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कैलाशी नानी: कहानी एक हिम्मती महिला की (लेखिका: सुभद्रा कुमारी चौहान)

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
August 8, 2022
in क्लासिक कहानियां, बुक क्लब
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SubhadraKumari-Chauhan_Kahaniyan
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एक ग़रीब, बुज़ुर्ग और अकेली महिला के लिए ज़िंदगी कितनी मुश्क़िल हो सकती है, हम इसकी कल्पना कर सकते हैं. ऐसे में किसी महिला से ग़लत काम के ख़िलाफ़ डटकर खड़े होने की उम्मीद शायद ही कोई करे. पर इस कहानी की नायिका कैलाशी नानी एक अद्भुत हिम्मती महिला हैं.

पता नहीं मेरी कैलाशी नानी अब इस संसार में है भी कि नहीं, परंतु उनकी स्मृति इतनी ताज़ा है कि आज भी कैलाशी नानी वही अपनी मैली-सी घुटने के ऊपर तक की धोती और फटी हुई मिरज़ई पहने, बगल में रोटी और नमक की पोटली संभाले और हाथों में गायों के हांकने का डंडा लिए न जाने कितनी बार आंखों के सामने घूमती हुई दिख जाती हैं. वह गंवार अनपढ़ स्त्री, जिसे अक्षर का भी ज्ञान न था सहज ही भुला देने योग्य न थी. मेरी नानी न होकर भी वह मेरी नानी थी. मेरे मामा के गांव में, मामा के घर से हटकर उनका छोटा-सा झोंपड़ा था, लिपा-पुता, साफ़. उस झोंपड़े में न तो कोई दरवाज़ा था, जो कभी बंद हो सके और न ही दूसरा कोई सामान. बरतनों के नाम पर कुछ मिट्टी के ठीकरे थे और बिस्तर की जगह थोड़ा पुआल पड़ा था. यही मेरी कैलाशी नानी की गृहस्थी थी. पड़ोसी ही उनके परिवार वाले थे और गांव के बच्चे उनके परमेश्वर.
हां, तो मेरी कैलाशी नानी, उस गांव के रहनेवालों के जानवर चराने ले जाया करती थीं. उस गांव में क़रीब चालीस घर थे और प्रत्येक घर से एक सेर अनाज चराई में मिल जाया करता था. कैलाशी नानी की जीविका यही थी. इसी में कैलाशी नानी का दान-पुण्य हो जाया करता था और इसी अनाज को बदलकर उन्हें रोज़ के व्यवहार के लिए नमक, मिर्च, मसाला भी लेना पड़ता था. पैसे तो गांव वालों को वैसे ही बड़ी कठिनाई से देखने को मिलते हैं. कैलाशी नानी की तरह ग़रीबनी को पैसों का दर्शन दुर्लभ होना ही चाहिए.
इस प्रकार जीवन बिताकर भी कैलाशी नानी दुखी न थी. वे सदा प्रसन्‍न और हंसती रहती थीं. दूसरों की सेवा के लिए तत्पर रहतीं. आधी रात को भी बुला लो तो वह तुम्हारा काम कर देगीं और तुमसे किसी प्रकार की आशा न रखेंगी.
जाड़े के दिन शुरू थे. एक दिन मामा के गांव से एक आदमी संदेशा लेकर आया कि मामा ने मां और बच्चों को बुलवाया है. जब तक मां ने मामा के घर चलने को तैयारी न कर डाली, तब तक हम भाई-बहनों ने उन्हें तंग कर डाला. सबसे बड़ा भाई मैट्रिक में था इसलिए उसे छोड़कर हम सभी भाई-बहनों को लेकर आख़िर एक दिन मां मामा के घर आ गई. मां के साथ आने वाले भाई-बहनों में मैं सबसे बड़ी थी. मेरी उम्र दस-ग्यारह वर्ष थी. हम भाई-बहनों को मामा के घर में और तो कुछ अच्छा न लगता, पर मामा के घर से सौ फ़ुट दूर एक नदी बहती थी, उसमें नहाने और कैलाशी नानी के साथ ढोर चराने के लिए जाने में बड़ा आनंद आता था. कैलाशी नानी जिस जगह ढोरों को ले जाती थीं, वहां दूर तक जहां तक दृष्टि जाती सब हरा ही हरा दिखायी पड़ता था. दूर-दूर तक आम-पीपल और ढाक के वृक्ष थे. इनकी घनी छाया में दोपहर को आराम करते. गांव के छोटे बच्चों का एक झुंड नानी के नेतृत्व में ढोर चराने निकल जाता. वहां केवल ढोर ही न चराए जाते थे, वहां कहानियां भी कही जातीं, पहेलियां पूछी जातीं और कभी-कभी रामलीला का खेल भी खेलते. हम भाई-बहनों को इस ग्रामीण जीवन में बहुत सुख मिलता. एक भाई बहुत छोटा था. वह तो मां के साथ ही रहता था. हम तीन भाई-बहन प्राय: रोज़ कैलाशी नानी के साथ जंगल में भाग जाते.
मुझे याद है हम लोग घर के अच्छे से अच्छे भोजन को यह कहकर छोड़ देते थे कि अच्छा नहीं बना और सच ही वह अच्छा न लगता था. कैलाशी नानी की जंगल में सूखी रोटियां नमक या कभी चटनी के साथ खाने में जितना स्वाद आता था, उतना स्वाद कभी किसी भोजन में नहीं आया. रोटियां भी गेहूं की नहीं; न जाने किस तरह के नाज मिलाकर बनायी जाती थीं. कैलाशी नानी को हर घर से एक ही नाज तो मिलता न था; कहीं गेहूं कहीं जौ, ज्वार, मक्का, उड़द, मूंग, अरहर सब मिलाकर इकट्ठा कर देती और रोज़, आवश्यकतानुसार किसी की चक्की से पीस लाती और दूसरे दिन के लिए रोटियां सेक रखतीं यही उनका प्रतिदिन का आहार था. यही रोटियां वह सबको खिलाती थीं, और हम लोग बड़े स्वाद से खाते थे! कभी-कभी गांव के दूसरे बच्चे नदी में धोती फैलाकर मछली भूनते. उस दिन कैलाशी नानी रोटी भी न खाती. सत्तू खाकर ही रह जाती.
इसी प्रकार एक दिन हम लोग कैलाशी नानी के साथ हार पर गए थे. उस दिन कैलाशी नानी ने राजा-रानी की कहानी सुनाई थी. राजा की एक राजकुमारी थी, बड़ी सुंदर बड़ी नेक! किंतु एक दिन जब वह नदी पर नहा रही थी तब परियों के देश के राजा का राजकुमार आया और राजकुमारी को घोड़े पर बैठाकर ले भागा. कहानी सुनने के बाद, कलेवा से पहिले, हम लोग बड़ी देर तक नहाते थे और तैरते थे. पानी बहुत गहरा न था पर बड़ा साफ़ था. नदी में नहाने का ही प्रलोभन हमें रोज़ यहां घसीट लाता.
हां, तो उस दिन नहाते-नहाते मुझे यही डर लग रहा था कि कहीं परियों के देश का राजकुमार न आ जाए. वहां राजकुमार तो न आया, परंतु, जब नहा-धोकर लौटी, तो देखा कि कैलाशी नानी के पास कोई बैठा है. कपड़े जरा साफ-सुथरे थे. मैं डरी कि कहीं यही तो वह राजकुमार नहीं है. फिर घबराकर दूर तक नज़र दौड़ाकर देखा, कहीं भी कोई घोड़ा न दिखा. मैं बेफ़िक्र हो गयी कि यह राजकुमार नहीं है वह होता तो घोड़ा जरूर होता.
बाद में कैलाशी नानी से मालूम हुआ कि वह गांव का ज़मींदार है और कैलाशी नानी को हर महीने ढोर चरवाई में पांच सेर अनाज देता है. वह वहीं हम लोगों के पास ही पीपल के पेड़ की जड़ पर बैठ गया और हम सब भाई-बहिनों के बारे में कैलाशी नानी से बातचीत करने लगा.
जब उसे यह मालूम हुआ कि अभी तक मेरी शादी नहीं हुई, तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ. क्योंकि गांव में तो उस समय लड़की के पैदा होते ही ब्याह की बातचीत हो जाती. और तीन-चार साल की होते-होते तो उसका ब्याह भी हो जाता था. उसने स्वर को धीमा करके कैलाशी नानी से कहा कि क्या कुल में कोई दाग़ है जो इतनी बड़ी लड़की अब तक कुंआरी है?
कैलाशी नानी ने कहा, नहीं भैया, कुल में दाग-वाग कुछ नहीं है. बड़े आदमी हैं. लड़की-लड़के सभी मदरसे में पढ़ते हैं. यही बिटिया रामायण बांच लेती है. अंग्रेज पढ़ती है. जब पढ़ लेगी तब लायक वर देखकर ब्याह करेंगे.
वह ज़मींदार जितनी देर तक बैठा रहा. बार-बार हमें ही देखता रहा.
दूसरे दिन जब कैलाशी नानी ढोर ढीलने आई तो छोटे भाई-बहन अभी सोकर नहीं उठे थे. इसलिए मैं अकेली ही नानी के साथ निकल गई. कलेवा करने से पहले हम सब बच्चे फिर नदी पर नहाने गए. जब हम जा रहे थे, तभी वह ज़मींदार फिर आया. वह कैलाशी नानी को बड़ी देर तक कुछ समझाता रहा. उसे कैलाशी नानी ने हाथ जोड़कर कुछ अस्वीकार किया. ज़मींदार ने कुछ न सुनकर नानी के पल्लू में ज़बरदस्ती कुछ बांध दिया.
हम लोग भी रोटी खाने आए पर आज कैलाशी नानी रोज़ की तरह ख़ुश न थी. उनके चेहरे पर एक तरह की उदासी थी जो छिपाए न छिपती थी. उन्होंने हमें खिलाया पिलाया और फिर कहानी सुनाने बैठीं, किंतु कहानी में उनका मन न लगा. अन्य दिनों की तरह जब मैं बच्चों के साथ ढोर हांकने जाने लगी तो जाने न दिया. उन्होंने मुझे अपने पास ही बिठाए रखा. मैंने ज़िद की तो मुझे डांट भी दिया.
शाम हो चुकी थी. मां तुलसी के पास दिया जला रही थीं. कैलाशी नानी छिपती हुई-सी मां के पास आईं और इशारे से बुलाकर अलग कमरे में ले गई. उन्होंने मां से कहा कि वह अपने बच्चों समेत जल्दी से जल्दी घर वापस चली जाए. कारण कि वह ज़मींदार हम दोनों बहनों को अपने नालायक पुत्रों की वधू बनाना चाहता है. ज़मींदार का मेरे मामा से बहुत दिनों से बैर चला आ रहा था. शायद वह अपने इस बैर का बदला इस प्रकार लेना चाहता है. वह चाहता है कि कैलाशी के साथ ढोर चराने जाने पर वह हम दोनों बहनों की मांग में अपने पुत्रों से सिंदूर भरवा दे. इस प्रकार हम दोनों बहनें उसकी पुत्र-वधुएं बन जाएंगी. मामा जानकर भी कुछ न कर सकेंगे. इस काम में वाह कैलाशी नानी की सहायता लेना चाहता था, इसलिए दस रुपए उनके पल्लू में जबरदस्ती बांध दिए थे. चालीस रुपए काम पूरा हो जाने पर देने का वादा किया था.
कैलाशी नानी ने शपथ लेते हुए वह दस रुपए कमर से निकालकर मां को दिखाए और फिर बोली,‘‘बिटिया झूठ नहीं कहती मेरे पास तो दस पैसे भी नहीं फिर ये दस कलदार कहां से आए? ये उसी अधर्मी ने बांध दिए हैं. तुम बिटिया को लेकर चली जाओ. जिस गांव का ज़मींदार इतना अधर्मी है, तुम यहां फिर न आना. बिटिया का शादी-ब्याह करके ससुराल भेजकर ही फिर आना.’’
कैलाशी ने यह भी कहा कि वह हमारे जाते ही इन रुपयों को ज़मींदार के आगे फेंक देगी. अधर्म का पैसा वह कभी स्वीकार न करेगी.
मुझे याद आया कि एक दिन इकन्‍नी लेकर मैं नानी के साथ चली गई और कैलाशी नानी ने मुझसे लेकर वह बहुत संभालकर रख ली और शाम को लौटकर वह मां को वापिस कर दी.
मां ने जब वह इकन्‍नी उन्हीं को वापस दे दी तो कैलाशी नानी के चेहरे से ऐसा भाव टपक रहा था-जैसे उन्हें कहीं का ख़ज़ाना मिल गया हो. कई बार इकन्‍नी को उलट-पुलट कर देखने के बाद कैलाशी नानी ने उसे कमर में खोंस लिया. मां को जाने कितने आशीर्वाद देती हुई वह गई थीं.
वही कैलाशी नानी आज कमर में दस कलदार बांधे थीं. कल ज़रा-सी बात पर चालीस रुपए और मिलने वाले थे. पर कैलाशी नानी अधर्म का पैसा नहीं लेना चाहती थीं. उन्होंने कहा कि अगले दिन वह हमें वहां से भेजे बिना ढोर चराने नहीं जाएगी और जमींदार के रुपए उसके दरवाज़े पर जाकर फेंक देंगी, फिर तो चाहे वह महीने का पांच सेर अनाज भी बंद कर दे; कैलाशी डरती नहीं. वह कहीं भी जाकर ढोर चराकर पेट पाल लेगी. मां उसकी बात पर विश्वास नहीं कर पा रही थी. कोई कैसे उनकी पुत्रियों की मांग में सिंदूर भरकर घर में रख लेगा. मेरे पिता जी प्रसिद्ध वक़ील हैं. वे ज़मींदार को जेलखाने की हवा खिला सकते थे, फिर भी मां कैलाशी नानी के आग्रह को न टाल सकीं. दूसरे दिन वह हमें लेकर घर चली आईं.
तब से आज तक कैलाशी नानी का हमें कोई समाचार नहीं मिला था.

Illustration: Pinterest

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