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राखी: डॉ संगीता झा की कहानी

डॉ संगीता झा by डॉ संगीता झा
August 23, 2021
in नई कहानियां, बुक क्लब
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राखी: डॉ संगीता झा की कहानी
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जहां कोरोना ने पूरी दुनिया को अपने क़हर से घुटनों पर ला दिया, वहीं इसी कोरोना की दूसरी लहर के बीच अस्पताल में मुर्दों को लपेटने का काम करते बिसाहू की ज़िंदगी को भी बदल कर रख दिया. बिसाहू और उसकी दो बहनों की यह दिल छू लेनेवाली कहानी कोरोना महामारी के कुछ सकारात्मक मानवीय पक्षों को सामने लाती है.

“बाइस तारीख़ के राखी के तिहार हे, तै आवत हस ना?”
“नइ बहिनी ये बार नइ आऊं. कोरोना ला देख ,डर्राथो’’
“अरे कतेक डरबे, अभी तो कम हे. एक तो हमर भाई हे. ए बार खूब अच्छा राखी तिहार खूब अच्छा से करबो.”
ये दो बहिनों के बीच की बात थी. एक उसे राखी के लिए मायके आने का निमंत्रण दे रही थी और दूसरी कोरोना के डर से मना कर रही थी. राखी का त्योहार बहनों के लिए बड़ा मायने रखता है. छोटे तबके में तो बहनें बिचारी एक तो भाई से मिलती हैं दूसरा भाई अगर अच्छा तोहफ़ा दे दे तो ससुराल में अपनी इज्जत भी बढ़ा लेती है. ये कहानी है बिसाहू, कुंती और दुलारी की.
बिसाहू अकेला भाई है, गांव छोड़ शहर आ गया है बरसों पहले. पास के गांव में उसकी छोटी बहन कुंती रहती है अपने पति के साथ. पति सोहन की थोड़ी खेती है और दूसरों के खेतों में काम कर गुज़र बसर हो जाती है. बड़ी बहन दुलारी का पति पन्ना उसी की तरह दूसरे अस्पताल में सफ़ाई कर्मचारी है. कुंती का भरा पूरा परिवार है जिसमें सास-ससुर के अलावा चाचा ससुर भी हैं. चाचा का कोई लड़का ना होने से उनके हिस्से की खेती भी सोहन को ही मिली पर तीन चचेरी बहिनों की ज़िम्मेदारी के साथ. इससे कुंती हमेशा परेशान ही रहती थी.
बिसाहू जिस अस्पताल में काम करता था वहां से मिलने वाली तनख़्वाह और प्राइवेट रूम के मरीज़ों से मिलने वाली बख़्शीश से घर और बच्चों की पढ़ाई चल जाती थी. पत्नी प्रेमिन को दोनों बहनें फूटी आंख ना सुहाती थी. छोटी कुंती बेचारी तो अपनी पारिवारिक ज़िम्मेदारी में इतनी मसरूफ़ थी कि साल में एकाध बार ही आ पाती थी. बड़ी बहन दुलारी तो उसी शहर में रहने से लगभग रोज़ ही सेंध लगाने आ जाती और हर बार ताना मार के जाती. भाई को याद दिलाती कि किस तरह मां बाप के हैज़ा से मर जाने के बाद मां बन उसने दोनों भाई बहन को पाला. प्रेमिन मन ही मन सोचती ‘तो कौन सा कलेक्टर बनाया, सफ़ाई कर्मचारी बन अस्पताल में भाई लोगों का मैला ही तो साफ़ करता है.’ बिसाहू बार-बार समझाता,‘‘तै काबर मन ला खराब कर थस. मोला महतारी असन पाले हे वो हे तो मे हों, नई तो तोला मिलतेऊ का में’’ (तुम अपना मन क्यों ख़राब करती हो? मुझे मां जैसे ही पाला है. वो है तो मैं हूं, नहीं तो मैं कहां से मिलता तुझे)
बिसाहू हमेशा सोचता था कि राखी, तीज में बहनों को कुछ अच्छा उपहार देगा. लेकिन छोटी-सी तनखा, बच्चों की पढ़ाई और बढ़ती महंगाई ने उसकी कमर ही तोड़ दी थी. उसे मालूम था कि वो दोनों बहनो की आस है पर वो मजबूर था. बार-बार बचपन के दिनों को याद करता जब ना उसके पास बीवी थी और ना ही बच्चे. राखी के पहले दो दिन स्कूल ना जा कभी किसी बड़े साहेब का बगीचा साफ़ कर तो किसी की कार साफ़ कर पैसे कमाता था और राखी के दिन आधी-आधी कमाई दोनों बहनो के हाथ पकड़ा देता. दोनों बहनें धन्य हो जाती थीं. भाई-बहन का प्यार ही ऐसा होता है जहां कोई तीसरा सेंध नहीं मार सकता. आज जब प्रेमिन उसकी बहनों को इतना छोटा कर देती है, बहुत बुरा लगता है लेकिन लाचार है. वो कैसे भूल सकता है वो दिन जब दोनों बहनें ख़ुद चावल पानी खा उसे दूध दही खिलाती थीं.
पिछले साल से जब सब जगह कोरोना फैला हुआ है उसकी कमाई दस गुना बढ़ गयी है. उसने कोरोना में मरे हुए लोगों की लाशों को प्लास्टिक से लपटने का काम अपने कंधे पर ले लिया. अस्पताल के बड़े डॉक्टर भी बड़े ख़ुश हुए क्योंकि ये काम कोई नहीं करना चाहता था. एक कोरोना संक्रमित की लाश को लपेटने के लिए हज़ार रुपए मिलते थे. उसके लिए अस्पताल की तरफ़ से ही रहने खाने का इंतज़ाम कर दिया गया था. वह भी डॉक्टर की तरह पीपीई किट पहने रहता था. उसकी हालत उस डोम की तरह थी जो शमशान घाट पर लाशों के इंतज़ार में बैठा रहता है. उसने बीबी को भी नहीं बताया कि वो क्या काम कर रहा है. रोज़ परिवार वालो को फ़ोन पर दिलासा देता कि पूरा शहर कोरोना महामारी से ग्रसित है और उसके अस्पताल में भी कोरोना के बहुत मरीज़ हैं इससे उसका घर आना ठीक नहीं है. डॉक्टर्स डे के दिन उसे बेस्ट वर्कर अवॉर्ड भी मिला. जब कोरोना की दूसरी लहर चरम सीमा पर थी वो एक दिन में ही दस हज़ार से पंद्रह हज़ार तक कमा लेता था. अपनी कमाई का आधा हिस्सा उसने इस बार की राखी में बहनों पर ख़र्च करने का मन बना लिया था. इस बार ना केवल बहनों बल्कि बहनोई और बच्चों के लिए भी कपड़े बना देगा ताकि सबके लिए ये एक यादगार राखी बन जाएगी. अपने सारे सपनों से उसने अपनी सुख दुःख की साथी प्रेमिन को भी दूर रखा था. हर वक़्त उसे ख़ुद का भी डर लगा रहता था कि कहीं इन सपनों के चक्कर में वो ख़ुद ही कोरोना का शिकार ना हो जाए. जान जोखिम में थी लेकिन इरादे मज़बूत थे.
पूरे अस्पताल का वो चहेता था. सारी नर्सेस उसे बिसाहू से बिसू कह कर पुकारने लगी थीं. फिर वो अचानक इंग्लिश बोलने वाली नर्सेज़ का विश बन गया. हर मरने वाले की अलग कहानी थी. ना कोई घर से आता था. लाश भी मुनिसपालटी वाले जलाते थे. पूरा शहर क़ब्रिस्तान बन गया था, पत्तों ने आपस में बात करना बंद कर दिया था. हलचल थी कहीं तो अस्पतालों में जहां रोज़ दर्जनो मरीज़ कोरोना का शिकार हो भीड़ लगाए रहते थे. वो बहुत ध्यान रखता था मास्क कभी उतारा नहीं, सेनेटाइज़र बार-बार उपयोग में लाता और अगर पानी भी पीना होता, अपने कमरे में जा पहले हाथ धोता. धीरे से मास्क हटाता फिर हाथ धोता फिर जा कर पानी पीता.
घर वालों को तो पता भी नहीं था कि वो क्या काम कर रहा है, डर तो था उन्हें, सरकार बेरोज़गार लोगों को मुफ़्त आनाज़ दे रही थी. कई बार प्रेमिन कहती,“काबर जान ला जोखिम में डालत हस, घर आ जा, चटनी बासी खा के गुजारा कर ले बो.’’ (जान को जोखिम में क्यों डाल रहे हो, घर आ जाओ, रात के बचे चावल और चटनी के साथ भी गुज़ारा हो जाएगा).लेकिन प्रेमिन को भी मालूम था कि सरकार भरोसे नहीं रहा जा सकता. यहां तो पीएफ़ भी कटता था, बोनस भी मिलता था और तो और इलाज के लिए इएसआई सुविधा भी थी. बेटों ने उसे फ़ोन से बात करना ही नहीं मैसेज भी भेजना सिखा दिया था.
लाश को लपेटना आसान नहीं था. हालांकि लाश कोई शिकायत नहीं करती थी पर एक अकेली लाश और बिसाहू ही उसके लिए रोने वाला. ज़्यादातर लाशें करोड़पतियों की होती थी जिन्होंने बड़ी-बड़ी पार्टियां की थी और बीमारी पकड़ ली. ग़रीब बेचारे तो डर के मारे घर से भी नहीं निकलते थे. इससे उसे लाश लपेटने की हज़ार रुपये लेते वक़्त कोई अपराध बोध नहीं होता था. पहली कोरोना लहर और दूसरी मिला के कुल दस लाख की राशि जमा कर ली थी. इस राखी दोनो बहनों को एक-एक लाख दे वो उन्हें वो ही ख़ुशी देना चाहता था जो बचपन में उनकी आंखों में उसने अपनी कमाई देने के बाद देखी थी. दोनों बहिने उससे पैसे के बारे में पूछेंगी तो कह देगा ये सारे बख़्शीश के पैसे उसने जमा किए हैं.
इधर दोनों बहने आपस में सोचती हैं कि बेचारा बिसाहू कहां फंस गया है. जहां लोग घरों में क़ैद और वहां उसकी नख़रीली बीबी के कारण उसे अस्पताल में नौकरी बजानी पड़ रही है. उसी के अस्पताल के कई डॉक्टर्स और नर्स भी स्वर्ग सिधार गए उसमें दिन रात कोरोना मरीज़ों का मैला उठाने वाला उनका भाई बहनों की क़िस्मत से ही बचा है. दोनों भी इस राखी को यादगार बनाना चाहती हैं. बड़ी बहन दुलारी छोटी कुंती को कहती है,“तोला सोचे के जरुरत नई हे, बिसाहू ला बेटा असन पाले हों. मोर कमेटी निकले हे, वो पइसा से वोकर बर सोना के चेन दे देहों दूनो के तरफ़ से.” (तुम्हें सोचने की ज़रूरत नहीं है. मेरी कमेटी निकली है. बिसाहू को मैंने बेटे जैसे पाला है. दोनों की तरफ़ से सोने की चेन दे दूंगी).
इधर प्रेमिन सोचती है कि जहां कोरोना ने पूरी दुनिया में क़हर बरसा दिया वहीं उसका पति उस आग के दरिया के बीच रहते हुए भी सही सलामत घर वापस आया है. ये उसकी बहनो की दुआओं का ही असर है. बेचारी दोनों ने कितना उपवास किया है अपने भाई के लिए. मैं खुद बिसाहू से कहूंगी इस राखी को बहनों के लिए यादगार बना दे.
सचमुच कोरोना ने कितनी जाने ली हैं लेकिन मानव मन की बुराइओं को भी कुछ हद तक निकाल फेंका है. काश…मन का यह बदलाव स्थायी बना रहे.

Illustration: Pinterest

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डॉ संगीता झा

डॉ संगीता झा

डॉ संगीता झा हिंदी साहित्य में एक नया नाम हैं. पेशे से एंडोक्राइन सर्जन की तीन पुस्तकें रिले रेस, मिट्टी की गुल्लक और लम्हे प्रकाशित हो चुकी हैं. रायपुर में जन्मी, पली-पढ़ी डॉ संगीता लगभग तीन दशक से हैदराबाद की जानीमानी कंसल्टेंट एंडोक्राइन सर्जन हैं. संपर्क: 98480 27414/ sangeeta.jha63@gmail.com

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