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ओए अफ़लातून
Home बुक क्लब कविताएं

जूता: ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविता

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
May 10, 2022
in कविताएं, बुक क्लब
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सदियों तक समाज से दूर रही आबादी को आज़ादी के बाद एकबारगी सभी के साथ, उसी रफ़्तार से चलने के लिए कहा जाता है. चाहते हुए वे लोग पीछे रह जाते हैं. आख़िर क्या है इसका कारण, ओमप्रकाश वाल्मीकि की कविता ‘जूता’ सीधे शब्दों में बयां करती है.

हिकारत भरे शब्द चुभते हैं
त्वचा में
सुई की नोक की तरह
जब वे कहते हैं
साथ चलना है तो क़दम बढ़ाओ
जल्दी-जल्दी

जबकि मेरे लिए क़दम बढ़ाना
पहाड़ पर चढ़ने जैसा है
मेरे पांव ज़ख़्मी हैं
और जूता काट रहा है

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वे फिर कहते हैं
साथ चलना है तो क़दम बढ़ाओ
हमारे पीछे-पीछे आओ

मैं कहता हूं
पांव में तक़लीफ़ है
चलना दुश्वार है मेरे लिए
जूता काट रहा है

वे चीख़ते हैं
भाड़ में जाओ
तुम और तुम्हारा जूता
मैं कहना चाहता हूं
मैं भाड़ में नहीं
नरक में जीता हूं
पल-पल मरता हूं
जूता मुझे काटता है
उसका दर्द भी मैं ही जानता हूं

तुम्हारी महानता मेरे लिए स्याह अंधेरा है

वे चमचमाती नक्काशीदार छड़ी से
धकिया कर मुझे
आगे बढ़ जाते हैं

उनका रौद्र रूप
सौम्यता के आवरण में लिपट कर
दार्शनिक मुद्रा में बदल जाता है
और, मेरा आर्तनाद
सिसकियों में

मैं जानता हूं
मेरा दर्द तुम्हारे लिए चींटी जैसा
और तुम्हारा अपना दर्द पहाड़ जैसा

इसीलिए, मेरे और तुम्हारे बीच
एक फ़ासला है
जिसे लम्बाई में नहीं
समय से नापा जाएगा

Illustration: Pinterest

Tags: Aaj ki KavitaHindi KavitaHindi PoemJoota by Omprakash ValmikiKavitaOmprakash ValmikiOmprakash Valmiki Poetryआज की कविताओमप्रकाश वाल्मीकिओमप्रकाश वाल्मीकि की कविताओमप्रकाश वाल्मीकि के लेखकविताजूताहिंदी कविता
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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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फ़ोन: +91 9967974469
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