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Home बुक क्लब कविताएं

औरतें: रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ की कविता

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
April 2, 2021
in कविताएं, बुक क्लब
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औरतें: रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ की कविता
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जेएनयू कैम्पस के अपने कवि रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’ अपनी कविताओं से समाज के दोहरे चेहरे को उघाड़ने में ज़रा भी रहम नहीं करते थे. ताउम्र समाज के दोगलेपन पर बोलते, लिखते रहे विद्रोही की यह कविता उन औरतों को समर्पित है, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपनी इच्छा से जान दे दी थी. घरेलू हिंसा के तमाम पहलुओं को समेटती अंदर तक झकझोर देनेवाली कविता है.

कुछ औरतों ने अपनी इच्छा से कूदकर जान दी थी
ऐसा पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज है
और कुछ औरतें अपनी इच्छा से चिता में जलकर मरी थीं
ऐसा धर्म की किताबों में लिखा हुआ है

मैं कवि हूं, कर्त्ता हूं
क्या जल्दी है

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मैं एक दिन पुलिस और पुरोहित दोनों को एक साथ
औरतों की अदालत में तलब करूंगा
और बीच की सारी अदालतों को मंसूख कर दूंगा

मैं उन दावों को भी मंसूख कर दूंगा
जो श्रीमानों ने औरतों और बच्चों के ख़िलाफ़ पेश किए हैं
मैं उन डिक्रियों को भी निरस्त कर दूंगा
जिन्हें लेकर फ़ौजें और तुलबा चलते हैं
मैं उन वसीयतों को खारिज कर दूंगा
जो दुर्बलों ने भुजबलों के नाम की होंगी

मैं उन औरतों को
जो अपनी इच्छा से कुएं में कूदकर और चिता में जलकर मरी हैं
फिर से ज़िंदा करूंगा और उनके बयानात
दोबारा कलमबंद करूंगा
कि कहीं कुछ छूट तो नहीं गया?
कहीं कुछ बाक़ी तो नहीं रह गया?
कि कहीं कोई भूल तो नहीं हुई?

क्योंकि मैं उस औरत के बारे में जानता हूं
जो अपने सात बित्ते की देह को एक बित्ते के आंगन में
ता-ज़िंदगी समोए रही और कभी बाहर झांका तक नहीं
और जब बाहर निकली तो वह कहीं उसकी लाश निकली
जो खुले में पसर गई है मां मेदिनी की तरह

औरत की लाश धरती माता की तरह होती है
जो खुले में फैल जाती है थानों से लेकर अदालतों तक

मैं देख रहा हूं कि जुल्म के सारे सबूतों को मिटाया जा रहा है
चंदन चर्चित मस्तक को उठाए हुए पुरोहित और तमगों से लैस
सीना फुलाए हुए सिपाही महाराज की जय बोल रहे हैं.

वे महाराज जो मर चुके हैं
महारानियां जो अपने सती होने का इंतज़ाम कर रही हैं
और जब महारानियां नहीं रहेंगी तो नौकरानियां क्या करेंगी?
इसलिए वे भी तैयारियां कर रही हैं

मुझे महारानियों से ज़्यादा चिंता नौकरानियों की होती है
जिनके पति ज़िंदा हैं और रो रहे हैं

कितना ख़राब लगता है एक औरत को अपने रोते हुए पति को छोड़कर मरना
जबकि मर्दों को रोती हुई स्त्री को मारना भी बुरा नहीं लगता

औरतें रोती जाती हैं, मरद मारते जाते हैं
औरतें रोती हैं, मरद और मारते हैं
औरतें ख़ूब ज़ोर से रोती हैं
मरद इतनी ज़ोर से मारते हैं कि वे मर जाती हैं

इतिहास में वह पहली औरत कौन थी जिसे सबसे पहले जलाया गया?
मैं नहीं जानता
लेकिन जो भी रही हो मेरी मां रही होगी,
मेरी चिंता यह है कि भविष्य में वह आख़िरी स्त्री कौन होगी
जिसे सबसे अंत में जलाया जाएगा?
मैं नहीं जानता
लेकिन जो भी होगी मेरी बेटी होगी
और यह मैं नहीं होने दूंगा

Illustration: Pinterest

Tags: Aaj ki KavitaHindi KavitaHindi PoemKavitaRamashankar Yadav ‘Vidrohi’Ramashankar Yadav ‘Vidrohi’ Poem CollectionRamashankar Yadav ‘Vidrohi’ Poetryआज की कविताऔरतेंकवितारमाशंकर यादव ‘विद्रोही’हिंदी कविताहिंदी के कविहोली कविता
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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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