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जलेबी और चाकू: प्रियदर्शन की कविता

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
April 8, 2021
in कविताएं, बुक क्लब
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जलेबी और चाकू: प्रियदर्शन की कविता
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हमारी भाषा कैसे-कैसे बेख़बर अत्याचार करती है. आप किसी को जलेबी जैसा सीधा कहकर उसका मज़ाक उड़ाते हैं. इस प्रचलित मुहावरे में जलेबी का क्या दोष है? जलेबी के टेढ़ेपन का मज़ाक उड़ाने वाले सीधे चाकू के सामने क्यों सहम जाते हैं. पढ़ें पत्रकार, लेखक, कवि प्रियदर्शन की यह गहरे अर्थों वाली कविता.

किसी गर्म, कुरमुरी, ज़ायक़ेदार जलेबी को मुंह में रखने
और उसे गप कर जाने से पहले उसकी ख़ुशबू और उसके रस का पूरा आनंद
लेने के बीच क्या आपने ध्यान दिया है कि
हमारी भाषा कैसे-कैसे बेख़बर अत्याचार करती है?
अगर किसी को आप जलेबी जैसा सीधा कहते हैं
तो ये उसके टेढ़ेपन पर व्यंग्य-भरी टिप्पणी होती है
जबकि सच्चाई यह है कि अपने रूपाकार को छोड़कर-जिसमें उसका
अपना कोई हाथ नहीं है-वह वाकई सीधी होती है
पहले रस को अपने भीतर घुलने देती है
और फिर बड़ी आसानी से मुंह के भीतर घुल जाती है
जो थोड़ा बहुत कुरमुरापन रहता है, वह उसका ज़ायक़ा ही बढ़ाता है
कभी चाव से जलेबी खाते हुए और कभी दिल्लगी में दूसरों से अपने जलेबी जैसा
सीधा होने की तोहमत सुनते हुए अक्सर मुझे लगता है
कि वह भाषा भी कितनी सतही होती है जो बाहरी रूप देखकर
किसी से सीधे या टेढ़े होने का ऐसा नतीजा तय कर देती है जो घिस-घिस कर मुहावरे में बदल जाता है
लेकिन यह नादानी है या सयानापन है?
कि लोग जलेबी को टेढ़ा बताते हैं?
यह जानते हुए कि वह कुछ बिगाड़ नहीं सकती
आम तौर पर बाक़ी पकवानों की तरह हाजमा भी ख़राब नहीं कर सकती
अगर सिर्फ़ आकार-प्रकार से तय होना हो
कौन सीधा है, कौन टेढ़ा
तो सीधा-सपाट चाकू कहीं ज़्यादा मासूम लगेगा जो
सीधे बदन में धंस सकता है
और जलेबी बेचारी टेढ़ी लगेगी जो टूट-टूट कर
हमारे मुंह में घुलती रहती है
लेकिन जलेबी और चाकू का यह संयोग सिर्फ़ सीधे-टेढ़े के फ़र्क़ को बताने के लिए नहीं चुना है
यह याद दिलाने के लिए भी रखा है कि
जलेबी मुंह में ही घुलेगी, चाकू से नहीं कटेगी
और चाकू से जलेबी काटना चाहें
तो फिर किसी और को काटने के पहले चाकू को चाटने की इच्छा पैदा होगी
यानी चाकू जलेबी को नहीं बदल सकता
जलेबी चाकू को बदल सकती है
हालांकि यह बेतरतीब लगने वाला तर्क इस तथ्य की उपेक्षा के लिए नहीं बना है
कि जलेबी हो या चाकू-दोनों का अपना एक चरित्र है
जिसे हमें पहचानना चाहिए
और कोशिश करनी चाहिए कि हमारा रिश्ता चाकू से कम, जलेबी से ज़्यादा बने
लेकिन कमबख़्त यह जो भाषा है
और यह जो दुनिया है
वह जलेबी को टेढ़ेपन के साथ देखती है, उसका मज़ाक बनाती है
और
सीधे-सपाट चाकू के आगे कुछ सहम जाती है

Illustration: BBC by Pinterest

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