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ओए अफ़लातून
Home ज़ायका

इस लड्डूमय मौसम में इतिहास के झरोखे से जानिए लड्डू को

कनुप्रिया गुप्ता by कनुप्रिया गुप्ता
September 10, 2021
in ज़ायका, फ़ूड प्लस
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त्यौहारों का मौसम आ गया है और साथ में आ गए हैं हम सब के प्रिय गन्नू महाराज. घर से दूर परदेस में बैठी मैं गणपति बाप्पा को याद कर रही हूं और याद कर रही हूं इस त्यौहार की चहल-पहल को. पिछले दो बरसों में त्यौहार भारत में भी वैसे न रहे जैसे उसके पहले हुआ करते थे, ज़िंदगियां सिमट गईं, चहल-पहल पर भी असर हुआ है, लेकिन त्यौहारों की रौनक चाहे कितनी ही कम हो जाए, हमारी श्रद्धा कहीं कम न हुई और न ही कम हुआ हमारा अटूट विश्वास. और सोचिए न जब गणेश जी आते हैं तो क्या आता है उनके साथ? ठीक पहचाना आपने उनके साथ आते हैं लड्डू! तो आज बात करेंगे लड्डू की.

नारंगी रंग की मोतियों से चमकती बूंदी और उसे हाथों से बांधकर बनाए हुए लड्डू क्या याद दिलाते हैं आपको? ये न कहिएगा की सिर्फ़ गणेश चतुर्थी याद आती है, क्योंकि मोतीचूर (बूंदी) से बने लड्डुओं का सम्बन्ध सिर्फ़ गणेश जी से तो नहीं है ये तो पंद्रह अगस्त की यादों से भी जुड़े हुए हैं, है ना? आख़िर बरसों हम सवतंत्रता दिवस पर इन लड्डुओं का पैकेट अपने साथ घर लाते रहे हैं. हालांकि यह बात अपनी जगह सही है कि गणेश चतुर्थी के लड्डू और पंद्रह अगस्त के लड्डुओं में न जाने कितनी दूर से देखकर ही फ़र्क़ पता लगाया जा सकता था, पर आख़िर थे तो दोनों मोतीचूर के ही लड्डू.

अब मोतीचूर के लड्डू सुनकर आपको वो गाना तो याद आ ही गया होगा “सुन राजा शादी लड्डू मोतीचूर का जो खाए पछताए जो न खाए पछताए” अब शादी के पहले मैं बरसों सोचती रही ये गाना आख़िर क्यों ही बनाया गया होगा, पर शादी के बाद ख़ुद ब ख़ुद समझ आ गया. हां, आपको न समझ आए तो शादी कर लीजिए या मोतीचूर का पंद्रह अगस्त का लड्डू खा लीजिए इस धोखे में कि वो गणेश चतुर्थी के लड्डू जैसा देसी घी से बना हुआ और उतना ही स्वादिष्ट होगा… हालांकि वो भी बुरा नहीं होता, पर गणेश जी के लिए बने बारीक़ बूंदी से बने लड्डुओं की तो बात ही लग होती है!

इतिहास के झरोखे से: जब लड्डू का इतिहास खंगालेंगे तो पाएंगे कि भैया लड्डू तो अपने जन्म के समय मिठाई थे नहीं, ये गोलू-मोलू साहब तो दवाई थे. विश्वास नहीं होता न? अच्छा बताइए, सुश्रुत का नाम तो सुना होगा न आपने और अब अगर मैं कहूं कि लड्डू की खोज सुश्रुत ने की, ऐसे उल्लेख मिलते हैं तब तो मेरी बात पर विश्वास करेंगे न? तो इतिहास के पन्ने कहते हैं कि सुश्रुत अपने यहां आए मरीज़ों को तिल, मूंगफली, गुड़ और कुछ जड़ी-बूटियों को लड्डू के आकार में बनाकर दवाई की तरह देते थे. हां, कहीं-कहीं ये भी लिखा मिलेगा कि किसी वैद्य से ग़लती से दवाई की सामग्री घी में गिर गई थी और उसके बाद उस दवाई को बेकार होने से बचाने के लिए उसका लड्डू बनाकर मरीज को दिया गया. एक प्रचलित कहानी के अनुसार, चोल राजवंश के सैनिक अपने साथ युद्ध में जाते समय नारियल के लड्डू ले जाते थे, क्योंकि ये खाने में पौष्टिक होते थे और लम्बे समय तक ख़राब भी नहीं होते थे.

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लड्डू तेरा रूप एक, पर रंग अनेक, स्वाद अनेक: लड्डुओं की गिनती करें क्या? अच्छा बताइए तो कितने लड्डू जानते हैं आप? बेसन के लड्डू ,संक्रांति पर तिल-गुड़ के लड्डू, सूजी के लड्डू , नारियल के लड्डू , मोतीचूर के लड्डू , गोंद के लड्डू , उड़द के लड्डू, ड्राई फ्रूट के लड्डू, मूंग दाल के लड्डू, परमल के लड्डू, आटे के लड्डू, चूरमा के लड्डू, मावा के लड्डू और आजकल खोपरे में तरह तरह की चीज़ें मिलाकर बनाए जाने वाले लड्डू, जैसे- पान लड्डू , गुलकंद लड्डू ,केसर लड्डू और भी न जाने क्या-क्या… हालांकि यह सच है कि लड्डू का जन्म भारत में हुआ, पर यह भी सच है कि भारत के अलग-अलग कोने में अलग-अलग लड्डू अपना स्थान जमाकर बैठे हैं. अच्छा इन सारी बातों में हम एक लड्डू तो भूल ही गए, कौन से? अरे जापे वाले लड्डू ,बच्चे के जन्म के बाद जच्चा को दिए जाने वाले इन लड्डुओं का महत्त्व तो हर मां समझती है. हां, अगर आपको न पता हो तो अपनी मम्मी से पूछिए, इस बहाने दो घड़ी मम्मी से बातें भी हो जाएंगी.

कहानियां लड्डू की: प्रसाद में भोग लगते लड्डू और उन्हें खाने के लिए आतुर कोई छोटा-सा बच्चा… ये सीन कितनी ही बार आंखों के सामने से गुज़रा होगा न? हालांकि मैं वो बच्चा कभी नहीं रही, पर अच्छा लगता है ऐसे मीठे के शौक़ीन लोगों को देखकर. मुझे हमेशा बेसन के लड्डू अच्छे लगते रहे और मेरे बेटे को भी बेसन के लड्डू पसंद हैं. जब हम छोटे थे तो हमारे घर में गणेश चतुर्थी पर दाल-बाफले और लड्डू बनते थे, जो चूरमा वाले होते थे या कभी-कभी सूजी वाले भी. सारे बचपन घर में सूजी के लड्डुओं का एक डब्बा सालभर देखा मैंने, जो हर 15 दिन में बनाकर रख दिए जाते थे. मैं लड्डू उतने नहीं बनती, पर आज गणेश चतुर्थी पर तो लडूअन का भोग लगाना ही होगा न! नहीं तो मेरा बेटा टोक देगा, मम्मी आरती में तो गा रही थी लडूअन का भोग लगे संत करे सेवा, तो बताओ लड्डू कहां हैं? तो हम तो बनाएंगे बेसन के लड्डू और ले आएंगे बाप्पा को अपने घर. आपको कौन से लड्डू पसंद हैं हमें भी बताइएगा इस आई डी पर: www.oyeaflatoon.com
तो जल्द ही मिलते हैं अगले क़िस्सों के साथ तब तक- गणपति बाप्पा मोरिया!!

फ़ोटो: पिन्टरेस्ट

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कनुप्रिया गुप्ता

कनुप्रिया गुप्ता

ऐड्वर्टाइज़िंग में मास्टर्स और बैंकिंग में पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा लेने वाली कनुप्रिया बतौर पीआर मैनेजर, मार्केटिंग और डिजिटल मीडिया (सोशल मीडिया मैनेजमेंट) काम कर चुकी हैं. उन्होंने विज्ञापन एजेंसी में कॉपी राइटिंग भी की है और बैंकिंग सेक्टर में भी काम कर चुकी हैं. उनके कई आर्टिकल्स व कविताएं कई नामचीन पत्र-पत्रिकाओं में छप चुके हैं. फ़िलहाल वे एक होमस्कूलर बेटे की मां हैं और पैरेंटिंग पर लिखती हैं. इन दिनों खानपान पर लिखी उनकी फ़ेसबुक पोस्ट्स बहुत पसंद की जा रही हैं. Email: guptakanu17@gmail.com

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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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