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जम्बक की डिबिया: शक़ और ग़लतफ़हमी की कहानी (लेखिका: सुभद्रा कुमारी चौहान)

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
March 23, 2022
in क्लासिक कहानियां, बुक क्लब
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जम्बक की डिबिया: शक़ और ग़लतफ़हमी की कहानी (लेखिका: सुभद्रा कुमारी चौहान)
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चोरी का शक़ सबसे सबसे पहले ग़रीब आदमी पर जाता है. शक़ और ग़लतफ़हमी की एक मार्मिक कहानी है सुभद्राकुमारी चौहान की जम्बक की डिबिया.

‘इस जम्बक की डिबिया से मैंने एक आदमी का ख़ून जो कर डाला है, इसलिए मैं इससे डरता हूं. मैं जानता हूं कि यही जम्बक की डिबिया मेरी मौत का कारण होगी,’ प्रोफ़ेसर साहब ने कहा और कुर्सी पर टिक गए. उसके बाद हम सभी लोगों ने उनसे पूछा,‘जम्बक की डिबिया से मनुष्य की हत्या आख़िर हो ही कैसे सकती है?’
सिगरेट बुझाकर ऐश-ट्रे पर फेंकते हुए प्रोफ़ेसर साहब ने कहा, बात उन दिनों की है जब मैं बी.ए. फ़ाइनल में पढ़ता था. केठानी हमारे घर का पुराना नौकर था, बड़ा मेहनती, बड़ा ईमानदार. महीनों हमारी मां जब घर के बाहर रहती थी, वह सारे घर की देखभाल करता था. एक चीज़ भी कभी इधर से उधर न हुआ था. एक बार यही बरसात के दिन थे. मेरी छोटी बहिन के शरीर पर लाल-लाल दाने से उठ आए थे औए उसके लिए मैं एक जम्बक की डिबिया ख़रीद लाया. मेरी मां मशीन के सामने बैठी कपड़े सी रही थी. आसपास बहुत से कपड़े पड़े थे. वहीं मैंने वह डिब्बी खोली. बहिन के दानों पर जहां-तहां लगाया और डिब्बी मां के हाथ में दे दी. पास ही केठानी खड़ा-खड़ा धुले हुए कपड़ों की तह लगा रहा था. जब मैं बहिन के दानों पर जम्बक लगा चुका तब केठानी ने उत्सुकता से पूछा,‘काय भैया! ई से ई सब अच्छो हुई जई हैं?’
मैंने कहां,‘हां खाज़, फोड़ा, फुंसी, जले-कटे सब जगह यह दवा काम आती है.’ इसके बाद केठानी अपने काम में लग गया और मैं बाहर चला गया.
शाम को जब मैं घूम कर लौटा तो देखा घर में एक अजीब प्रकार की चहल-पहल है. मां कह रही थी,‘बिना देखे कैसे किसी को कुछ कहा जा सकता है. कहां गई? कौन जाने.’
बड़ी बहिन कह रही थी,‘उसे छोड़कर और ले ही कौन सकता है. कल उसकी भावज आई थी न. उसके लड़के के सिर में भी बहुत सारी फुंसियां थीं.’
पिताजी कह रहे थे,‘कहीं महराजिन न ले गई हो. अखिल उससे कह रहा था यह गोरे होने की दवा है. लड़के भी तो तुम्हारे सीधे नहीं हैं.’
पास ही बैठा अखिल पढ़ रहा था. पिताजी की बात में दिलचस्पी लेते हुए वह बोला,‘बापू, महराजिन तो हमेशा गोरे होने की ही फिकर में रहती है. फिर मुझसे पूछा कि यह क्या है, सो मैंने भी कह दिया कि गोरे होने की दवा है.’
केठानी अपनी कोठरी में रोटी बना रहा था. उसे बुलाकर पूछा गया तो उसने कहा,‘जब भैया लगाई हती आपने तो तबै देखी रही, फिर हम नहीं देखन सरकार.’
मुझे क्रोध आ गया, बोला,‘तो डिबिया पंख लगाकर उड़ गई?’
केठानी ने मेरी तरफ़ देखा, बोला,‘भैया…’
मैंने कहा,‘चुप हो! मैं कुछ नहीं सुनना चाहता. सुबह मैं डिब्बी लाया और इस समय ग़ायब हो गई. यह सब तुम्हीं लोगों की बदमाशी है.’
केठानी कुछ न बोला वहीं खड़ा रहा और मैं अपने कमरे में चला गया. मैंने सुना, वह मां से कह रहा था,‘मालकिन चल के मोर कोठरी खोली देख लेई-मैं का करिहौं दवाई ले जाई के? फिर जऊन चीज लागी मैं मांग न लईहौं सरकार से?’
मैं कोट उतार रहा था. न जाने मुझे क्यों क्रोध आ गया और कमरे से निकल कर बोला,‘चले जाओ अपना हिसाब लेकर. हमें तुम्हारी ज़रूरत नहीं है…’
आख़िर मां ने बहुत समझाया पर हम सब भाई-बहिन न माने और मां ने केठानी को बहुत रोकना चाहा और वह यही कहता रहा,‘जब तक भैया माफ़ न कर देंगे, अपने मुंह से मुझसे रुकने को न कहेंगे, मैं न रहूंगा.’
और मैंने न केठानी से रुकने को कहा न वह रुका, हमारे घर की नौकरी छोड़कर वह चला गया. पर घर के सब लोगों को वह प्यार करता था. वह गया ज़रूर पर तन से गया मन से नहीं. मां को भी उसका अभाव बहुत खटका और मुझे तो सबसे ज़्यादा उसका अभाव खटका. वह मेरे कमरे को साफ़ रखता था, सजाकर रखता था, फूलों का गुलदस्ता नियम से बनाकर रखता था. मेरी ज़रूरतें बिना बताए समझ जाता और पूरी करता था, पर जिद्दी स्वभाव के कारण चाहते हुए भी मैं मां से कह न सका कि केठानी को बुला लो जो कि मैं ह्रदय से चाहता था. एक दिन मां ने कहा कि केठानी रायसाहब के बंगले पर गारा-मिट्टी का काम करता है. मैंने सुना, मेरे दिल पर ठेस लगी. बूढ़ा आदमी, डगमग पैर, भला वह गारा-मिट्टी का काम कैसे कर सकेगा? फिर भी चाहा की यदि मां कहे की केठानी को बुला लेती हूं तो मैं इस बार ज़रूर कह दूंगा की हां बुला लो पर इस बार मां ने केवल उसके गारा-मिट्टी ढोने की ख़बर भर दी और उसे फिर से नौकर रखने का प्रस्ताव न किया. एक दिन मैं कॉलेज जा रहा था. देखा केठानी सिर पर गारे का तसला रखे चाली पर से कारीगरों को दे रहा है. चालीस फ़ुट ऊपर चाली पर चढ़ा आह बूढ़ा केठानी, खड़ा काम कर रहा था. मेरी अंतरात्मा ने मुझे काटा. यह सब मेरे कारण है और मैंने निश्चय कर लिया कि शाम को लौट कर मां से कहूंगा अब केठानी को बुला लो. वह बहुत बूढ़ा और कमज़ोर हो गया है. इतनी कड़ी सज़ा उसे न मिलनी चाहिए. दिन भर मुझे उसका ख़्याल बना रहा. शाम ज़रा जल्दी लौटा. रास्ते पर ही रायसाहब का घर था. मजदूरों में विशेष प्रकार की हलचल थी. सुना कि एक मजदूर चाली पर से गिरकर मर गया. पास जाकर देखा वह केठानी था. मेरा हृदय एक आदमी की हत्या के बोझ से बोझिल हो उठा. घर आकर मां से सब कुछ कहा,‘मां उसके कफ़न के लिए कोई नया कपड़ा निकाल दो!’
मां अपने सीने वाली पोटली उठा लाईं. नया कपड़ा निकलने के लिए उन्होंने ज्यों ही पोटली खोली जम्बक की डिबिया खट से गिर पड़ी.

Illustration: Pinterest

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