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आज की रात तुझे आख़िरी ख़त और लिख दूं: गोपालदास नीरज की कविता

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
July 19, 2021
in कविताएं, बुक क्लब
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आज की रात तुझे आख़िरी ख़त और लिख दूं: गोपालदास नीरज की कविता
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फ़िल्मों के मशहूर गीतकार रहे गोपालदास नीरस के जादुई शब्द दशकों तक हमें मंत्रमुग्ध करते रहें. सरल भाषा में जीवन की गहनतम फ़िलासफ़ी को बयां करना नीरज का अंदाज़ था. आम आदमी का गीतकार कहलाने वाले नीरज की एक रचना.

आज की रात तुझे आख़िरी ख़त और लिख दूं
कौन जाने यह दिया सुबह तक जले न जले?
बम बारूद के इस दौर में मालूम नहीं
ऐसी रंगीन हवा फिर कभी चले न चले

ज़िंदगी सिर्फ़ है ख़ुराक टैंक तोपों की
और इंसान है एक कारतूस गोली का
सभ्यता घूमती लाशों की इक नुमाइश है
और है रंग नया ख़ून नई होली का

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कौन जाने कि तेरी नर्गिसी आंखों में कल
स्वप्न सोए कि किसी स्वप्न का मरण सोए
और शैतान तेरे रेशमी आंचल से लिपट
चांद रोए कि किसी चांद का कफ़न रोए

कुछ नहीं ठीक है कल मौत की इस घाटी में
किस समय किसके सबेरे की शाम हो जाए
डोली तू द्वार सितारों के सजाए ही रहे
और ये बारात अंधेरे में कहीं खो जाए

मुफ़लिसी भूख ग़रीबी से दबे देश का दुख
डर है कल मुझको कहीं ख़ुद से न बाग़ी कर दे
ज़ुल्म की छांह में दम तोड़ती सांसों का लहू
स्वर में मेरे न कहीं आग अंगारे भर दे

चूड़ियां टूटी हुई नंगी सड़क की शायद
कल तेरे वास्ते कंगन न मुझे लाने दे
झुलसे बाग़ों का धुआं खोए हुए पात कुसुम
गोरे हाथों में न मेहंदी का रंग आने दें

यह भी मुमक़िन है कि कल उजड़े हुए गांव गली
मुझको फ़ुर्सत ही न दें तेरे निकट आने की
तेरी मदहोश नज़र की शराब पीने की
और उलझी हुई अलकें तेरी सुलझाने की

फिर अगर सूने पेड़ द्वार सिसकते आंगन
क्या करूंगा जो मेरे फ़र्ज़ को ललकार उठे?
जाना होगा ही अगर अपने सफ़र से थक कर
मेरी हमराह मेरे गीत को पुकार उठे

इसलिए आज तुझे आख़िरी ख़त और लिख दूं
आज मैं आग के दरिया में उतर जाऊंगा
गोरी-गोरी-सी तेरी संदली बांहों की क़सम
लौट आया तो तुझे चांद नया लाऊंगा

Illustration: Pinterest

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