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ओए अफ़लातून
Home बुक क्लब कविताएं

होली: डॉ संगीता झा की कविता

डॉ संगीता झा by डॉ संगीता झा
March 28, 2021
in कविताएं, बुक क्लब
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मूलत: कहानीकार डॉ संगीता झा की होली पर लिखी इस लंबी कविता को आप एक काव्यात्मक कहानी की तरह पढ़ सकते हैं. इस कविता में एक महिला के बचपन, किशोरावस्था और प्रौढ़ावस्था को एक कॉमन धागे से नत्थी किया गया है. वह धागा है होली के त्यौहार का. आप पढ़ने में ज़्यादा विश्वास नहीं रखते तो ख़ुद कवयित्री की आवाज़ में इसे सुन भी सकते हैं.

सालों पहले मेरा एक बचपन था
जिसमें केवल सच पन था
ख़ुशियां थी ढेर सारी
पैसा थोड़ा कम था
दिल के थे अमीर हम
बचपन में बड़ा दम था
यादों के उन गलियारों में
अभी भी मैं तफ़री कर आती हूं
आज भी उन गलियारों की यादों में
ख़ुशियां ढेरों पा जाती हूं
जुड़े हुए थे तब दिल सबके
जुड़े हुए थे सबके घर
मेरे घर को जाती थी
एक चौड़ी लम्बी सी डगर
उस डगर के उस पार
एक लंबा चौड़ा नाला था
सारे बचपन में घर छोड़
वहीं मैंने अपना डेरा डाला था
वहीं बनाती मैं मिट्टी के चावल
और अधपकी पत्थर की दाल
कभी कभी हरी घास की सब्ज़ी
और बुनती सपने बेमिसाल
सारी सखियां रोज़
घर पर मेरे खाना खाने आतीं
अपने साथ कभी-कभी वो भी
गोबर कचरे के पापड़ ले आतीं
बचपन में मेरे सपने ही सपने थे
अम्मा बुआ चाची मामी सब अपने थे
सोचो क्या-क्या ना हुआ करता था
उस बचपन से हर कोई जलता था
जले कैसे ना हमारे पास ख़ुशियों का
एक बड़ा ज़ख़ीरा हुआ करता था
जिसने भी देखा था हमें वो
ऐसे ही बचपन की दुआ करता था
उसके बाद चुपके से जवानी ने
क़दम रखा ही था
हमने ख़ुद को निहारने सराहने
का सुख चखा ही था
वो तो एक होली का दिन था
हर दिनों से वो कुछ भिन्न था
मेरा मुंह लाल पीला नीला था
उस पर चिपका कीचड़ गीला था
खेल कर होली बैठी थी मैं
अपने उस बचपन के नाले के साथ
आंखों में कुछ सपने बुनते हुए
नाले की मुंडेर पर था मेरा हाथ
अचानक पीछे से आकर चुपके से
किसी ने ली आंखें मेरी भींच
खुमारी का एक बीज था अंदर
प्यार की हल्की बारिश में गया वो सींच
पलट के जो देखा उसे
नज़रों से उसकी नज़रें मेरी टकराई
वो भी एकटक देखता रहा
ना मैंने, ना उसने पलकें झपकाईं
मेरी तरह उसका चेहरा भी
नीला-पीला लेकिन आंखें चमकीली
एकटक निहारती रही मैं उसे बस
उसकी भी थी मुझ पर नज़र कटीली
तुरंत हो गया गुम वो छू कर मेरा दिल
उन क़ातिलाना नज़रों से मन गया खिल
उसके बाद जो हुआ वो ना जानो
क्या-क्या ना किया मैंने मानो ना मानो
वो आंखें इस क़दर दिल को भा गईं
दिल पर उन आंखों की खुमारी छा गई
उन आंखों की तलाश में चकरघिन्नी सी घूमती
अपने सपनों को बड़ी उम्मीदों से सींचती
चप्पे-चप्पे गली-गली उन नज़रों को छाना
हालत देख मेरी सबने मुझे पागल माना
कहीं नहीं लगा फिर मेरा दिल
ज़िंदगी बन गई मेरी मुश्क़िल
खिलखिलाती हवा से एक संजीदी लड़की
किसी के लिए भी दोबारा आंख ना फड़की
घर वालों ने कर दिया मुझे तैयार
दूल्हा आया मेरा होके घोड़ी पे सवार
वरमाला लिए मैं मंडप की ओर बढ़ी
मेरी आंखें फिर उन्हीं आंखों से लड़ी
खड़े-खड़े मैं ज़ोर से लड़खड़ाई
मेरी आंखें जब उन्हीं आंखों से टकराईं
वही आंखें जिन्हें बरसों से ढूंढ़ रही थी
कितना दर्द कितनी तन्हाई सही थी
इधर देखिए जब फ़ोटोग्राफ़र ने कहा
फूट पड़ी मैं मुझसे ना गया रहा
वही आंखें फ़ोटोग्राफ़र बन सामने खड़ी थी
हाथ में मेहंदी पैरों में पायल की बेड़ी थी
बरसों पहले वो एक होली का दिन था
हर दिनों से वो बड़ा भिन्न था
लेकिन जो मेरी शादी का दिन था
उस दिन दिल बड़ा खिन्न था
बरसों पुराना प्यार सामने खड़ा था
लोक लाज शर्म हया का पर्दा बड़ा था
मैं मजबूर थी, बेबस थी गई ज़माने से हार
चूं ना चां चुपचाप डाल दिए हथियार
हर होली पर आज भी बरसों बाद
वो आंखें आती हैं बड़ी याद… बड़ी याद…

Illustration: Pinterest

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डॉ संगीता झा

डॉ संगीता झा

डॉ संगीता झा हिंदी साहित्य में एक नया नाम हैं. पेशे से एंडोक्राइन सर्जन की तीन पुस्तकें रिले रेस, मिट्टी की गुल्लक और लम्हे प्रकाशित हो चुकी हैं. रायपुर में जन्मी, पली-पढ़ी डॉ संगीता लगभग तीन दशक से हैदराबाद की जानीमानी कंसल्टेंट एंडोक्राइन सर्जन हैं. संपर्क: 98480 27414/ sangeeta.jha63@gmail.com

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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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