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महिला दिवस पर विशेष: शैलजा पाठक की कुछ छोटी कविताएं

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
March 8, 2021
in कविताएं, बुक क्लब
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महिला दिवस पर विशेष: शैलजा पाठक की कुछ छोटी कविताएं
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इन कविताओं में महिलाओं के जीवन से जुड़े हर पहलू को बहुत हौले से, लेकिन बहुत गहराई तक स्पर्श किया गया है. इतनी कोमलता से महिला विषयों को भीतर तक छूती ये कविताएं महिलाओं की व्यथा-कथा यूं दिखाती हैं, जैसे दर्पण दिखा रही हों. यही वजह है कि इन कविताओं से ज़हनी जुड़ाव होता चला जाता है. जितनी बार भी इन्हें पढ़ें आपको अपने आसपास की जान-पहचानी, अनजानी महिलाओं की ज़िंदगी के कई-कई आयाम दिखाई देते हैं और इनमें डूबते हुए कब आंखें नम हो गईं, कब मुस्कान आ गई आपको पता ही नहीं चलता.

… तो तितलियों के पंख और ज़्यादा सुर्ख़ हो जाते हैं

मायके में कभी कोई नहीं कहता
तुम्हारी ज़िन्दगी है
करो न अपने मन की
उन्होंने कहा गांठ बांध लो
मीठी जुबान और
सहने के सद्गुण से ही परिवार चलता है
***
हमारी अकेली
कोई सत्ता ही नहीं थी
अकेले कमरे,
अकेली अलमारी
और
अकेली डायरी
के सुख से वंचित रहा जीवन
***
पुरानी डायरी के
किसी गुलाबी पन्ने पर
एक शर्माती होली का
रंग पड़ा है
उस एक शक़ के बिला पर
जलती रही होलिका
***
हमने हमेशा
अपनी ग़लतियों की गाली
अकेले नहीं खाई
हमारा मायका इसमें साथ था
***
मायके की औकात से तो हमें
घरों के बर्तन ही धोने चाहिए थे
वो तो रानियों की सी किस्मत लिखी थी
रानियों से कब किसने पूछी उनकी व्यथा?
***
आख़िर क्या है मुझमें
जो तुझे बहुत अच्छा लगता है
मैं उससे पूछती
उसने कहा
यही
ये अनभिज्ञता
***
लड़कियां मुस्कराती हैं तो
तितलियों के पंख
और ज़्यादा सुर्ख़ हो जाते हैं
***
गले लगती लड़कियां
धरती की
सबसे सुंदर तस्वीर होती हैं
***
उनके हंसने से
फूल बाजार के
सभी अधखिले गुलाब
खिल जाते हैं
***
लड़कियां मिलती हैं
रसोई और घर
दूर बैठ इन्हें देखते हैं
इनकी बातों की लहर पर
इनके प्रेमी गोते लगाते हैं
***
ज़िन्दा रहने के लिए
ज़रूरी है
किसी उदास औरत को
कस कर गले लगाना
और कहना
हम ज़िन्दा औरतें हैं
हमने बंजर को सींचा है!
***
मेरे साथ मुस्कराती
वो भूल जाती है
रात की यातना
उसका मुस्कराना
इस धरती पर एहसान है!!

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