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Home ज़ायका

गुजराती व्यंजन से ग्लोबल डिश हो चुके थेपलों का इतिहास

कनुप्रिया गुप्ता by कनुप्रिया गुप्ता
March 12, 2021
in ज़ायका, फ़ूड प्लस
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मज़े की बात यह है कि आप शक्कर या गुड़ खाने से कहीं से भी बच जाएं, लेकिन गुजराती खाने में आपको शक्कर या गुड़ मिलेगा ही और आमतौर पर गुजराती लोग भी स्वाभाव के मीठे होते हैं, मिठास से भरे हुए. आज गुजराती लोगों की बात इसलिए कि आज का हमारा व्यंजन भी तो गुजरात से ही है.

गुजरातियों की मिठास की बात तो हमने कर ली, पर आज हम जिस व्यंजन की बात करेंगे उसमें बहुत ज़रा-सी शक्कर होती है और उसका स्वाद तो मीठा नहीं होता, लेकिन उसका असर मीठा होता है. वो इसलिए क्योंकि ज़्यादातर लोगों के लिए ये व्यंजन सफ़र में घर की याद को साथ लिए चलने के साधन के जैसा है. आसानी से अपने साथ दुनिया के किसी भी कोने में ले जाने और उसे कुछ दिनों तक आसानी से खाए जा सकने की इसकी ख़ूबी ही इसे ख़ास बनाती है. वैसे तो ऐसे कई नाश्ते की तरह के व्यंजन ऐसे हो सकते हैं, पर इस व्यंजन की ख़ूबी ये भी है कि ज़रा-से अचार या दही के साथ इसे पूरे भोजन की तरह खाया जा सकता है.
जी हां, बात हो रही है थेपले की. आप चाहे रेलगाड़ी में हो या हवाई जहाज में, बस में हों या नाव में, अगर कोई गुजराती आपके साथ सफ़र कर रहा है तो इस बात की पूरी सम्भावना है कि उसके टिफ़िन से निकले थेपले की ख़ुशबू आप तक पहुंच ही जाए.
गेहूं के आटे में थोड़ा बेसन, तेल, अजवाइन, दही, नमक और कुछ मसाले मिलाकर बनाए जाने वाले ये थेपले आम घरों में बनने वाले मेथी के परांठों से अलग होते हैं. पर अगर कोई आटे में मेथी और मसाले डालकर मेथी परांठे बना रहा है तो भी वो स्वाद और टेक्सचर में थेपले जैसा होगा, यह नहीं कहा जा सकता और यह बात मुझे भी काफ़ी वक़्त बाद समझ आई.
मेरे अपने घर में ज़्यादातर मेथी के परांठे, आटे में मेथी मिलाकर ही बनाए जाते थे. शादी के बाद मुंबई पहुंची तो एक बार बात आई कि थेपले बना लिए जाएं. वैसे तो ये नाम ही मैंने पहली बार सुना था, पर जब देखा तो सोचा मेथी के परांठे जैसे ही तो दिख रहे, लेकिन बनाया तो वो स्वाद नहीं आया. अलग-अलग रेसिपी देखकर उसके बाद कई बार ट्राय किया, पर बात यह है कि जो चीज़ आपने उसके मूल रूप में कहीं देखी या खाई न हो तो आप अंतर समझ ही नहीं पाते और और थेपले के साथ एक बात ये भी थी कि ये फ़ोटो में देखने पर मेथी के परांठों जैसे ही दिख रहे थे. फिर एक बार हमें एक फ़ूड स्टोर पर मेथी के थेपले दिखे, हमने ख़रीद लिए. घर आकर पैकेट खोला तो देखा कि इनका टेक्स्चर अलग था, थोड़े ट्रांस्पैरेंट से, एकदम पतले और नरम और स्वाद भी कुछ नमकीन और साथ ही हलकी सी खटास व मिठास लिए. और फिर शुरू हुई मेरी थेपले वाली जर्नी…

कहानी थेपलों की: गुजराती लोग मुख्य रूप से शाकाहारी हुआ करते थे. आज भी गुजरात में आपको शाकाहारी व्यंजनों का बोलबाला मिलेगा, हालांकि कुछ समुदाय हैं जिनमें आपको मांसाहार का प्रचलन मिलेगा, पर ज़्यादातर लोग वेजेटेरियन खाने के दीवाने हैं और दूसरी बात इन लोगों में एक बहुत बड़ा तबका व्यापारी लोगों का भी है. बहुत पुराने समय से गुजराती व्यापारी, अपने व्यापार के लिए देश-विदेश जाते रहें हैं और इनकी समस्या यह थी कि हर जगह इन्हें आसानी से शाकाहारी खाना नहीं मिल पाता था. पुराने समय में हर जगह होटल भी नहीं हुआ करते थे. आज भी विदेशों में शाकाहारी व्यंजन हर जगह नहीं मिल पाते उन्हें ढूंढ़ना पड़ता है, उस ज़माने में तो ये और भी मुश्क़िल था. ऐसे वक़्त में गुजराती गृहणियों ने अपने घर के पुरुषों के लिए आटे में मेथी, मसाले और मोयन मिलाकर थेपले बनाने शुरू किए जो सफ़र में कुछ दिनों तक आसानी से खाए जा सकते थे और इनमें मेथी की पूरी की तरह ज़्यादा तेल भी नहीं था तो ये पेट और स्वास्थ्य दोनों के लिए अच्छे थे.
लिखित रूप से थेपलों का कोई इतिहास नहीं मिलता, क्योंकि शायद इसे गृहणियों ने बनाया था और खाना बनाना उनका काम ही था तो उनका किया कुछ नया काम शायद किसी की नज़रों में नया नहीं था. देखिए न जिन थेपलों का कोई इतिहास नहीं लिखा गया उन्होंने ख़ुद ही इतिहास लिख दिया! आज थेपले गुजरातियों के साथ दुनिया के हर कोने में पहुंच गए हैं और देश के हर हिस्से में बनाए, खाए और सफ़र में ले जाए जाने लगे हैं.

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क़िस्से थेपलों के: आप ने कई जगह एयर होस्टेस से या आम लोगों से गुजरातियों के थेपला प्रेम के क़िस्से सुने होंगे, पर एक बार मेरे एक भारतीय दोस्त से बताया कि वो भारत से अमेरिका आते समय अपने साथ कुछ थपले ले आया और वो थेपले उसके रूम मेट के हाथ लग गए. बस फिर क्या था अगले सात दिन तक उसने हर रूप में थेपले खाए, टॉर्टिला की तरह, रोल की तरह, नचोस की तरह कड़क करके, ग्वाकमोली के साथ, योगर्ट के साथ, सॉस के साथ… कहने का मतलब हर वो तरीक़ा, जो उसे नज़र आया उसे आज़माकर वो बड़े शौक़ से थेपले खाता रहा.
दूसरा क़िस्सा मेरी एक दोस्त ने सुनाया. वो परिवार के साथ यहां एक ट्रिप पर गए थे. घर से कुछ थेपले बना ले गए थे. एक जगह उन्हें दूर-दूर तक होटल नहीं मिली और साथ में बच्चे थे. अगर होटल के लिए दूर जाते तो जो घूमने आए थे वो अधूरा रह जाता. उस वक़्त दो दिन पुराने थेपले काम आए, क्योंकि थेपले लम्बे समय तक ख़राब नहीं होते.
तो ये थी कहानी थेपलों की. आप भी बनाते होंगे न थेपले या इससे मिलता-जुलता सा कुछ? आपके पास भी कुछ क़िस्से हों शायद इससे जुड़े हुए? हमें ज़रूर बताइएगा कमेंट में या इस आई डी पर: oye.aflatoon@gmail.com
और हम जल्द मिलेंगे अगले क़िस्से के साथ…

फ़ोटो: इन्स्टाग्राम

Tags: history of theplatheplathepleweekly columnकनुप्रिया गुप्तागुजराती थेपलेथेपलाथेपलेथेपले का इतिहाससाप्ताहिक कॉलम
कनुप्रिया गुप्ता

कनुप्रिया गुप्ता

ऐड्वर्टाइज़िंग में मास्टर्स और बैंकिंग में पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा लेने वाली कनुप्रिया बतौर पीआर मैनेजर, मार्केटिंग और डिजिटल मीडिया (सोशल मीडिया मैनेजमेंट) काम कर चुकी हैं. उन्होंने विज्ञापन एजेंसी में कॉपी राइटिंग भी की है और बैंकिंग सेक्टर में भी काम कर चुकी हैं. उनके कई आर्टिकल्स व कविताएं कई नामचीन पत्र-पत्रिकाओं में छप चुके हैं. फ़िलहाल वे एक होमस्कूलर बेटे की मां हैं और पैरेंटिंग पर लिखती हैं. इन दिनों खानपान पर लिखी उनकी फ़ेसबुक पोस्ट्स बहुत पसंद की जा रही हैं. Email: guptakanu17@gmail.com

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