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ओए अफ़लातून
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बोलती चिट्ठी: दीप्ति मित्तल की नई कहानी

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
September 1, 2021
in ज़रूर पढ़ें, नई कहानियां, बुक क्लब
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बोलती चिट्ठी: दीप्ति मित्तल की नई कहानी
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कोरोना काल में एक महिला, फिर चाहे वो कामकाजी हो या गृहणी, की मनोदशा को हूबहू व्यक्त करती ऐसी कहानी, जो हर महिला को बेहद अपनी लगेगी. यदि आप महिला हैं तो इस कहानी को पढ़कर आपको लगेगा कि ये तो मेरी ही बात है और यदि पुरुष हैं तो शायद आप अपनी पत्नी समेत जाननेवाली सभी महिलाओं के प्रति थोड़ा संवेदनशील तो हो ही जाएंगे. एक ऐसी कहानी, जिसे सभी को पढ़ना चाहिए.

प्रिय पतिदेव,
अत्र कुशलम् तत्रास्तु.
इस पंक्ति को पढ़ते ही तुम कहोगे, अरे! ये क्या लिख दिया? पर क्या करूं! इस पंक्ति के बिना कोई चिट्ठी शुरू ही नहीं हो पाती मुझसे… वैसे इसका अर्थ है- मैं यहां (इस बेडरूम में) कुशलतापूर्वक हूं और तुम्हारी वहां (उस गेस्ट रूम में जो पिछले डेढ़ साल से तुम्हारा नया ऑफ़िस है) कुशलता की प्रार्थना करती हूं.
ये चिट्ठी तुम्हारे नाम लिख रही हूं, हालांकि मैं जानती हूं कि तुम इसे कभी नहीं पढ़ोगे, क्योंकि मैं इसे कभी तुम्हें दूंगी ही नहीं. वैसे भी अगर तुम्हें कुछ पढ़वाना ही होता तो चिट्ठी क्यों लिखती, ईमेल या मैसेज ना कर देती? यही तो कहते हो ना तुम, जब मैं तुम्हें कुछ अपना लिखा पढ़ने को कहती हूं-‘ईमेल कर दो ना प्लीज़… बाद में पढ़ लूंगा.’

अब सवाल यह है कि जब चिट्ठी देनी ही नहीं है तो उसे लिखने का फ़ायदा ही क्या? मगर फ़ायदा है जनाब! क्योंकि हर चिट्ठी भावनाओं के संप्रेषण के लिए नहीं लिखी जाती! कुछ चिट्ठियां भावनाओं के वमन के लिए भी लिखी जाती हैं, यानि इमोशनल वोमिटिंग के लिए… समझे! वे बातें जो शायद तुमसे कभी नहीं कह पाऊंगी आज तुम्हारे नाम की चिट्ठी में लिख रही हूं.
अच्छा, क्या तुम्हें याद हैं वे दिन, जब तुम रोज़ सुबह तैयार होकर, मेरे द्वारा सुबह-सुबह प्रेस की हुई पैंट-शर्ट पहन, गॉगल लगा ऑफ़िस जाया करते थे! तुम्हारे कंधे पर लैपटॉप बैग और हाथ में वो तीन डब्बों वाला लंच बॉक्स कितना सुंदर लगता था. तुम कहा करते थे,ये टिफ़िन नहीं तुम्हारा प्यार है, जो ऑफ़िस में हल पल मेरे साथ रहा करता है.’ जाते हुए तुम्हारा मुझे किस करना और मेरा देर तक ‘सीयू, बाय कहना…’ कितने प्यारे क्षण हुआ करते थे वे! मुस्कुराहटों को ओढ़े, प्रेम से भरे, संपूर्णता का एहसास दिलाते क्षण कि मैंने फिर एक जंग जीत ली! तुम्हें समय से नाश्ता-पानी करा कर, टिफिन थमा कर विदा कर दिया! आज सोचती हूं तो सुबह तुम्हारे जाने का और शाम को लौट आने का रूटीन एक सुंदर सपने जैसा लगता है.

सच ही है, प्यार में कुछ घंटों की दूरी भी उसे ताज़ा बनाए रखती है. ये रोज़ का बिछड़ना, फिर मिलना, उसे प्राणवायु देता है…. और उस प्यार में बंधे प्रेमियों को कुछ स्पेस भी.
प्रेम में स्पेस ज़रूरी है. कोई इंसान पूरे दिन सिर्फ़ एक प्रेमी या पार्टनर बन कर नहीं रह सकता. वह वो भी होना चाहता है, जो वह वास्तव में है. यह हर किसी की ज़रूरत होती है इसीलिए हमें प्रेम में भी स्पेस चाहिए, भले ही थोड़ी देर का ही सही…
यह स्पेस मुझे तुम्हारे ऑफ़िस जाने और शाम को लौट आने के बीच मिलता था. उस समय मैं तुम्हारी प्रेमिका या पत्नि नहीं बल्कि सिर्फ़ ‘मैं’ हुआ करती थी. वो मैं, जिसे पुराने गाने सुनते हुए घर के काम निपटाना, सोशल मीडिया पर भटकते हुए सुकून से चाय पीना, सहेलियों से गप्पें लगाना और कुछ अच्छा पढ़ना-लिखना पसंद था. मेरा ये ‘मी टाइम’ मेरी लाइफ़ की ऑक्सिजन था, जिसे इस मुए कोरोना ने छीन लिया. मेरे लिए तो ये राहूकालम बन कर आया है जैसे.

वैसे मैं ईश्वर की शुक्रगुज़ार हूं कि इस पूरे समय में हम स्वस्थ रहे, बिनी किसी परेशानी के रहे मगर मुझसे मेरा ऑक्सिजन, मेरा ‘मी टाइम’ छिन गया. सुबह पसंदीदा गाने चलाती हूं तो एक आवाज़ बेंध देती है,‘मेरा कॉल है यार, शोर मत करो!’ तब बहुत ग़ुस्सा आता है मुझे! अब कोई किशोर कुमार और हेमंत दा के संगीत को शोर कहे, ये गुनाह मैं कैसे बर्दाश्त कर लूं?
और वो मेरे फ़ोन कॉल्स पर टिके तुम्हारे कान!!! मुझे तो ये बात आज तक समझ नहीं आई जब मैं तुम्हारे कमरे में झांककर, तुम्हें हेडफ़ोन पहनेऑफ़िशल कॉल में मगन देख, पूरी आश्वस्त हो, अपनी सहेली को गप्पें मारने के लिए फ़ोन मिलाती हूं तो तुम ठीक उसी बीच उठकर बाहर चले आते हो…. कभी चाय की डिमांड करने, कभी यूं ही टहलने… और फिर कैसी तेढ़ी नज़रों से देखते हो मुझे! उस वक्त तुम्हारी आंखों में साफ़ लिखा होता है कि तुम्हारे लिए मैं दुनिया की सबसे वेल्ली, गपोड़ी स्त्री हूं… अब तो खुल कर कहने लगे हो ‘जब देखो फ़ोन पर ही रहती हो’ वाह! ये क्या बात हुई भला! तुम्हारे फ़ोन ज़रूरी और हमारे फ़ोन फ़ालतू!

वैसे तुम्हारी जानकारी के लिए बता दूं कि जो लोग दिन में घंटाभर खुले मन से किसी से गप्पें हांक लेते हैं, उनका मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य बहुत अच्छा रहता है. वे अकारण ही बहुत ख़ुश रहते हैं. ये ऐसी ख़ुशी की ख़ुराक होती है, जिसे दुनिया का कोई डाक्टर, कोई दवा, कोई एनर्जी ड्रिंक नहीं दे सकती. साथ ही, वे दुनिया के सबसे ख़ुशनसीब लोग होते हैं, क्योंकि उनके पास कोई एक ऐसा बंदा है, जिससे वे दिल से बात कर सकें, दिमाग़ से नहीं.
मेरी इस ख़ुशनसीबी से तुम्हें जलन क्यों है भई! और वैसे भी तुम्हे समय से खाना-पीना मिल रहा है, चाय-कॉफ़ी मिल रही है, मैं तुम्हें डिस्टर्ब नहीं कर रही हूं और भला क्या चाहिए तुमको एक बीवी से! कहे देती हूं, ये हर वक़्त तुम्हारी सीसीटीवी जैसी नज़रों में क़ैद रहना मुझे ज़रा भी पसंद नहीं!

जानते हो तुम्हारे ‘वर्क-फ्रॉम-होम’ का मुझे सबसे बड़ा नुक़सान क्या हुआ? वे काम जो एक तय समय पर ख़त्म हो जाते थे, दिनभर में फैल गए. कभी तुम्हारे ‘स्नैक्स ऑन डिमांड’ की वजह से, कभी तुम्हारे फ्री होने पर तुम्हें कंपनी देने के कारण… साथ ही, इन सबके बीच मेरा पढ़ना छूट गया. तुम नहीं जानते! किताबें, किस्से-कहानियां पढ़ना मेरे लिए उतना ही ज़रूरी है, जितना तुम्हारा इतने बिज़ी शेड्यूल में भी न्यूज़ या क्रिकेट मैच देख लेना.
वो उपन्यास, जो पिछले साल मार्च में शुरु हुआ था अभी तक पूरा नहीं हो पाया था… तभी मुझे उस दिन तुमसे लड़ाई करनी पड़ी. नहीं…नहीं! वो वाली लड़ाई नहीं, जिसमें हमने एक दूसरे के ख़ानदानों को जम कर कोसा था, वो तो सच्ची थी! बल्कि वो वाली, जिसमें तुमने कसम खाई थी कि मेरे हाथ का बना खाना नहीं खाओगे और मैंने कसम खाई थी कि तुमसे ज़िन्दगीभर बात नहीं करूंगी. हालांकि मैं जानती थी कि ये कसम मैंने बस तभी तक के लिए खाई थी, जब तक मेरा उपन्यास पूरा नहीं हो जाता.
हम दोनों उस छुट्टी के दिन बेवजह लड़-भिड़ कर अलग अलग कमरों में पसरे पड़े रहे. तुमने जमकर टीवी देखा और मैंने जम कर उपन्यास पढ़ा. लड़ाई के बहाने ही सही, हमें हमारा ‘मी टाइम’ तो मिला. उपन्यास पूरा कर जब मैंने तुम्हारे मनपसंद पकौड़े और चाय बनाकर तुम्हें सॉरी बोलकर मनाया तो तुम भी तुरंत पिघल गए, जैसे चाय का ही इंतज़ार कर रहे थे…और साथ में मेरा भी…

ख़ैर! जो समय चल रहा है उसे देखते हुए मैंने मन में समझौता कर लिया है कि इन हालात में मुझे मेरा पहले वाला ‘मी टाइम’ जल्दी नहीं मिलेगा. तब तक मुझे उसके बचे-खुचे कतरे तलाशने होंगे… दिन के बंधे घंटों के बीच, दो गतिविधियों के ट्रांज़िशन पॉइंट पर ठिठके पलों में… बिना परवाह किए कि तुम क्या कहोगे, क्या सोचोगे, क्या समझोगे… मुझे जीना होगा कुछ अपने लिए भी… अपने साथ,अपने स्पेस में! ख़ुद से प्यार करूंगी, तभी तुम पर पहले जैसा प्यार लुटा पाऊंगी, वरना जल्द ही थक जाऊंगी.
आशा करती हूं कि कभी तुम मेरी ये चिट्ठी बिना पढ़े भी समझ पाओगे.
ढेर सारे प्यार के साथ…
तुम्हारी
पत्नि

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