चेहरे पर मुस्कान नहीं देखी.”
बच्चों ने आश्वासन दिया, “जल्दी ही सब ठीक होगा आप विश्वास रखो दादी.”

स्नेहा के बच्चे भी नानी से अब चोरी-छुपे बात कर लेते. चारों बच्चे आपस में भी संपर्क रखने लगे. इसकी कानों-कान किसी को ख़बर नहीं हुई. एक दिन बच्चों ने मिल सारी स्थिति भांप, पापा और बुआ को मिलाने का प्लान बनाया.

अपने पापा के मोबाइल से बुआ को बड़ा भावुक सा मैसेज लिखा जो कि पापा की डायरी में ही लिखा था, “मैं कभी नहीं कहूंगा, तो क्या तू कभी नहीं आएगी. तू मुझसे दूर चली गई तो क्या मैं तुझे भूल गया हूं. मेरे दिल में तेरी जगह कभी कोई और नहीं ले सकता. मैंने ग़ुस्से में चार शब्द क्या कह दिए. “कभी नहीं आऊंगी” कह चली गई. एक बार पलट कर भी नहीं बोली क्यों जाऊं मेरा भी तो घर है. क्या इतने सालों में तुझे कभी अपने दादा की याद नहीं आई. मेरी छोटी सी बहन इतनी बड़ी हो गई कि दादा के आगे, उसके अहम का कद बड़ा हो गया. चल मेरे झुकने में ही तेरी ख़ुशी है तो तू जीती मैं हार गया.”

और वही स्नेहा के बच्चों ने भी किया मां के मोबाइल से मामा को मैसेज किया जैसा कि वह मां की भावनाओं को इतने समय से पढ़ते आए थे, “हमेशा से मेरी ज़िद पूरी करते आए थे दादा. इतना लंबा समय बीत गया क्या कभी मन नहीं किया अपनी बहन की ज़िद पूरी करने का! आप तो कभी इतने ज़िद्दी नहीं थे. क्या इतने सालों में कभी आपको अपनी स्नेहा की याद नहीं आई?”

दोनों ने मैसेज पढ़ा और फफक कर रो पड़े. ऋषि ने कुमुद को कहा, “देखो मैं कहता था ना वो मुझे ज़रूर मैसेज करेगी. बेटी बड़ी होगी, विवाह बंधन में बंध जाएगी, तब उसे मेरी स्थिति समझ आएगी. खो उसका मैसेज आया है. मिलना चाहती है. अब मैं समय नहीं गंवाना चाहता. सामान पैक करो. उसमें उसकी पसंद की हर एक चीज रखो. मैं राखी पर उसके पास पहुंचने चाहता हूं.”

स्नेहा भी मैसेज पढ़ कम उत्साहित न थी, “मुझे विश्वास था दादा, आप जल्दी आओगे. मां बता रही थी बिटिया बिल्कुल मुझ पर गई है, अगर वह मेरा साया है तो अब आप ज़्यादा दिन मुझसे दूर नहीं रह सकते. आ रहा हूं कहने में इतनी देर क्यों कर दी दादा. जल्दी आओ मैं आपका इंतज़ार करूंगी.”

मैसेज का सिलसिला शुरू हुआ देख बच्चे बहुत ख़ुश थे. पापा रवाना हो गए उसमें वो अपनी-अपनी फ़तह महसूस कर रहे थे.

स्नेहा ने भी शिकायतों का पुलिंदा निकाल कर रख लिया. मौली निकाल, पूजा-थाल सजाई भाई के पसंद की हर एक चीज़ बनाई. ट्रेन दो बजे तक पहुंच जाएगी. वो बार-बार घड़ी देखती रही. बच्चे मां की बेचैनी देख रहे थे. अब उन्हें अपनी शरारत पर बड़ा गर्व महसूस हो रहा था. इतना ख़ुश, उत्साही और आंखों में नमी इतनी भावनाएं एक साथ उन्हें मां में पहली बार दिखाई दी. स्नेहा के पतिदेव भी बच्चों के साथ उनकी मीठी शरारत में शामिल थे.

जैसे ही डोर बेल बजी वह भाग, भाई से लिपट कर रोने को चल दी. देखा तो सामने पुलिस वाला खड़ा था. एक आई-कार्ड आगे दिखाता हुआ बोला, “हैदराबाद से आने वाली ट्रेन दुर्घटनाग्रस्त हो गई है. एक आदमी की पॉकेट से आपका ऐड्रेस और गले में ये लॉकेट मिला है. हॉस्पिटल ले गए, तब तक सांसे चल रही थी. लाश की शिनाख्त के लिए आपको आना होगा. ये आई-कार्ड है. क्या ये आपके कोई करीबी रिश्तेदार थे?”

लॉकेट खोल देखा तो स्नेहा की फ़ोटो थी. यह तो वही लॉकेट था जो दादा हमेशा पहना करते थे. वो स्तब्ध खड़ी रह गई. पांव में कंपन था. रोंगटे खड़े हो गए. दांतों की पंक्तियां जकड़ गईं. एक शब्द भी मुंह से नहीं निकल रहा था. बुत बनी रही. बच्चों पर तो जैसे पहाड़ ही टूट गया हो.

पति ने हिम्मत कर स्नेहा को संभाला. बच्चे मां को हॉस्पिटल ले जाने में पिता के साथ हो लिए.

शरीर पूरी तरह से कुचला हुआ था. बस चेहरे की मुस्कुराहट आज भी वही थी. ‘‘दादा!’’ कह ज़ोर से बिलख पड़ी, “क्यों दादा अपनी छोटी बहन से इतनी ज़िद! आख़िर अपनी बात मनवा कर ही माने “जीते जी मुंह नहीं दिखाऊंगा.” अब क्या’ मैं जी पाऊंगी मैं तो ख़ुद जीते जी मर गई.”

मां, भाभी, बच्चे सब आ गए थे. आज भरा-पूरा परिवार एक साथ था, पर जिसके कारण था बस वह इंसान ही नहीं था. सभी का दुख अपनी जगह था. पर स्नेहा, वो तो आपे में ही नहीं थी. जब होश आता बस एक ही रट लगाती, “आप जीत गए दादा, मैं जीत कर भी हार गई.”

संबंध मन के होते हैं. रिश्तों को अहम की बेड़ियां ना पहनाएं. ग़लतफ़हमी और नफ़रत एक धीमा ज़हर है, जो धीरे-धीरे रिश्तों को खोखला करता डालता है. मौजूदा परिस्थिति से सामंजस्य बैठाने की कोशिश करें. जो इंसान किसी और के लिए भी करने की क्षमता रखता है, वह स्वयं अपनों के लिए क्यों खड़ा नहीं होगा, यह विचार भी करें. रिश्तों को बिखरने न दें उन्हें सहेजने के बहाने ढूंढ़ें.

फ़ोटो: पिन्टरेस्ट

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