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Home बुक क्लब कविताएं

ढलता सूरज, घटता चांद, बूढ़ा पेड़: राही मासूम रज़ा की कविता

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
January 9, 2021
in कविताएं, बुक क्लब
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ढलता सूरज, घटता चांद, बूढ़ा पेड़: राही मासूम रज़ा की कविता
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दिवंगत कवि-कथाकार राही मासूम रज़ा की रचनाएं अपनी संवेदनशीलता के लिए जानी जाती रही हैं. छोटी-सी कविता ‘ढलता सूरज, घटता चांद, बूढ़ा पेड़’ प्रतीकों के सहारे भौतिक दूरियों को धता बताती है.

जब भी मैं तुझको याद आऊं
तू ये सोच के दिल मत छोटा करना
मेरे-तेरे बीच न जाने कितना ज़ुबानों के दरिया हैं
कितनी तहज़ीबों के समंदर
धूप की झीलें
छांव के जंगल
तू इस दूरी से मत घबरा
क़ुर्बत का मौसम तो वही है,
देख तो दिल के अंदर!
दूरी चाहे जितनी भी हो
मैं तो तुझसे दूर नहीं हूं
ढलता सूरज बनकर तेरे घर में आख़िर कौन आता है
घटते चांद का भेस बदल कर
तेरी खिड़की पर मैं ही दस्तक देता हूं
और वो बूढ़ा पेड़ भी मैं हूं
जिसका साया
झुक कर तेरे सर का बोसा लेता है
जब
जब भी मैं तुझको याद आऊं
मरियम तू बस
ढलते सूरज,
घटते चांद की जानिब यूं ही देख लिया कर
और उस पेड़ की मीठी छांव से अपने आंसू पोंछ के आगे बढ़ जाया कर


कवि: राही मासूम रज़ा
कविता संग्रह: ग़रीबे-शहर
प्रकाशक: वाणी प्रकाशन

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Tags: Rahi Masoom Razaढलता सूरज घटता चांद बूढ़ा पेड़राही मासूम रज़ाराही मासूम रज़ा की कवितावाणी प्रकाशन
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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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ईमेल: oye.aflatoon@gmail.com
फ़ोन: +91 9967974469
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