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लोकतंत्र, सांप और चूहे: अनूप मणि त्रिपाठी की व्यंग्यात्मक कहानी

लोकतांत्रिक ढंग से किए जा रहे लोकतंत्र के ख़ात्मे पर सामयिक और करारा व्यंग्य

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
April 1, 2023
in ज़रूर पढ़ें, नई कहानियां, बुक क्लब
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लोकतंत्र, सांप और चूहे: अनूप मणि त्रिपाठी की व्यंग्यात्मक कहानी
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 बचपन में हमें एक कहानी सुनाई गई थी, जिसमें तोते को उसका मालिक रटा देता है – शिकारी आएगा, जाल फैलाएगा, दाना डालेगा, पर हमें जाल में नहीं फंसना चाहिए. इस कहानी के ज़रिए हर व्यक्ति को समझाइश दी गई थी कि जाल में नहीं फंसना चाहिए. लेकिन उससे आगे की कहानी लिखी है व्यंग्यकार अनूप मणि त्रिपाठी ने, जो बताती है कि जाल बिछाने वाले आज के दौर में बहुत चौकन्ने और चतुर हो गए हैं. लोकतंत्र के लोकतांत्रिक रूप से ख़ात्मे की कोशिश पर यह व्यंग्यात्मक कहानी एक बेहतरीन कटाक्ष है.

‘तुम में ज़हर नहीं है, इसलिए तुम कमज़ोर हो!’ सांप ने चूहे से कहा.
‘जिसके अंदर ज़हर होता है दुनिया उसकी इज़्ज़त करती है…उनका ही सिक्का चलता है.’
‘आज तुम्हारा ज़हर ही तुम्हारे लिए अमृत है!’
चूहा ध्यान से सब सुनता रहा.
‘जब तुम्हारे पास ज़हर होगा, तभी लोग तुमसे डरेंगे!’ सांप शांत स्वर में बोला.
चूहे को बात समझ में आई.
‘फिर मुझे क्या करना चाहिए!’ चूहे ने पूछा.
‘सीधी-सी बात है…तुम्हें अपने अंदर ज़हर पैदा करना चाहिए!’
‘वह सब तो ठीक है, मगर अपने अंदर ज़हर कैसे पैदा करूं?’
स्पष्ट था कि चूहा हर हाल में समाधान चाहता था.
‘तुम चाहो तो मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूं!’ सांप ने मदद की पेशकश की.
‘कैसे!’
‘चाहो तो मुझसे ज़हर ले लो!’
ताक़त की चाह में चूहे ने फौरन हामी भर दी. सांप मुस्कुराया.
फिर क्या था, मौक़ा मिलते ही सांप ने अपना ज़हर चूहे में उतार दिया. रगों में लहू के साथ ज़हर मिलते ही चूहे का बदन नीला पड़ गया. चूहा हमेशा के लिए शांत हो गया.
चूहे की डेड बॉडी लेकर सांप अपनों की सभा में पहुंचा. जहां उसका अभूतपूर्व स्वागत हुआ.
चूहे की डेड बॉडी देखकर सभी सांप उत्साह से भर उठे. वे ज़ोर-ज़ोर से फुफकारते हुए नारे लगाने लगे.
सभा शुरू हुई.
‘दोस्तो! मेरे प्यारे दोस्तो!’ सांप बोला.
साथी सांप गौर से उसे सुनने लगे. वहां शांति छा गई.
‘दोस्तो! जैसा कि मैंने आप से कहा था, वह मैंने कर दिखाया है. रिजल्ट आप सबके सामने है.’ चूहे की डेड बॉडी को दिखाते हुए वह बोला.
सभी सांपों ने हिश! हिश! करके उसका समर्थन किया.
वह आगे बोला,’हम पहले से ही बहुत बदनाम हैं अब हमें और बदनाम नहीं होना है! अब देखिए साथियों! मैंने यह काम लोकतांत्रिक ढंग से किया. अब हम पर कोई हिंसा का इल्ज़ाम नहीं लगा सकता. इस चूहे ने मुझसे खुद ज़हर मांगा…’ यह कहते हुए सांप का फन तन गया.
सभी सांपों ने हिश! हिश! कर काफ़ी देर तक अपनी ख़ुशी ज़ाहिर की.
‘साथियो! आप पहले दिलों में ज़हर भरिए! वह ज़ेहन में ख़ुद ब ख़ुद आ जाएगा और सब्जेक्ट अपने रगों में उतारने के लिए बेचैन हो जाएगा!’ ‘सब्जेक्ट’ शब्द सुनकर सांपों के बदन में सुरसुरी-सी दौड़ गई.

वह धारा प्रवाह बोलता रहा, ‘बस हमें सपने और भय दोनों साथ-साथ दिखाने होंगे! अच्छे-अच्छे शब्दों के चयन पर ध्यान केंद्रित करना होगा!’ उसने चूहे की डेड बॉडी पर एक नजर मारी. फिर बोला, ‘देखिए! कैसे हमारे रंग में यह रंगने के लिए तैयार हो गया!’
सभी सांप चूहे के नीले बदन को देखने लगे. वे अजब रोमांच से भरे उठे.
वह आगे बोला, ‘ज़हर भरिए, ख़ूब भरिए, मगर उपदेश की शक्ल में… आप देखेंगे कि उपदेश स्वतः उन्माद में बदलता जाएगा… बस फैलकर हर जगह हमें अपना काम लगातार करते रहना है. क्या समझे!’
एक बूढ़ा सांप जोश में बोला, ‘समझ गए! हमें लोकतंत्र को लोकतांत्रिक ढंग से ख़त्म करना है…’
‘बिल्कुल सही!’ सांप गर्व से बोला.
‘ये चूहा तो फंस गया, मगर क्या गारंटी है कि सभी फंसेंगे?’ दुविधा से भरे एक युवा सांप ने सवाल किया.
‘वेरी गुड क्वेश्चन!’ सांप यह बोलकर थोड़ी देर के लिये चुप हो गया. फिर फुफकारता हुआ बोला, ‘जब तक लोगों में वर्चस्व की भावना प्रबल रहेगी,तब तक मुझे कोई दिक़्क़त नहीं दीखती…’ यह सुनते ही सभी सांपों में हर्ष की लहर दौड़ गई.
‘बस वर्चस्व को उत्कर्ष की शक्ल में बेचो!’
उसने बुलन्द आवाज़ में यह बात कही.
पल भर में सभा जोशीले नारों से गूंज उठी और सांपों की सभा ने एकमत से उसे अपना नेता चुन लिया.
नए-नवेले नेता ने बहुत प्यार से कहा, ‘आइए!अब हम प्रार्थना शुरू करते हैं!’
सभी सांप समवेत स्वर में प्रार्थना करने लगे.

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‘लोकतंत्र ख़ुद को डसवाकर हमको दूध पिलाता है
जो जितना ज़हरीला है, वह उतना पूजा जाता है’

चूहे की डेड बॉडी पड़ी हुई थी. अभी न जाने और कितनी बॉडी वहां आने वाली थीं…

फ़ोटो: पिन्टरेस्ट
Anoop-Mani-Tripathi

Tags: Anup Mani Tripathiattack on democracyDemocracySatiresatirical storyअनूप मणि त्रिपाठीलोकतंत्रलोकतंत्र पर हमलाव्यंग्यव्यंग्यात्मक कहानी
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