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इस मौसम में बेर खाइए, इसके औषधीय गुण जानकर आप हैरान रह जाएंगे

देसी और मौसमी फल खाइए, अपनी सेहत बनाइए

डॉक्टर दीपक आचार्य by डॉक्टर दीपक आचार्य
March 1, 2023
in ज़रूर पढ़ें, डायट, हेल्थ
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इस मौसम का फल है बेर. आप आजकल खाते हैं इसे या फिर आपकी ज़िन्दगी बस फ़्रूट जैम में सिमट का रह गई है? ज़्यादातर लोगों को देसी फलों में ग़रीबी, पिछड़ापन या इनका बेस्वाद होना ही महसूस होता है. पिछले 30 सालों के स्वास्थ्य आंकड़ों को निकालकर देखिए, शहरीकरण और पश्चिमी खानपान की तरफ़ तांकझांक करने की वजह से हम भीतर ही भीतर खोखले हो चले हैं, हम शारीरिक और मानसिक तौर पर बीमार हो रहे हैं, ज़्यादा कमज़ोर हो चले हैं. डॉक्टर दीपक आचार्य का कहना है कि यूं तो अधिकतर लोग बेर को नाकारा फल ही मानते हैं, लेकिन यदि आप गुणों की खान बेर के बारे में जान जाओगे तो उसे अपनी डायट में शामिल किए बिना रह ही नहीं सकोगे.

लब्दा, बोरकुट और अलांधा खाएं हैं कभी? या ज़िन्दगी बस फ़्रूट जैम में सिमट का रह गई है? कीवी, माल्टा, चेरी, एप्पल जैसे फलों को आप घर तक लाकर बड़े तामझाम से डाइनिंग टेबल पर सजा तो देते हो और बड़े ही चाव से कन्ज़्यूम भी करते हैं लेकिन मजाल है कभी जाम, जामुन, बेर, कमरख, कैथा, गुन्दा, विलायती इमली, बेल, पपीता, आंवला, इमली पर इतनी मुहब्बत लुटाई हो. ज़्यादातर लोगों को देसी फलों में ग़रीबी, पिछड़ापन या इनका बेस्वाद होना महसूस होता है. है ना?

पिछले 30 सालों के स्वास्थ्य आंकड़ों को निकालकर देखिए, शहरीकरण और पश्चिमी खानपान की तरफ़ तांकझांक करने की वजह से हम भीतर ही भीतर खोखले हो चले हैं, हम शारीरिक और मानसिक तौर पर बीमार हो रहे हैं, ज़्यादा कमज़ोर हो चले हैं. हमारी भारतीय संस्कृति में और तीज-त्यौहारों पर अलग-अलग तरह के फलों के सेवन करने की सलाह दी जाती रही है, जिनका सीधा संबंध बदलते मौसमी माहौल, मौसमी बदलाव और शारीरिक आवश्यकताओं के अनुरूप था. तीज त्यौहार सिमटते जा रहे हैं, खानपान में जो विभिन्नताएं थी, वो भी ख़त्म होने लगी है. भागदौड़ भरी जीवनचर्या में हम इतने ज़्यादा भाग गए कि पीछे मुड़ने में दिक़्क़तें आनी तो तय हैं. अब ‘बेर’ की ही बात लीजिए, एक बहुत बड़ी पॉपुलेशन इसे नाकारा फल मानती है. लेकिन यदि आप गुणों की खान बेर के बारे में जान जाओगे तो फिर मान जाओगे.

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विटामिन सी
गर्मियों की शुरुआत के साथ ही बेर आने शुरू हो जाते हैं. बेर के औषधीय गुणों की बात करने बैठ जाएं तो सुबह से शाम हो जाएगी. सिर्फ़ विटामिन C का उदाहरण लीजिए, महज 100 ग्राम बेर चबा लेंगे तो पूरे दिनभर के लिए आवश्यक विटामिन C का 77% हिस्सा आपको मिल जाएगा. आपके पास विकल्प है, पर चयन आपका ही है या तो चूसते रहिए विटामिन C की गोलियां या बेर चुग लीजिए.

ऐंटीआक्सिडेंट गुण
ताबड़तोड़ ऐंटीऑक्सिडेंट गुणों की वजह से लिवर के लिए ये एक ज़बरदस्त टॉनिक भी है. बेहतरीन नींद के लिए, तनाव दूर करने के लिए और तो और वो डायबेटिक लोग, जिन्हें गर्मियों में तलवों और पैर में अक्सर जलन की शिकायतें बनी रहती है, उनके लिए रोज 100 ग्राम बेर गज़ब काम करती है. टेस्टट्यूब क्लिनिकल स्टडीज़ तो ये तक बताती हैं कि बेर का पल्प ओवरी, सर्विकल, ब्रेस्ट, लिवर, कोलोन और स्किन कैंसर की घातक कोशिकाओं को मार गिराने में सक्षम है. वैज्ञानिक मानते हैं की बेर में विटामिन C की प्रचुरता और इसका ऐंटीऑक्सिडेंट्स से भरपूर होना इसे क्लिनिकल तौर से प्रभावी बनाता है. ज़्यादातर अध्ययन या तो टेस्टट्यूब लेवल पर या चूहों पर ही हुए हैं, ह्यूमन सेल पर भी संभावनाएं तलाशी जा सकती है. कुलमिलाकर आपके मित्र दीपक आचार्य कहना ये चाह रहे हैं कि घूमते-फिरते बेर मिल जाए, मुट्ठी भर चबा लोगे तो अपने स्वास्थ्य और पेट के लिए थोड़ा-सा एहसान तो कर ही दोगे. और हां, पाचन दुरुस्त भी करती है बेर, समझे?

अलांधा
कुछ बरस पहले चेन्नई जाते समय श्रीकालहस्थी में ‘अलांधा’ यानी बेर के बड़े खाया था. कोई बड़ा तामझाम नहीं है, बड़े बनाने का. बेर के पल्प में गुड़, हींग, काली मिर्च,थोड़ा सा नमक और थोड़ा सा अदरक डालकर सिलबट्टे पर कुचल लीजिए, तैयार मिक्सर के गोल-गोल आकार के बड़े बना लें, बटर पेपर पर रखकर 3-4 दिन कड़क धूप में सुखा दीजिए, पूरी तरह से सूखते ही आयटम तैयार है. अलांधा बेचने वाली अम्मा ने बताया था कि ये पाचन ठीक करता है और तो और बदन दर्द में भी आराम दिलाता है, ये है देश का ज्ञान.

बोरकुट और लब्दा
वैसे मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले में हम लोग सूखी बेर का पाउडर, जिसे बोरकुट कहते हैं, उसे ख़ूब खाते थे, उसे आपने खाया है या नहीं? मुझे अब भी याद है, अड़ोस-पड़ोस के लोग सिरदर्द होने पर तुरंत आराम पाने के लिए बोरकुट खाने कहा करते थे. मेरे घर में तो बाक़ायदा सूखी बेर और बोरकुट का सालभर का स्टॉक रखा रहता था. एकदम एक नम्बर का टेस्टी स्वाद होता है बोरकुट का. सूखी बेर को गुड़ के पानी में उबालकर, मिर्च नमक छिड़ककर ‘लब्दा’ बनाया जाता है, वो तो खाया ही हो होगा आपने? नहीं खाया है तो भटको और बटोर लो वहां से, जहां भी मिल जाए बेर.

मौसमी और देसी फल खाइए
बेर गज़ब एनर्जी भी देती है. जंगलों में भटकते हुए हमारी जंगल लैबोरेटरी की पूरी हर्बल वर्बल टीम में एनर्जी को मेंटेन करने के लिए इस सीज़न में बेर और आंवले ही मदद करते हैं. अब इतनी सारी पंचायत कर लिया हूं तो ये भरोसा भी पाना चाहता हूं कि सड़क किनारे, बाज़ार या गांव देहात में कोई व्यक्ति देसी फल बेचता दिख जाए, आप ख़रीद ज़रूर लेना, क्योंकि ये वो लोग हैं जो असली सेवा कर रहे हैं. हमारी वानस्पतिक विरासत को ज़िंदा रखे हुए है.

फ़ोटो: पिन्टरेस्ट

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डॉक्टर दीपक आचार्य

डॉक्टर दीपक आचार्य

डॉक्टर दीपक आचार्य, पेशे से एक साइंटिस्ट और माइक्रोबायोलॉजिस्ट हैं. इन्होंने मेडिसिनल प्लांट्स में पीएचडी और पोस्ट डॉक्टरेट किया है. पिछले 22 सालों से हिंदुस्तान के सुदूर आदिवासी इलाक़ों से आदिवासियों के हर्बल औषधीय ज्ञान को एकत्र कर उसपर वैज्ञानिक नज़रिए से शोध कर रहे हैं.

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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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