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Home बुक क्लब कविताएं

भिक्षुक: सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कविता

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
November 13, 2021
in कविताएं, बुक क्लब
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भिक्षुक: सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कविता
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छायावादी कवि सूर्यकांत निराला की कविता ‘भिक्षुक’ में एक भिक्षुक का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया गया है. भिक्षुक और उसके दो बच्चे सड़क पर पड़ी जूठी पत्तलों से भूख मिटाने का प्रयास करते हैं पर वहां भी उनका दुर्भाग्य उनका साथ नहीं छोड़ता. पत्तलों पर कुत्ते झपट पड़ते हैं. निराला ने इस कविता में समाज में व्याप्त विषमता को रेखांकित किया है. साथ ही उन्होंने वंचित समाज को अभिमन्यू की तरह संघर्ष करने का आग्रह किया है.

वह आता
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता
पेट-पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी भर दाने को-भूख मिटाने को
मुंह फटी-पुरानी झोली को फैलाता
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता

साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाए,
बाएं से वे मलते हुए पेट को चलते,
और दाहिना दया दृष्टि-पाने की ओर बढ़ाए
भूख से सूख ओंठ जब जाते
दाता-भाग्य विधाता से क्या पाते?
घूंट आंसुओं के पीकर रह जाते

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चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सड़क पर खड़े हुए,
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए!
ठहरो, अहो मेरे हृदय में है अमृत, मैं सींच दूंगा
अभिमन्यु-जैसे हो सकोगे तुम
तुम्हारे दु:ख मैं अपने हृदय में खींच लूंगा

Illustration: Pinterest

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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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फ़ोन: +91 9967974469
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