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Home ज़रूर पढ़ें

फ़िक्शन अफ़लातून#7 देश सेवा (लेखिका: मीनाक्षी विजयवर्गीय)

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
March 11, 2023
in ज़रूर पढ़ें, नई कहानियां, बुक क्लब
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Fiction-Aflatoon_Meenakshi-Vijayvargeeya
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कई बार जाने, अनजाने हम अपने आप पर घमंड करने लग जाते हैं. हमें लगता है कि हम बहुत अच्छे हैं या अच्छा काम कर रहे हैं. दूसरों से इज़्ज़त पाने की उम्मीद करने लगते हैं. पर फिर हमारे साथ कुछ ऐसा होता है कि हम ज़मीन पर आ जाते हैं. एक अनजाने मिस्ड कॉल से शुरू हुई यह कहानी हमें ऐसे ही एक अनूठे सफ़र पर ले चलती है.

मैं अपनी ड्यूटी कर रहा था. सेना में मेरी नई जॉइनिंग थी. ड्यूटी के वक़्त फ़ोन से दूरी बनाकर रखनी होती है. मैंने लंच टाइम में फ़ोन देखा तो एक ही नंबर से दो मिस कॉल दिखे. सोचा जिसको ज़रूरत होगी दोबारा कर लेगा, मैंने बैक कॉल नहीं किया. रात को ड्यूटी खत्म करके आया, मम्मी को फ़ोन किया, दिनभर की बातें बता रहा था. क्या खाया, अब क्या खाऊंगा सब रोज़ की बातें चल रही थीं, कि नोटिफ़िकेशन में उसी नंबर से फ़ोन आ रहा था कॉल वेटिंग दिखा रहा था. मां से बातें पूरी कर बाय किया. फिर उस नंबर पर कॉल किया. सामने से एक घंटी जाते ही फ़ोन रिसीव कर लिया गया, बेसब्री से शायद इंतज़ार होगा. मैं हैलो भी नहीं बोल पाया कि एक लड़की की आवाज़ सुनाई दी, कहने लगी,‘‘कहां थी तुम? सुबह से कितनी बार फ़ोन किया, मेरी फ़ाइल तुम्हारे पास रह गई है. कल याद से लेती आना.’’
मैंने कहा,‘‘माफ़ कीजिए कौन बोल रहा है?’’
वो बोली,‘‘ओह, शायद रॉन्ग नंबर लग गया आपको. मुझे माफ़ करें मैं अपनी सहेली को फ़ोन कर रही थी. शायद मुझसे ग़लत नंबर डायल हो गया.’’
आवाज़ इतनी खनकदार थी. मुझे आवाज़ बहुत अच्छी लगी. मैंने बातचीत जारी रखना चाहा. ‘‘आप कहां से हैं?’’ पर उसकी रुचि मुझसे बात करने में नहीं थी. उसने फिर से सॉरी कहा और फ़ोन रख दिया. उसकी आवाज़ बहुत देर तक मेरे कानों में गूंजती रही. आवाज़ इतनी अच्छी थी, शायद वो भी बहुत अच्छी हो, अपने ख़्यालों को विराम देकर मैं सो गया.
अगले दिन फिर से ड्यूटी ट्रेनिंग, पूरा दिन व्यस्त रहा थकावट भरा. घर आया, फ़ोन हाथ में लेते सबसे पहला ख़्याल उसी का आया. मैंने बिना कुछ सोचे ही बात करने के विचार से उसको फ़ोन लगा दिया. शायद वो मुझे मनचला समझ चुकी थी, उसने फ़ोन नहीं उठाया. पहली बार में, मैंने अगले दिन फिर कोशिश की. जाने क्या आवाज़ में उसकी कशिश थी कि मैं उसी से बात करना चाह रहा था, अफ़सोस आज भी मेरी दाल नहीं गली. फिर मैंने फ़ोन लगाना बंद कर दिया. फिर एक दिन रविवार के दिन मैंने फ़ोन लगा लिया. इस बार फ़ोन का जवाब दिया उन्होंने, आवाज़ में थोड़ी सख्ती लगी,‘‘आप मुझे बार-बार फ़ोन क्यों करते हैं? कहा तो सही रॉन्ग नंबर डायल हो गया था, अब एक ग़लती के लिए कितनी बार सॉरी बोलूं!’’ मैं बुरी तरह घबरा गया, स्थिति संभालते हुए मैं बोला,‘‘आप मुझे ग़लत समझ रही हैं. मुझे लगा आप उस दिन परेशान लग रही थीं, आवाज़ से, सोचा कुछ मदद कर सकूं तो, बस यही सोच कर फ़ोन किया.’’
उन्होंने मुझे कहा,‘‘आप समाज सेवा करते हैं? सबकी मदद करते हैं क्या?’’
मैने कहा,‘‘ऐसा ही समझो. समाज सेवक कहें या देशसेवक. किसी के काम आ सकूं तो इससे बढ़िया सेवा क्या होगी?’’
वो बोली,‘‘देश सेवक मतलब?’’ मैंने अपना परिचय दिया, बताया कि सेना में हूं, अभी नई-नई जॉइनिंग है मेरी यहीं जैसलमेर में. अब वह मुझे सॉरी बोलने लगी. मैंने बोला,‘‘आप सॉरी ना कहें, अगर कोई मदद चाहिए तो बता दें.’’ वे बोलीं,‘‘नहीं, धन्यवाद आपका.’’
मैंने पूछा,‘‘आप कहां रहती हो, क्या करती हो?’’
बोलीं,‘‘यही जैसलमेर में रहती हूं और टीचर हूं . उस दिन मेरी फ़ाइल रह गई थी ,बस उसी के लिए फ़ोन कर रही थी.’’
मैंने कहा,‘‘अच्छा ठीक है. अगर कोई मदद चाहिए तो बताइएगा. अच्छा लगा आपसे बात करके. आपकी आवाज़ बहुत अच्छी है.’’
उन्होंने धन्यवाद कहा और फ़ोन रख दिया. एक-दो दिन बाद मैंने फिर फ़ोन लगा लिया उन्होंने कहा,‘‘आज कैसे फ़ोन किया आपने? मैंने उनसे कहा कि मुझे घर की याद आ रही थी तो सोचा आप से बात कर लूं. मैंने उनका नाम पूछा. क्या पढ़ाती हो सब जाने की कोशिश की. बातों ही बातों में उन्होंने मुझसे मेरे बारे में भी जानकारी ली. जब उनको पता चले कि मेरी नई नई पोस्टिंग है तो बोली 26 साल की उम्र में देश सेवा, जोश उमंग लगन देखकर अच्छा लगा.
पता नहीं तारीफ़ कर रही थी या और कुछ. साथ में कहा आप तो बहुत छोटे हो मुझसे. मैंने कहा मुझे आवाज़ से तो बूढ़ी नहीं लगीं आप. उन्होंने हंसकर कहा कि बूढ़ी तो नहीं हूं पर कुछ सालों में होने लगूंगी. चालीस बसंत तो देख चुकी हूं. थोड़ा धक्का लगा मेरे मन को. फिर भी हमारे बीच बातों का सिलसिला जारी रहा. फिर मैंने कहा,‘‘दोस्त बन सकते हैं हम?’’
‘‘तुम उम्र मे बहुत छोटे हो. विचार नहीं मिलेंगे हमारे,’’ वो बोलीं.
मैंने कहा,‘‘रिश्तेदारी नहीं करनी आपसे, दोस्ती करनी है. दोस्ती की कोई उम्र नहीं होती.’’
उन्होंने कहा,‘‘सोच कर बताऊंगी.’’
मैंने कहा,‘‘जी बिल्कुल.’’
फिर चार दिन बाद उनका फ़ोन आया. मैंने पूछा कि कैसे याद किया. उन्होंने कहा आज मुझे अपने घर की याद आ रही थी, सोचा आप से बात कर लेती हूं. मैंने कहा बहुत अच्छा किया शुक्रिया आपका. और बताइए. उन्होंने कहा वैसे अनजान शहर में दो अजनबी दोस्त हो सकते हैं. इसमें कोई बुराई नहीं. मैं ख़ुश हो गया. अब बातों का सिलसिला चलने लगा. एक दिन मैंने कहा,‘‘हम एक ही शहर में रहते हैं क्यों ना हम मिल लें एक बार.’’ उन्होंने मिलने से मना कर दिया. मैंने कहा ठीक है. पर आए दिन में उनसे मिलने की रिक्वेस्ट करने लगा. वह बड़ी विनम्रता से हर बार ना कर देतीं. एक बार मैंने थोड़ी बहस की. ना मिलने का कोई कारण तो बताओ? उन्होंने कहा, नहीं है कोई ख़ास कारण. पर नहीं मिल सकती. मैंने कहा ठीक है जैसी आपकी मर्जी और फ़ोन रख दिया. फिर फ़ोन ना करने की कसम खा ली.
15- 20 दिन बीत गए, ना मैंने फ़ोन किया ना उधर से कोई कॉल आया. एक दिन रात 10:00 बजे मेरा फ़ोन बजा. मैंने देखा उनका फ़ोन है. मैंने हेलो कहा. उन्होंने पूछा क्या आज मिल सकते हैं? मुझे बहुत अजीब लगा. मैंने बोला अभी आपने समय देखा है रात के 10:00 बजे! उन्होंने कहा, हां तो क्या हुआ नहीं मिल सकते. मैंने बोला आप पता बताइए, मैं आ जाता हूं. रात के 10:30 बजे मैंने अपनी मोटरसाइकिल उठाई और बताए गए पते पर पहुंच गया. रात के 11:15 होने आए थे. डर भी था. ख़्यालों के ज्वार भाटे आ रहे थे. इतनी रात में क्यों बुलाया, पता नहीं क्या काम है, कौन है? तभी बिना घंटी बजाए ही दरवाज़ा खुल गया. देखा एक महिला हाथ में टॉर्च लिए खड़ी है. वह बोली, इधर सीढ़ियों का बल्ब ख़राब हो रहा है आप मेरे पीछे पीछे आ जाएं.
सीढ़ी चढ़ते वक्त मैं बार-बार यही सोच रहा था कि कहीं भूत चुड़ैल तो नहीं. मन में बहुत डर लग रहा था. पैरों को ग़ौर से देखने लगा, कहीं उल्टे तो नहीं? 8-10 सीढ़ी चढ़ने पर कमरा आ गया. वहां भरपूर रौशनी थी. जैसे ही वह टॉर्च बंद करके पलटी, मैंने देखा-बहुत सुंदर, नाज़ुक-सी दिखने वाली लड़की है. उम्र में तो मुझसे भी कम लग रही थी. मैंने पूछा आप वही फ़ोन वाली हैं ना? उन्होंने कहा, हां.
आप तो कह रही थीं कि…. मेरी बात को बीच में ही काटते हुए उसने कहा कि 40 कि नहीं हूं, वह तो तब की बात है जब आप मनचले मजनू लगे मुझे. लगा कि आपसे और आपके फ़ोन से पीछा छुड़ाने के लिए यही झूठ अच्छा रहेगा, पर अब मुझे आपकी दोस्ती पर पूरा भरोसा है. मैं उसको देखकर, उस पर लट्टू हो रहा था. मैंने पूछा इतनी रात में बुलाने का कोई ख़ास कारण? उसने कहा मैं किराए से रहती हूं. आज मकान मालिक दूसरे शहर में गए हुए हैं. इतने बड़े घर में मैं अकेली थी, मुझे डर लग रहा था. इस अंजान शहर में ज़्यादा किसी को जानती नहीं. सहेली को बोला था रात रुक जाए मेरे पास, पर उसका बच्चा छोटा है तो उसने भी मना कर दिया. तभी मुझे आपकी याद आई. इस अनजान शहर में आप मेरे दोस्त हैं तो सही बस इसलिए.
फिर वह अंदर जाकर मेरे लिए एक ग्लास पानी लेकर आई. मुझसे पूछा चाय कॉफी कुछ लेंगे आप. मैंने कहा आपको जो पसंद हो. उसने कहा, कॉफ़ी बनाकर लाती हूं. पांच-सात मिनट के बाद आई. हाथ में कॉफी का एक कप लेकर. मैंने पूछा आप नहीं लेंगी? उसने कहा, नहीं रात बहुत हो चुकी है इसलिए मैं कॉफ़ी नहीं लूंगी. फिर वह मेरे पास आकर बैठ गई. मैं घूंट-घूंट कॉफ़ी पी रहा था और उस रूप सुंदरी को और उसकी सुंदरता को देखे जा रहा था. मन में उसके प्रति आकर्षण बढ़ता ही जा रहा था. तभी मैंने देखा कि उसकी आंखें बंद हो रही हैं, वह अपने आप को जगाने की कोशिश कर रही थी. मैंने उनसे कहा आप जाकर सो जाइए मैं यहां बैठा हूं. मुझे तो रातभर जागने की भी आदत है. पहले तो उसने ना कहा, फिर थोड़ी देर बाद मेरे दोबारा कहने पर अंदर जाकर सो गई. मन ही मन उसके लिए आकर्षण बढ़ता जा रहा था, पर उसके विश्वास की रेखा पार करने की मेरी हिम्मत भी नहीं हुई. और मैंने इसके बारे में सोचना भी बिल्कुल बंद कर दिया था.
दोस्त की मदद को आया हूं और वही करना है. रातभर तरह-तरह के ख़्याल मन में चलते रहे. फिर जब घड़ी में सुबह में 4:45 हो रहे थे, तब मैंने अपने क्वॉर्टर पर वापस जाने का तय किया. मैंने धीरे से कहा ताकि उसकी नींद ना ख़राब हो. मैं जा रहा हूं, मेरी ट्रेनिंग का टाइम हो गया है, ख़्याल रखिएगा अपना. और धीरे-धीरे से उतर कर वापस आ गया.
अगले दिन उसका फ़ोन आया, कहने लगी शुक्रिया आपका. आपके जैसे दोस्त किस्मत वालों को मिलते हैं. थोड़ी दिन बाद सेना का एक कार्यक्रम होने वाला था मैं भी उसमें शामिल हुआ. सेना में शहीद जवानों के परिवार के लिए वह कार्यक्रम था. कार्यक्रम में पहुंचा तो देखा वह कुर्सी पर बड़े अफ़सरों के साथ बैठी हुई थी. अपने सीनियर से उसके बारे में पूछा तो कहा, इन्हीं का तो सम्मान है. यह एक शहीद की विधवा पत्नी हैं. दो महीने भी शादी के नहीं हुए थे कि इनके पति आतंकवादियों से मुठभेड़ में मारे गए. तब से ‘मेरा आंगन’ नाम से सहयोग केंद्र चलाती हैं. जहां दूसरे शहीदों के परिवारों की मदद की जाती है. बच्चों के लिए विद्यालय है, जहां ख़ुद पढ़ाती हैं. औरतों को आत्मनिर्भर करने के लिए रोज़गार प्रशिक्षण केंद्र खोल रखा है.
‘वाह’ इतना ही कह पाया बस मैं. मन ही मन ख़ुश हो रहा था कि क्या दोस्त पाया है. मैं तो सेना में हूं, इसी बात पर घमंड कर रहा था. ख़ुद को देश सेवक बता रहा था. पर इसको देखो, जो इतने बड़े दुख के बावजूद हार कर घर नही बैठी. बल्कि असली देश की सेवा तो ये कर रही है.
मैं उसके सामने ख़ुद को छोटा महसूस करा था. उसका सम्मान हुआ तो मैंने ख़ूब ज़ोरों से ताली बजाकर दोस्त के लिए अपनी ख़ुशी ज़ाहिर की. धन्य है वह देवी, नतमस्तक हूं इसके आगे मैं. सोच रहा था कि सेना में भर्ती होकर ही देश सेवा नहीं होती. देश सेवा के कई तरीक़े हैं और अब मुझे समझ में आ रहा था कि उन्होंने मुझे उस रात डर की वजह से नहीं, बल्कि परखने के लिए बुलाया था शायद. वह भी जानती थी कि मैं उनको बहुत पसंद करता हूं. मैं ख़ुद पर नाज कर रहा था, चलो मैंने दोस्ती निभाई. जो विश्वास उनका फौजी सेना के लिए है, उसे टूटने नहीं दिया. वो इतना महान कार्य करती हैं. बार-बार भगवान को लाख-लाख शुक्रिया कह रहा था कि मेरा ईमान डिगने नहीं दिया. शहीद हुए जवान के साथ जिसने दो महीने भी नहीं बिताए, उसकी जगह त्याग सेवा समर्पण की भावना के साथ इतना बड़ा काम कर रही है. उसकी सच्ची देश सेवा देख मैं बार-बार उस देवी के आगे नतमस्तक हो रहा था.

Illustration: Pinterest

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