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Home ज़रूर पढ़ें

लोकतंत्र में महिलाएं: आख़िर क्यों राजनीतिक दल महिला अध्यक्ष बनाने से बचते हैं?

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
November 28, 2023
in ज़रूर पढ़ें, नज़रिया, सुर्ख़ियों में
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लोकतंत्र में महिलाएं: आख़िर क्यों राजनीतिक दल महिला अध्यक्ष बनाने से बचते हैं?
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इसी साल संसद के विशेष सत्र के दौरान भारतीय संसद ने लोकसभा और राज्यों की विधानसभा में एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित रखने का ऐतिहासिक फ़ैसला लिया. लगभग सभी दलों ने इसका समर्थन किया. इस तरह हमें लग सकता है कि भारतीय राजनीति में महिलाओं के अच्छे दिन बस आनेवाले ही हैं. डॉ रामजीलाल, समाज वैज्ञानिक, पूर्व प्राचार्य, दयाल सिंह कॉलेज, करनाल राजनीतिक दलों के आंतरिक लोकतंत्र में महिलाओं की स्थिति की समीक्षा कर रहे हैं. ख़ासकर प्रमुख दलों द्वारा महिला राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने से बचने की प्रवृत्ति पर रौशनी डाल रहे हैं.

लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की अहमियत
राजनीतिक दल प्रजातंत्रात्मक व्यवस्था की रीढ़ की हड्डी के समान हैं. राजनीतिक दल समान विचारधारा में विश्वास रखने वाले व्यक्तियों का एक ऐसा समूह है जो राजनीतिक मूल्यों और विचारधारा के आधार पर स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक काम करता है तथा सत्ता में आने के पश्चात उन नीतियों को जनहित में लागू करता है. चुनाव के समय राजनीतिक दलों के द्वारा अपने-अपने प्रत्याशियों को मनोनीत किया जाता है और उनके लिए निर्वाचन में विजय प्राप्त करने के लिए मतदाताओं को रुझाता है. चुनाव के द्वारा उनकी नीतियों को औचित्यपूर्णता प्राप्त होती है और एक निश्चित समय तक शासन करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है. वह राजनीतिक दल अथवा गठबंधन जो चुनाव के द्वारा बहुमत प्राप्त करता है वह सत्ता में आ जाता है और जो राजनीतिक दल अथवा गठबंधन चुनाव हार जाता है वह विपक्ष के रूप में भूमिका अदा करता है. विपक्ष का मुख्य कार्य केवल सरकार की आलोचना करना ही नहीं है, अपितु जनता के सम्मुख वैकल्पिक नीतियों, योजनाओं इत्यादि को प्रस्तुत करना है और सरकार पर निरंतर दबाव डाल कर नीतियों के क्रियान्वयन को लागू करने के लिए जनता को लामबद्ध करता है. जन आंदोलनों के द्वारा सरकारों की कमियों को उजागर करके जनता तक पहुंचता है. परिणाम स्वरूप राजनीतिक दलों के बिना लोकतंत्र की कल्पना करना असंभव है अर्थात “दल विहीन लोकतंत्र’’ की कल्पना करना मुंगेरीलाल के हसीन सपनों के समान है. राजनीतिक दलों के द्वारा लोकतंत्र को ‘प्रतिनिधि लोकतंत्र’ में परिवर्तित कर दिया जाता है. राजनीतिक दलों का सर्वोच्च नेतृत्व- हाई कमान और अध्यक्ष होता है. हाई कमान और अध्यक्ष के द्वारा राजनीतिक दलों में अनुशासन स्थापित किया जाता है. राजनीतिक दलों का सर्वोच्च नेतृत्व अपने दल के सदस्यों के लिए प्रेरणा का स्रोत होता है तथा जनमत व सरकार दोनों को प्रभावित करता है. अत: हमारे सुधि पाठकों को यह जानना जरूरी है कि भारत में राजनीतिक दलों के अध्यक्ष के संबंध में महिलाओं की क्या स्थिति है?

राजनीतिक दलों के आंतरिक लोकतंत्र में महिलाएं
वैश्विक पटल पर महिलाएं अनेक देशों में अपने राजनीतिक दलों के अध्यक्ष के रूप में विराजमान हैं. लेकिन भारत में दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी-भारतीय जनता पार्टी (1980) की स्थापना के बाद से एक भी महिला राष्ट्रीय पार्टी अध्यक्ष के पद पर नहीं रही. दूसरी ओर, वामपंथी दलों जैसे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) में आज तक एक भी महिला राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं बनी. आम आदमी पार्टी की दो राज्यों-दिल्ली और पंजाब में सरकार है. इस पार्टी की न तो अध्यक्ष महिला हैं और न ही मुख्यमंत्री. कुछ अन्य पार्टियों को छोड़कर क्षेत्रीय पार्टियों का भी यही हाल है. हमारा मानना है कि दक्षिणपंथी विचारधारा या साम्यवादी वामपंथी विचारधारा पर आधारित दोनों पार्टियों की मानसिकता पितृसत्तात्मक है. ऐसे में जब महिलाएं राजनीतिक दलों में निर्णय लेने की स्थिति में नहीं होंगी तो वास्तव में वे राज्य विधान मंडलों और संसद में निर्वाचित होने के बाद भी महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभा पाएंगी.
कांग्रेस की स्थिति इन पार्टियों से बिल्कुल अलग है. अब तक पांच महिलाएं कांग्रेस पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुकी हैं. स्वतंत्रता आंदोलन के समय तीन महिलाएं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष निर्वाचित हुईं. इनमें दो विदेशी महिलाएं-एनी बेसेंट (सन् 1917) तथा नीली सेनगुप्ता (सन् 1933) व तीसरी श्रीमती सरोजिनी नायडू (सन्1928) भारतीय महिला थीं. स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात श्रीमती इंदिरा गांधी (सन् 1959 व सन् 1978 से सन् 1984 मृत्यु तक) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद पर निर्वाचित होने वाली चौथी महिला थीं. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद पर सबसे लंबे समय तक रहे अध्यक्षों की श्रेणी में श्रीमती सोनिया गांधी का नाम आता है. सन् 1998 में कांग्रेस के अध्यक्ष पर निर्वाचित होने पांचवी महिला हैं. श्रीमती सोनिया गांधी सन् 1998 में कांग्रेस अध्यक्ष चुनी गईं और सन् 2017 तक यानी 19 वर्ष तक कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं. इतने लंबे समय तक कांग्रेस पार्टी में अध्यक्ष पद पर कोई भी व्यक्ति आसीन नहीं रहा. श्रीमती इंदिरा गांधी और श्रीमती सोनिया गांधी को वैश्विक स्तर पर सबसे शक्तिशाली महिलाओं की श्रेणी में गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त है.
क्षेत्रीय राजनीतिक दलों में दक्षिण भारत के राज्य तमिलनाडु में प्रथम महिला अध्यक्ष बनने का श्रेय श्रीमती जानकी रामचंद्रन को जाता है. श्रीमती जानकी रामचंद्रन अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) की प्रथम महिला अध्यक्ष (2 जनवरी 1988 – 7 फ़रवरी 1989) थीं. ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) की द्वितीय अध्यक्ष सुश्री जय ललिता एक शक्तिशाली राजनेत्री थीं. कुमारी मायावती 18 सितंबर 2003 को पहली बार बहुजन समाजवादी पार्टी (बसपा) की अध्यक्ष निर्वाचित हुई थी और 28 अगस्त 2019 को लगातार चौथी बार अध्यक्ष चुनी गईं. अनुसूचित जाति (जाटव) से संबंध रखने वाली सुश्री मायावती एक शक्तिशाली पार्टी अध्यक्ष हैं. भारत की राजनीति में मायावती दलित वर्ग के लिए एक अग्रदूत और सशक्त महिला मानी जाती हैं. अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की स्थापना 1 जनवरी 1998 को हुई थी तथा सुश्री ममता बनर्जी इसकी संस्थापक अध्यक्ष हैं और आज भी हैं. वर्तमान समय में पूरे भारत में सुश्री ममता बनर्जी एक मात्र महिला मुख्यमंत्री हैं. सन् 1947 से सन् 2023 तक केवल 16 महिलाएं मुख्यमंत्री रही हैं.
हालांकि राजनीतिक पार्टियां लैंगिक समानता की बात करती हैं, लेकिन जहां तक पार्टियों के अध्यक्ष पद की बात है, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC), अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (TMC), एआईएडीएमके और बहुजन समाजवादी पार्टी (BSP) को छोड़कर सभी राजनीतिक दल ‘पुरुष केंद्रित’ हैं और ‘पितृसत्तात्मक व्यवस्था’ का समर्थन करते हैं. लैंगिक समानता के संबंध में राजनीतिक दलों की कथनी और करनी में बहुत बड़ा अंतर है. वह ‘स्त्री वंदना’ केवल एक दिखावे के रूप में करते हैं लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है. अंततः उनका दृष्टिकोण महिला विरोधी व लैंगिक समानता विरोधी है. ऐसी स्थिति में भारतीय राजनीति में महिलाओं के सशक्तिकरण की बात कहां तक सार्थक हो सकती है? यह एक यक्ष प्रश्न है.

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