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विश्व पर्यावरण दिवस: घर की समस्याओं से पार हो जाओ, ध्रुवीय भालू अपने आप बच जाएंगे

डॉक्टर दीपक आचार्य by डॉक्टर दीपक आचार्य
June 5, 2023
in ज़रूर पढ़ें, नज़रिया, सुर्ख़ियों में
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विश्व पर्यावरण दिवस: घर की समस्याओं से पार हो जाओ, ध्रुवीय भालू अपने आप बच जाएंगे
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विश्व पर्यावरण दिवस मनाने की शुरुआत वर्ष 1972 में हुई थी. संयुक्त राष्ट्र संघ ने 5 जून 1972 को पहली बार पर्यावरण दिवस मनाया था. इसके बाद से हर वर्ष दुनियाभर में पांच जून को विश्‍व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है. विश्व पर्यावरण दिवस के लिए प्रतिवर्ष एक विशेष विषय (थीम) रखा जाता है, जिसके अनुसार यह मनाया जाता है. इस बार की थीम प्लास्टिक से उपजे प्रदूषण के सामाधान (Solutions to Plastic Pollution) पर रखी गई है. लंबे समय से पर्यावण दिवस मनाने के बावजूद आज पर्यावरण को पहले से कहीं अधिक ख़तरा है. तो आख़िर गड़बड़ी कहां हुई? डॉक्टर दीपक आचार्य इस बारे में आपको रूबरू करवा रहे हैं अपने नज़रिए से.

आज फिर चूरण की पुड़िया दी जाएगी दुनियाभर में और चूरण की उस पुड़िया में कुछ ख़ास होगा नहीं. चिंतन होगा, मनन होगा, ज्ञान पिलाई की बातें होंगी… विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाएगा. यक़ीन मानिए जितनी ज़िद से इस दिन को पिछले करीब 50 वर्षों से मनाया जा रहा है, बच्चे-बच्चे को याद हो चुका है कि 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है. हमें ये तारीख़ रटा दी गई है, यही अचीवमेंट है सिस्टम का. हर वर्ष वही ज्ञान पेला जाता है, इस वर्ष भी वही चूरण बंटेगा, पूरे 24 घंटे और फिर हथेली पर चिपके चूरण को पेपर नैप्किन से साफ़ करके डस्टबिन में फेंक दिया जाएगा.

ज्ञानी विज्ञानी लोग व्याख्यान करेंगे, कुछ ब्लू प्रिंट्स तैयार किए जाएंगे, कुछ ऑनलाइन, कुछ ऑफ़लाइन इवेंट्स भी होंगे… होने भी चाहिए, ताकि यह तारीख़ हम भूल न जाएं. वर्ष 2005 में ‘ग्रीन सिटीज़- प्लान फ़ॉर द प्लेनेट’ थीम पर एक इंटरनैशनल इवेंट किया गया था सैन फ्रांसिस्को में. दुनियाभर के चिन्तक आए, कई अंतरराष्ट्रीय ग़ैर सरकारी संस्थाएं भी थी, सबने बैठक करके प्रण लिया कि दुनियाभर के महानगरों, नगरों को ग्रीन कवर से ढांक दिया जाएगा, ओज़ोन के छेद में ढक्कन लगा देंगे और उसे बंद कर देंगे, सघन जनसंख्या वाले शहरों और नगरीय क्षेत्रों में ताबड़तोड़ प्लानिंग्स के साथ पर्यावरण दुरुस्ती को अंजाम दिया जाएगा… तारीख़ों के सेलिब्रेशंस और तमाम आयोजनों से कुछ हासिल होगा, आपको लगता है? लोग उम्मीद कर रहे हैं कि इस वर्ष की विश्व पर्यावरण दिवस की थीम के बाद से कुछ अलग होगा, इस वर्ष की थीम ‘सलूशन्स टू प्लास्टिक पलूशन’ है. अब हम 15-20 वर्ष बाद देखेंगे कि चूरण कितना पाचक था.

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ये यूनाइटेड नेशन दे दनादना तारीख देता रहता है, वर्ष दर वर्ष..ये डे, वो डे, अलाना डे, फलाना डे…कब तक और कितने सालों तक ये सब किया जाएगा? डेडलाइन तय करनी चाहिए कि फलाने वर्ष तक टारगेट अचीव कर लिया जाएगा, फलाने वर्ष के बाद इस सेलिब्रेशन को आराम दिया जाएगा. ठीक वैसा ही सेलिब्रेशन, जैसा रूस में मैंने देखा था. एक गांव में अस्पताल बंद होने पर लोग मिठाई बांट रहे थे, क्योंकि उन्हें अस्पताल की ज़रूरत नहीं, वहां लोगों ने अपना खानपान, रहन-सहन बदलकर बीमार होने का सिलसिला ख़त्म कर दिया, अब वे उस हद तक बीमार नहीं पड़ रहे थे कि उन्हें अस्पताल में दाख़िल होना पड़े. कुछ सलिब्रेशन्स की डेडलाइन ज़रूरी है, अब विश्व पर्यावरण दिवस को ही लीजिए, करीबन 50 वर्ष से एक ही पंचायत चल रही ‘पर्यावरण बचाओ जी’. इस पचास वर्ष पुराने बासे चूरण को खाकर कोई दुरुस्त होने का नाम नहीं ले रहा.

कुछ नया करना होगा, हम सबको. कुछ नया…यह कुछ नया, कुछ नया नहीं है…वही पुराना है, बुज़ुर्गों का अनुभव और ज्ञान… ध्रुवीय भालुओं की फ़िक्र मत करो, पिघलते ग्लेशियर की फ़िक्र मत करो, ग्लोबल वॉर्मिंग की चिंता न करो, ओजोन के छेद पर चिंतन मत करो, नदियों को बचाने कार रैली मत निकालो, नदियों की फ़िक्र मत करो, बल्कि नल से पानी टप-टप टपक रहा है तो ये टपकना बंद करवा दो, कमरे से बाहर निकलने वाला आख़िरी व्यक्ति कमरे के तमाम स्विच बंद कर दे, प्लास्टिक से दूरी बनाना शुरू करो, पौधरोपण में एनर्जी बर्बाद मत करो, जितने बचे हैं, उन्हें ही बचा लो बस… आप घर की इन समस्याओं से पार पा लीजिए, ध्रुवीय भालू अपने आप बच जाएंगे.

घर के किसी बुजुर्ग के साथ बैठकर बात कीजिए, पता तो कीजिए कि उनके दौर का ‘घी’ या ‘शहद’ हमारे दौर तक आते आते ‘शुद्ध घी’ और ‘शुद्ध शहद’ कैसे हो गया? ये शुद्ध लिखने की नौबत क्यों आई? पता कीजिए कि उनके ज़माने में बगैर एसी या कूलर के वो लोग ज़िंदा रह कैसे गए? पता तो कीजिए कि बगैर फ्रिज उनकी सब्ज़ियां कैसे ताज़ी रह पाती थी? पता तो कीजिए कि वे बगैर केमिकल के खेती कैसे कर लेते थे? पता तो कीजिए कि धूप और किरणों से बचने के लिए उन्होंने कौन से सन ग्लासेस पहने थे? ये भी पता करें कि तालाब और कुएं कहां खो गए? एक बात और पूछ लीजिएगा कि वो लोग कौन-सी कंपनी का बोतलबंद मिनरल वाटर पीते थे?

पांच मिनिट चैन से बैठकर बात करेंगे तो पता चलेगा कि लोचा फिलहाल हमारे आसपास ही है. ख़ैर! सब अच्छा होगा, हम ख़ुद बदल जाएं बस. उम्मीद पर नहीं, ख़ुद पर कायम हो जाएं हम.

फ़ोटो: पिन्टरेस्ट

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डॉक्टर दीपक आचार्य

डॉक्टर दीपक आचार्य

डॉक्टर दीपक आचार्य, पेशे से एक साइंटिस्ट और माइक्रोबायोलॉजिस्ट हैं. इन्होंने मेडिसिनल प्लांट्स में पीएचडी और पोस्ट डॉक्टरेट किया है. पिछले 22 सालों से हिंदुस्तान के सुदूर आदिवासी इलाक़ों से आदिवासियों के हर्बल औषधीय ज्ञान को एकत्र कर उसपर वैज्ञानिक नज़रिए से शोध कर रहे हैं.

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