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ओए अफ़लातून
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प्रतीकों के साथ जश्न मनाने का सुरक्षित तरीक़ा और सलीका विकसित किया जाना चाहिए

जश्न के बीच एक व्यक्ति की मौत भी उस त्यौहार का अनादर है

शिल्पा शर्मा by शिल्पा शर्मा
October 8, 2022
in ज़रूर पढ़ें, नज़रिया, सुर्ख़ियों में
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अपनी परंपराओं का निर्वहन करना, प्रतीकों के साथ उनका जश्न मनाना इसलिए भी ज़रूरी है कि हम अपनी अगली पीढ़ी को अपने इतिहास और अपने रस्म ओ रिवाज़ से परिचित करा सकें. पर अब जबकि भारत में साक्षरता दर और शिक्षा की दर भी पहले से ज़्यादा बढ़ चुकी है, हम इतने समझदार तो हो ही चुके हैं कि अब हमें प्रतीकों के साथ जश्न मनाने का सुरक्षित तरीक़ा और सलीका विकसित कर लेना चाहिए, ताकि एक भी व्यक्ति को जान न गंवानी पड़े. क्योंकि जश्न के बीच एक व्यक्ति की मौत भी उस त्यौहार का अनादर है.

बात शुरू करने से पहले कुछ हालिया आंकड़ों पर नज़र डाल लेते हैं. इस वर्ष यानी 2022 में गणपति विसर्जन के दौरान महाराष्ट्र में 30, उत्तर प्रदेश और हरियाणा में 11 लोगों की मौत हो गई. दो दिन पहले ही पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी में दुर्गा प्रतिमा के विसर्जन के दौरान आठ लोगों की और राजस्थान के अजमेर ज़िले में छह लोगों की मौत हो गई.

हाल ही में संपन्न हुए दशहरे में हिमाचल प्रदेश के यमुनानगर के दशहरा ग्राउंड में रावण का जलता हुआ पुतला अचानक पास खड़ी भीड़ पर गिर पड़ा. प्रशासन का कहना है कि घटना में कोई हताहत नहीं हुआ, लेकिन यदि आपने इस घटना का वीडियो देखा हो तो साफ़ दिखता है कि दो-तीन लोग इसकी चपटे में आए हैं. यही नहीं, उत्तर प्रदेश के मुजफ़्फर नगर में रावण के पुतले से रॉकेट निकल कर भीड़ की ओर ही चलने लगे. कई रॉकेट भीड़ की ओर लगातार गिरे, गनीमत थी कि हताहत कोई नहीं हुआ. लेकिन भगदड़ तो मच ही गई. ये दोनों हादसे भी कईयों की जान लेने का कारण बन सकते थे.

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इसी तरह वर्ष 2022 में दही हांडी उत्सव के दौरान मानव पिरामिड बना कर मटकी फोड़ने के उत्सव के दौरान एक 24 वर्षीय युवा की मौत हो गई और 64 अन्य लोग घायल हो गए.

यह तो बात हुई इस वर्ष के आंकड़ों की यदि दशहरे पर वर्ष 2014 में पटना और वर्ष 2018 में अमृतसर में घटे भयावह हादसों को याद करें तो किसी का भी दिल दहल सकता है. बिहार के पटना में 3 अक्टूबर 2014 को गांधी मैदान में आयोजित रावण दहन के कार्यक्रम में भगदड़ मचने से 42 लोगों की मौत हो गई थी. वहीं 19 अक्टूबर 2018 को अमृतसर में रेल्वे ट्रैक पर खड़े हो कर रावण दहन देख रहे लोगों को एक ट्रेन कुचलती हुई चली गई थी, जिसमें 61 लोगों की जान चली गई थी.

कुछ सवाल पूछिए ख़ुद से
यहां मेरे कुछ छोटे-छोटे सवाल हैं सरकार से, समाज से और हम सभी आम लोगों से भी कि क्या हमारे देश में लोगों की जान इतनी सस्ती है कि हम उसे त्यौहार के दौरान प्रतीकों के निर्वहन और उसके जश्न में गंवा दें? क्या असमय मृत्यु की भेंट चढ़े इन व्यक्तियों की मौत के लिए हम, हमारा समाज और हमारी सरकार ज़िम्मेदार नहीं है? क्या इन हादसों को रोकने के प्रति हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती? क्या जनता और प्रशासन को मिल कर त्यौहार मनाने के, प्रतीकों के जश्न के ऐसे सुरक्षित तरीक़े विकसित नहीं करने चाहिए, जिससे एक भी व्यक्ति घायल न हो, मौत के मुंह में न समाए?
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चलिए इन पर्वों का इतिहास जान लेते हैं
यह तो आपको भी पता ही होगा कि गणपति उत्सव की शुरुआत क्यों हुई थी. गणपति उत्सव को सार्वजनिक तौर पर मनाने की शुरुआत वर्ष 1893 में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने की थी. हालांकि इसके पहले भी गणेशोत्सव मनाया जाता था, लेकिन लोग इस घर पर ही मनाते थे, सार्वजनिक रूप से नहीं. तिलक उस समय युवा क्रांतिकारी थे और उन्हें एक ऐसे मंच की आवश्यकता थी, जहां पर उनकी बात ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंच सके और इसीलिए गणपति उत्सव को सार्वजनिक स्वरूप दिया गया.

इसी तरह दुर्गा पूजा के आयोजन को लेकर भी तीन कहानियां प्रचलन में है, पहली ये कि 1775 में प्लासी के युद्ध में बंगाल के शासक नवाब सिराजुद्दौला की अंग्रेज़ों के हाथों हुई हार के बाद रॉबर्ट क्लाइव को ख़ुश करने के लिए सार्वजनिक दुर्गा पूजा का आयोजन किया गया, बाद में ज़मीदारों ने इसका प्रचलन शुरू किया. दूसरी कहानी कहती है कि पहली बार नौवीं सदी में बंगल के विद्वान रघुनंदन भट्टाचार्य ने इसकी शुरुआत की. तीसरी कहानी के मुताबिक़ कुल्लक भट्ट पंडित ने पहली बार एक ज़मींदार के यहां पहला पारिवारिक दुर्गा उत्सव करवाया था.

कहा जाता है कि वर्ष 1948 में पाकिस्तान से आए रिफ़्यूजी परिवारों की ओर से आयोजित कार्यक्रम में रांची के लोगों ने सबसे पहली बार रावण दहन हुआ. जिसे देखने सैकड़ों लोग इकट्ठा हुए. यानी देखा तो इन पर्वों को इस तरह प्रतीकात्मक स्वरूप में मनाए जाने का रिवाज़ 250 वर्ष से ज़्यादा पुराना नहीं है. कहने का मतलब ये कि ये प्रतीकों के जश्न की ये परंपराएं अनादि काल से नहीं चली आ रही हैं.

अब तो जागरूक होना चाहिए
इस तरह के पर्व को अब हर गली नुक्कड़ पर मनाया जाता है. चाहे वह दही हांडी हो, गणपति उत्सव हो, दुर्गा उत्सव हो या रावण दहन हो. इन सभी उत्सवों और उनके प्रतीकों को मनाने का उद्देश्य था इन पर्वों के पीछे की परंपरा के बारे में हमारी अगली पीढ़ी को संदेश देना. लेकिन अब इन उत्सवों में बाज़ार उतर आया है, राजनीति उतर आई है, जो इनकी मूल भावना से परे, प्रतिस्पर्धा का माहौल तैयार करती है.

फिर यदि आप इस बात पर ध्यान दें कि इस तरह के आयोजनों के दौरान लोगों की बेवजह, असमय मौत तो होती ही है, लेकिन साथ ही हम धरती को ज़्यादा और ज़्यादा प्रदूषित करते जा रहे हैं. प्रदूषण की बात करें तो ऐसी मूर्तियों के विसर्जन से जो पीओपी और केमिकल वाले कलर्स से बनी हैं, जिसमें मेटल भी शामिल है, हम जल के स्रोतों को प्रदूषित कर रहे हैं. पंडालों में तेज़-तेज़ आवाज़ में डीजे बजा कर ध्वनि प्रदूषण कर रहे हैं. विसर्जन के दौरान पटाखे छोड़ कर वायु प्रदूषण कर रहे हैं. लोगों की मौत और प्रदूषण को बढ़ाना ये किसी भी भारतीय या सनातनी त्यौहार का उद्देश्य नहीं हो सकता, लेकिन जिस तरह हम प्रतीकों की लकीर पीटने को ही सेलेब्रेशन मान लेते हैं, हम अपने त्यौहारों के मूल उद्देश्य से भटक गए हैं.

तो क्या आपको नहीं लगता कि हमें इस बात को लेकर अब तक जागरूक हो ही जाना चाहिए कि इस तरह प्रतीकों की लकीर पीटने से आख़िर हम क्या हासिल कर रहे हैं?

तो क्या इसका कोई समाधान है?
अपनी परंपरा के निर्वहन से मेरा क़तई विरोध नहीं है, लेकिन उसके तरीक़े से ज़रूर है. क्योंकि यह लोगों की जानें ले रहा है और धरती को प्रदूषित कर रहा है. तो क्या कोई ऐसा समाधान निकाला जा सकता है, जिससे परंपरा भी बची रहे और हम व्यर्थ ही प्रदूषण बढ़ाने में सहभागी भी न हों? बिल्कुल!

यदि भारत में के बड़े शहर या स्मार्ट सिटीज़ के नागरिक ये तय कर लें कि इन त्यौहारों का जश्न शहर के सबसे बड़े मैदान में केवल एक ही जगह किया जाएगा. जिसके इतंज़ाम इतने मज़बूत किए जाएं, ताकि कोई हताहत न हो, किसी तरह की भगदड़ न मचे. तकनीक की मदद इस काम में ली जा सकती है. उस एक बड़े मैदान में बड़े गेट्स से एंट्री और एग्ज़िट बनाए जाएं. बड़े बड़े स्क्रीन लगा कर वहां आने वालों या वहां से गुज़रने वालों को प्रतिमाओं के दर्शन करवा दिए जाएं. इन पंडालों में दर्शन के लिए हर दिन नियत कूपन दिए जाएं, जिन्हें ऑनलाइन ख़रीदा जा सके. बिना कूपन के लोगों को पंडालों में न आने दिया जाए. रावण दहन मैदान के चारों ओर नियत दूरी पर स्क्रीन से देखा जा सके. वहां एंबुलेंस, पुलिस वाहन, दमकल आदि की पहले से तैनाती की जाए.

इस तरह यदि प्रशासन और जनता एक-दूसरे का सहयोग कर इन उत्सवों, इन प्रतीकों के जश्न मनाने का सलीका विकसित करें तो हमारी अगली पीढ़ी तक हमारी परंपराएं सही रूप में भी पहुंचेंगी, प्रदूषण भी कम होगा और हम इन त्यौहारों के दौरान होने वाली दुर्घटनाओं में लोगों की असमय मृत्यु पर भी क़ाबू पा सकेंगे.

आख़िर उभरते भारत में लोगों की सोच इतनी संकुचित तो नहीं होनी चाहिए कि अपने त्यौहारों को सुरक्षित तरीक़े से मनाने पर ज़ोर न दे सकें.

फ़ोटो: पिन्टरेस्ट, गूगल

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शिल्पा शर्मा

शिल्पा शर्मा

पत्रकारिता का लंबा, सघन अनुभव, जिसमें से अधिकांशत: महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर कामकाज. उनके खाते में कविताओं से जुड़े पुरस्कार और कहानियों से जुड़ी पहचान भी शामिल है. ओए अफ़लातून की नींव का रखा जाना उनके विज्ञान में पोस्ट ग्रैजुएशन, पत्रकारिता के अनुभव, दोस्तों के साथ और संवेदनशील मन का अमैल्गमेशन है.

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