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फ़िक्शन अफ़लातून#15 पहला सावन (लेखक: पुष्पेन्द्र कुमार पटेल)

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
March 27, 2023
in ज़रूर पढ़ें, नई कहानियां, बुक क्लब
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फ़िक्शन अफ़लातून#15 पहला सावन (लेखक: पुष्पेन्द्र कुमार पटेल)
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कभी-कभी परिस्थितियां ऐसी आ जाती हैं कि दो लोगों को अनचाहे ही एक रास्ते पर चलना पड़ता है. ऐसे में एक-दूसरे से रुखाई से पेश आने की जगह यदि एक-दूसरे का ध्यान रखा जाए तो रास्ता आसानी से कट जाता है. इस बात की ओर इंगित करती है यह कहानी.

“सुमन, ये रही सावन महोत्सव के लिए तुम्हार साड़ी. सरला भाभी ने जैसा बताया था, ठीक उसी तरह की लाया हूं.”
बृज ने अपनी पत्नी सुमन के हाथों मे हरे रंग की चमकीली साड़ी थमाते हुए कहा.

“किसने कहा कि मै सावन महोत्सव में जा रही हूं? घर के कामों से जान छूटे तो कहीं और जाऊं. फिर किट्टू भी तो आपसे संभला नही जाता.”
सुमन ने साड़ी बिस्तर पर पटकते हुए कहा.

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“शादी के बाद पहला सावन है तुम्हारा. भले ही हमारा बंधन विषम परिस्थितियों का दास हो, पर तुम अपनी इच्छाओं से मुंह तो न मोड़ो.”

“अब कोई इच्छा शेष नही मेरी, जब से आप ब्याह कर लाए हैं हर क्षण घुट रही हूं मैं. चूल्हा-चौका, बर्तन, कपड़े और बच्चा बस यही तो आपसे मिला उपहार है.”

“तुम्हारी इन बातों का क्या अर्थ है? समझौते कि अग्नि पर तो मैं भी जल रहा हूं.”

“समझौता… और आप! आपको ये बाते शोभा नहीं देतीं. मेरा सिर दर्द से फटा जा रहा है मुझे सोने दीजिए. ज्यादा चिल्ल-पो हुई तो किट्टू भी जाग जाएगा.”

“लेकिन तुमने खाना…”

बृज आगे कुछ कह पाता इससे पहले ही सुमन कमरे के भीतर चली गई और बत्ती बुझा दी. सावन का महीना जो एक ओर दिन के उजाले में हरियाली समेटे हुए अपनी रंगत बिखराता तो दूसरी ओर रात्रि के घटाटोप अंधेरों में मेढकों की टर्र-टर्र और बादलों की गड़गड़ाहट से कर्णभेदी सा प्रतीत होता. सहसा झमाझम बारिश शुरू हो गई और इसी दौरान सुमन की आंखों से भी गंगा की धार बहने लगी.

बृज और सुमन के विवाह को अभी तीन महीने ही पूर्ण हुए थे, किंतु आज तक उसने बृज से सीधे मुंह बात नही की.
ये जीवन भी कहां बीच मझदार में फंस गया था. न जाने उसने कितने स्वप्न बुने थे. यौवन की दहलीज़ पर जब उसने पांव बढ़ाए थे. उसकी सखियां तो बस उसे यही कहा करती थी- रे! सुमन, तेरा पति तो सपनों का राजकुंवर होगा, क्योंकि तू भी तो किसी राजकुमारी से कम नहीं है. हमें तो लगता है तेरा प्रेम विवाह ही होगा. देख लेना तू.”
परंतु उन्हें कहां पता कि विधना के ये खेल बड़े निराले हैं. वह तो पढ़ लिखकर एक डॉक्टर बनना चाहती थी और पूरा करना चाहती थी अपनी हर आकांक्षा को, किंतु उसे आज भी स्मरण है वो काली अंधियारी रात जब उसकी दीदी सिया अपने बच्चे किट्टू को जन्म देते ही स्वर्ग सिधार गई. कितना रोई थी वह उस दिन… किट्टू को गोद मे उठाकर वह नवजात को सहलाने लगी और उसके स्पर्श से वह नन्ही सी जान उसे ही मां समझने लगा था.

इन्हीं परिस्थितियों को उचित जानकर परिवार वालों ने सुमन का विवाह उसके जीजा बृज से करा दिया. विद्युत विभाग में सरकारी पद होने से बृज उसे अपने साथ गांव से दूर शहर में छोटे से किराए के मकान में ले आया.
सिया की अनगिनत स्मृतियां इस चाहरदीवारी मे समाई हुई थी इसलिए उसने यहीं रहना उचित समझा.

बृज ने रसोईघर में प्रवेश किया, आज खाने की मनमोहक सुगंध भी उसे रास न आई. उसे आभास हो ही गया कि सुमन ने भी खाने का कौर न उठाया होगा. सुमन के नीरस व्यहवार के विषय में सोचकर ही उसके अंदर की भूख मर सी गई. एकाकक किट्टू के रोने की आवाज़ से घर गूंज उठा. वह दबे पांव कमरे की ओर भागा.

किट्टू बिस्तर पर ही बैठकर रोए जा रहा था. किट्टू को गोद मे उठाते हुए बृज ने सुमन की ओर झांका और उसके माथे को स्पर्श किया. अरे! उसकी देह तो अंगारे उगल रही है. ऐसा लगा जैसे उसे तीव्र ज्वर हो. अब वह क्या करे? रात के 12 बज रहे थे और झमाझम बारिश से सारे मार्ग जलमग्न हो गए थे. अभी वह कैसे सुमन को लेकर किसी डॉक्टर के पास जाए? सहसा वह बाहर की ओर भागा और खिड़की से झांकते हुए अपनी पड़ोसन सरला भाभी को आवाज़ दी. उनकी बृज से घनिष्ठता थी, क्योंकि वे सिया की प्रिय सखी थीं.
बहुत आवाज़ लगाने के बाद सरला भाभी नींद से जागीं और भीगती हुई बृज के घर आईं.

“क्या हुआ बृज? इतनी रात को मुझे बुलाया? सब खैरियत तो है न?”
सरला भाभी ने माथे से टपकती बूंदों को पोंछते हुए कहा.

“भाभी, आप ही देखिए न. सुमन बुखार से तड़प रही है और ऊपर से ये बारिश,” बृज ने चिंतित होते हुए कहा.

“घबराने की बात नहीं बृज, घर में तो दवाई रखी होगी न! भोलेनाथ की कृपा हुई तो उससे ही बुखार उतर जाएगा.”

“भाभी आप किट्टू को संभालिए न, मैं दवाई लेकर आता हूं.” यह कह कर बृज दराज की ओर बढ़ा.

सरला भाभी किट्टू को गोद मे लेकर संभालने लगीं.
“अरे! राजा बेटा को क्या हुआ? सो जाओ बच्चे. देखो मम्मी भी सोई है न.”
सरला भाभी ने किट्टू के आंसू पोछते हुए कहा.

बृज ने जैसे-तैसे सुमन को दवाई खिलाई और फिर सुमन के सिरहाने बैठ कर पानी की पट्टियां उसके माथे पर लगाता रहा. सुमन को तनिक भी होश न था वो बस दर्द से कराहती हुई बड़बड़ाने लगी थी. उसकी तकलीफ़ देखकर बृज की आंखों में सैलाब उमड़ आया.
क्या ये अनचाहा रिश्ता सारी उमर सुमन और उसके बीच दीवार बनकर खड़ा रहेगा. क्या उसका दाम्पत्य जीवन अधूरा ही रह जाएगा? वह सोचता जा रहा था. कुछ देर में जब सुमन का ज्वर कुछ कम हुआ, उसने सुमन को अच्छी तरह चादर ओढ़ाई. तब तक किट्टू भी शांत हो कर एक बार फिर गहरी नींद सो गया था.

अब बृज की जान में जान आई. सावन की झमाझम बारिश थी जो थमने का नाम ही नही ले रहे थी. सरला भाभी ने बृज से कहा कि अब ज्वर उतर गया है और यदि ज़रूरत हो तो बृज उन्हें दोबारा बुला ले. वे तड़के ख़ुद भी आकर देख जाएंगी और अगर बात न बनी तो वे सुमन को सुबह डॉक्टर के पास ले जाएंगे.

***

सुबह के 7 बज रहे थे रातभर हुई बारिश के बाद सुबह हल्की हल्की गुनगुनी धूप खिलने लगी. किट्टू के रोने की आवाज़ से सुमन की नींद टूटी. पहले की अपेक्षा वह तनिक सहज महसूस करने लगी.
“कैसी हो सुमन?”
सरला भाभी की आवाज़ उसके कानों में पड़ी.
“भाभी…. आप इतनी सुबह…” सुमन ने अपनी आंखों को मलते हुए कहा.

सरला भाभी ने रात की पूरी बात उसे बताई कि कैसे वह ज्वर के चलते बेहोश-सी थी और कैसे बृज, पूरी रात उसके सिरहाने बैठा रहा और पानी की पट्टियां बदलता रहा. कभी किट्टू को निहारता तो कभी उसके माथे पर हाथ फेरते हुए तीव्र ज्वर को महसूस करता. उसकी आंखों से रातभर पानी छलकता रहा और जब तक सुमन का बुख़ार कम नहीं हुआ वह उसके पास से टस से मस न हुआ.

बृज के समर्पण की ये व्यथा सुनकर सुमन का हृदय पसीजा और वह व्याकुल हो उठी.

“भाभी वो अभी कहां है?” सुमन ने सरला भाभी का हाथ पकड़ते हुए कहा.

सरला भाभी ने बताया कि आज सावन का पहला सोमवार है इसलिए बृज शिव जी के मंदिर गया है. सुमन के स्वास्थ्य की कामना करते हुए उसने रात को मन्नत मांगी थी और वह पूरे सावन के महीने तक शिव जी के लिए व्रत रखेगा.

“तुम कितनी भाग्यशाली हो सुमन, जो तुम्हें बृज जैसा पति मिला. वह अक्सर मुझे कहा करता था कि सिया के जाने के बाद वह तुम्हे कभी भी अपना नहीं पाएगा. लेकिन देखो न तुम्हारे घर वालों की ज़िद के आगे उसे झुकना पड़ा. तभी तो किट्टू के खातिर उसने तुम्हारा हाथ थामा है, वरना उसकी रग-रग में तो सिया ही समाई है ”

सरला भाभी की बातें सुनकर सुमन के अंतर्मन में द्वंद्व हट गया. सिहरन के साथ उसने बिलखते हुए कहा,” शायद मुझे भगवान भी माफ़ नहीं करेगा भाभी! कितनी नासमझ हूं मैं…”

उसकी आंखों से बहती जलधार के साथ उसका भ्रम भी टूट गया. अब तक वह यही तो समझती थी कि बृज कसूरवार है, लेकिन आज उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसने तो बस दो परिवारों का मान रखते हुए सुमन से ब्याह रचाया है.
सुमन ने भी अब निश्चय कर लिया कि अपनी शादी के इस पहले सावन को वह अविस्मरणीय बना देगी और अपना सम्पूर्ण जीवन बृज के नाम कर देगी.

फ़ोटो: पिन्टरेस्ट

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