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ओए अफ़लातून
Home ज़रूर पढ़ें

आम लोगों के जीवन को यूं प्रभावित करता है पूंजीवाद

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
October 4, 2022
in ज़रूर पढ़ें, नज़रिया, सुर्ख़ियों में
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पूंजी और पूंजीवाद किस तरह आम लोगों के जीवन पर प्रभाव डालता है, किस तरह उसकी गिरफ़्त में सिस्टम आ जाता है. इस बात को जानना चाहते हैं तो हिमांशु कुमार का यह आलेख आपको इस बात की बुनियादी समझ देगा.

धन शब्द धान से बना है. पहले जो किसान मेहनत करके ज़्यादा धान उगा लेता था उसे धनवान कहते थे. बाद में मुद्रा अर्थात पैसे का अविष्कार हुआ. पैसे को वस्तुओं या सेवा के बदले लिया-दिया जाने लगा. तब से माना जाने लगा कि पैसा वस्तुओं का प्रतिनिधि है. वस्तुओं की क़ीमत पैसे से नापी जाती है.

जैसे पहले एक रुपए में दस किलो अनाज आता था.अब डेढ़ सौ रुपए में दस किलो अनाज आता है. तो अनाज की क़ीमत बढ़ गई या कहिए कि पैसे की क़ीमत गिर गई. तो असल में पैसे की क़ीमत गिरने से अनाज की क़ीमत बढ़ गई. किसी चीज़ की क़ीमत तब घटती है, जब उसकी मात्रा ज़्यादा बढ़ जाती है, जैसे- पैसे की मात्रा ज़्यादा हो गई तो पैसे की क़ीमत घट गई. परिणामस्वरूप वस्तुओं का मोल बढ़ गया. इसे ही आप महंगाई कहते हैं. इसे अर्थशास्त्र में मुद्रा स्फीति कहा जाता है. अर्थात वस्तुओं और सेवाओं के मुक़ाबले मुद्रा का ज़्यादा हो जाना.

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मान लीजिए मेरे पास सौ करोड़ रुपए हैं. मैंने सुबह बैंक में फ़ोन करके सौ करोड़ रुपयों के शेयर्स ख़रीद लिए. शाम को मैंने दस प्रतिशत बढ़े हुए रेट पर वो शेयर बेच दिए तो शाम तक मेरे पास दस करोड़ रुपए का मुनाफ़ा आ गया.
इस मामले में मैंने ना तो किसी वस्तु का उत्पादन किया ना ही किसी सेवा का उत्पादन किया, लेकिन मेरे पास दस करोड़ रुपए बढ़ गए. पैसे मेरे बैंक में ही हैं.

अब मैं चेक से उन पैसों से अनाज भी ख़रीद सकता हूं. मैं अनाज मंडी में ख़रीदे गए सारे अनाज को ख़रीद लेता हूं. बाज़ार में बिक्री के लिए अनाज नहीं जाने देता. इससे अनाज की मांग बढ़ जाती है, इससे अनाज की क़ीमत बढ़ जाती है.
अनाज की बढ़ी हुई क़ीमत दस करोड़ रुपए एक दिन में कमाने वाले के लिए नुक़सानदायक नहीं है, लेकिन सौ रुपया रोज़ कमाने वाले मज़दूर के लिए नुक़सानदायक होगी.

अनाज उगाने वाले किसान को ज़्यादा पैसा मिलेगा, लेकिन चूंकि पैसे की क़ीमत तो गिर ही चुकी है इसलिए उसे उस पैसे की बदले में कम सामान मिलेगा. तो कहने का मतलब ये कि पूंजी, बैठे-बैठे किसी के हाथों में पैसे को बढ़ाने की ताक़त दे देती है. उसका पैसा तेज़ी से बढ़ता जाता है, लेकिन मेहनत करने वाले मज़दूर या मेहनत से उत्पादन करने वाले किसान का पैसा तेज़ी से नहीं बढ़ता. इसलिए यह तबका इस अर्थव्यवस्था में ग़रीब बन जाता है.

शेयर ख़रीदने के लिए मुझे बैंक क़र्ज़ देता है. मैं चाहूं तो कितनी ही कंपनियां बना सकता हूं. मैं चाहूं तो अपनी ही कम्पनी के शेयर भी ख़रीद सकता हूं. बैंक में किसान और मज़दूर का भी पैसा जमा है. किसान और मज़दूर के बैंक में जमा पैसे से मैं अपनी ही कंपनी के शेयर ख़रीदता हूं, ख़ुद ही उनके रेट बढाता हूं. ख़ुद ही मुनाफ़ा कमाता हूं और मेरे पास पैसा बढ़ता जाता है.

उधर किसान का अनाज नहीं बढ़ रहा इसलिए उसके पास पैसा भी नहीं बढ़ेगा. मैं इस पैसे से नेता, अफ़सर और पुलिस को ख़रीद लूंगा. मैं इस पैसे से अपना कारखाना लगाने के लिए किसान की ज़मीन पुलिस के दम पर छीन लूंगा.
अब मेरे पास बिना काम किए रोज़ करोड़ों रुपए आते जाएंगे. अब सरकार, पुलिस और जेल, अदालत मेरे बिना मेहनत से कमाए हुए धन की सुरक्षा करेगी. और जो ग़रीब इस तरह से मेरे धन कमाने को गलत मानेगा, उसे सरकार जेल में डाल देगी.

अब नौजवानों को रोज़गार मेरे ही कारखाने या दफ़्तर में मिलेगा. अब कॉलेज में नौजवानों को वही पढ़ाया जाएगा, जिसकी मुझे ज़रूरत होगी. अब नौजवान मेरी सेवा करने के लिए पढ़ेंगे. अब बच्चों की शिक्षा मेरे कहे अनुसार चलेगी.
मैं टीवी के चैनल भी ख़रीद लूंगा. अब टीवी आपको मेरा सामान ख़रीदने के लिए प्रेरित करेंगे. मैं शापिंग मॉल भी ख़रीद लूंगा. मैं छोटी दुकाने बंद करवा दूंगा. अब आप मेरे ही कारखाने या दफ़्तर में काम करेंगे और मेरे ही शापिंग मॉल में जाकर ख़रीदारी करेंगे.

मैं ही एक हाथ से आपको पैसे दूंगा और दूसरे हाथ से पैसे ले लूंगा. आप दिन भर मेरे लिए काम करेंगे. अब आप मेरे गुलाम हो जाएंगे. अब मैं आपकी ज़िंदगी का मालिक बन जाऊंगा. अब मैं करोड़ों लोगों की ज़िंदगी का मालिक बन जाऊंगा.

अब आपको वहां रहना पड़ेगा, जहां मेरा ऑफ़िस या कारखाना है. आपके रहने की जगह मैं निर्धारित करूंगा. आपको मैं उतनी ही तनख़्वाह दूंगा, जिसमें आपका परिवार जी सके. आप अपनी बेसहारा बुआ, मौसी या माता-पिता को अपने साथ नहीं रख पाएंगे. तो आपके परिवार का साइज़ भी मैं तय करूंगा.

अब आप मेरे लिए काम करते हैं. आपके बच्चे मेरे लिए पढ़ते हैं. आप मेरी पसंद की जगह पर रहते हैं. अब मैं जिस पार्टी को चाहे टीवी की मदद से आपके सामने महान पार्टी के रूप में पेश कर देता हूं. आप उसे वोट भी दे देते हैं. मैं साम्प्रदायिकता का इस्तेमाल करके आपको मेरे लिए फ़ायदेमंद पार्टी को वोट देने के लिए मजबूर करता हूं.

मैं अफ्रीका में अलग-अलग क़बीलों को आपस में लड़वाता हूं. मैं भारत में अलग-अलग संप्रदायों को लड़वाता हूं और फिर बड़े क़बीले की तरफ़ मिल कर सत्ता पर कब्ज़ा कर लेता हूं. भारत में अभी बड़ा क़बीला हिंदू है इसलिए मैं हिंदुओं की साम्प्रदायिकता को भड़का कर अपने गुलाम नेता को सत्ता में बैठा देता हूं.

पाकिस्तान में मैं मुसलमान साम्प्रदायिकता को भड़काता हूं, क्योंकि पाकिस्तान में बड़ा क़बीला मुसलमान है. तो समझ लीजिए यही है हक़ीक़त हमारे पूंजीवाद, राजनीति, साम्प्रदायिकता, अर्थव्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था और विकास की. और पूंजीवाद इसी तरह आम आदमी पर असर डालता है.

फ़ोटो: पिन्टरेस्ट, medium.com

 

Tags: CapitalismCommunalismEconomyEducationEffect of CapitalismEmploymentpoliticsअर्थव्यवस्थापूंजीवादपूंजीवाद का प्रभावराजनीतिरोज़गारशिक्षासाम्प्रदायिकता
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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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