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क्या विश्व की चौथी बड़ी अर्थ व्यवस्था का सच जानते हैं आप?

बतौर नागरिक ये सच जानना ज़रूरी है!

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
May 26, 2025
in ज़रूर पढ़ें, नज़रिया, सुर्ख़ियों में
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economy
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हाल ही में आई अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट (अप्रैल 2025) के अनुसार, भारत अब दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है. नीति आयोग के सीईओ बीवीआर सुब्रमण्यम ने इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि भारत की जीडीपी अब चार ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो चुकी है. आंकड़ों के आधार पर यह ख़ुश होने की बात है, लेकिन आम भारतीय लोगों को इससे क्या कोई फ़ायदा हुआ है इस बात की तहकीकात कर रहे हैं भगवान दास.

जैसा कि अनुमान था, भारत की अर्थव्यवस्था विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गई है. ज़ाहिर है, सरकार और उसके समर्थकों ने ढोल-नगाड़े बजाना शुरू कर दिया है और हमेशा की तरह ये दावा किया जाने लगा है कि भारत आगे बढ़ रहा है, विश्व शक्ति बन रहा है, वगैरह, वगैरह. लेकिन दोस्तो सच क्या है? आइए, इस पूरे जीडीपी के खेल को समझने की कोशिश करते हैं. लेकिन मूल मुद्दे पर आने के पहले एक कहानी सुनते हैं.

“एक छोटे शहर के एक स्कूल में राव साहेब प्रिंसिंपल होते हैं. स्कूल में मिड डे मील योजना के तहत वो ये तय करते हैं कि प्रतिदिन ही हर बच्चे को 250 ग्राम राशन दिया जाएगा. उस स्कूल के बच्चे इस योजना का लाभ उठाकर स्वस्थ होते हैं. अब कुछ साल बाद राव साहेब का ट्रांसफर स्कूल से हो जाता है, और उनकी जगह पटेल साहेब प्रिंसिपल बनकर आते हैं. मिड डे मील की समीक्षा होती है, अब पटेल साहेब प्रतिदिन 250 ग्राम के राशन को घटाकर 200 ग्राम कर देते हैं, वो कहते हैं कि 250 ग्राम की ज़रूरत नहीं है, 200 ग्राम काफी है.

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कुछ महीनों के बाद उस शहर का नगर निगम स्कूलों में एक हेल्थ सर्वे करता है, जिसका उद्देश्य उस शहर के स्कूलों में बच्चों के स्वास्थ्य का पता लगाना होता है. पटेल साहेब का स्कूल 4 थे नम्बर पर आता है. पटेल साहेब सारे स्टाफ को बुलाकर चाय और नाश्ते की पार्टी देते हैं, और दावा ठोकने लगते है कि ये मेरे कारण हुआ है. कोई कुछ नहीं बोलता सब चुप रहते है. लेकिन धीरे से हिन्दी पढ़ाने वाली वीना मैडम पूछ लेती है कि सर आपने तो राशन 250 ग्राम से घटाकर 200 ग्राम कर दिया तो फिर आप इसका क्रेडिट क्यों ले रहे हैं? पटेल साहेब खिसियानी हंसी हंस के बात टाल देते हैं.”

यही बात अब भारत की जीडीपी ग्रोथ के संदर्भ में समझते हैं. डॉ मनमोहनसिंह के कार्यकाल में भारत की जीडीपी वृद्धि की औसत रफ़्तार 7.5% थी. वर्ष 2014 में मोदी सरकार आने के बाद पिछले 11 सालों में अब जीडीपी ग्रोथ की रफ़्तार अब घटकर औसतन 6% है. यानी हमारी ग्रोथ की रफ़्तार 2014 के बाद धीमी हो गई है. तो अब सरकार कैसे ये दावा कर सकती है कि भारत विश्व की पांचवी और चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था उसकी नीतियों के कारण बन गई है? ज़ाहिर सी बात है कि सरकार की स्थिति प्रिंसिपल पटेल साहेब के समान है.

दरअसल कुल जीडीपी या उसमें आगे जाने का दावा अपने आप में छलावा है. जीडीपी ग्रोथ को केवल एक आंकड़े से नहीं समझा जा सकता. आपको ये बताना होगा कि कुल जीडीपी कितना है, और प्रति व्यक्ति जीडीपी कितना है. ये ठीक वैसा है जैसा जब आप किसी मरीज़ का रक्त चाप नापते है तो आपको दोनों फिगर बताने पड़ते हैं कि ऊपर का प्रेशर कितना है और नीचे का कितना है. आप ये नहीं कह सकते कि मरीज़ का रक्त चाप 120 है, आपको दोनों फिगर बताने पड़ेंगे, आपको ये बताना पड़ेगा कि मरीज़ का रक्त चाप 120/60 है.

ठीक इसी तरह जीडीपी का फिगर है, आप अगर ये बता रहे हैं कि भारत कुल जीडीपी की रैंक में 4 थे नम्बर पे आ गया है तो आपको ये भी बताना पड़ेगा कि भारत प्रति व्यक्ति की जीडीपी (per capita GDP) की रैंक में कहां है? भारत इस रैंक में विश्व में 136 वें नम्बर पर है और भारत के आसपास जो देश हैं उनके नाम है अंगोला, और एवरी कोस्ट, जो कि बेहद गरीब और सब-सहारन देश है.

दरअसल आर्थिक दृष्टि से दुनिया के देशों को 3 श्रेणियों में बांटा जा सकता है:
– पहला अमीर देश, जिनकी प्रति व्यक्ति आय 30,000 डॉलर से ज़्यादा हो.
– दूसरा, मध्यम आय के देश, जिनकी प्रति व्यक्ति आय 10,000 – 30,000 डॉलर के बीच हो.
– तीसरा गरीब देश, वो जिनकी प्रति व्यक्ति आय 10,000 डॉलर से भी कम हो.

भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी इस समय मात्र 2800 डॉलर है जो भारत को बेहद गरीब देशों की श्रेणी में रखती है. इस श्रेणी में भारत की रैंक 136 है और भारत लगभग बांग्ला देश के आसपास है.

अमीर देश बनाना तो अभी दूर की कौड़ी है, लेकिन अभी अगर भारत को मध्यम आय का देश भी बनाना है तो भारत को अगले 1- 2 दशक तक अपनी ग्रोथ रेट बढ़ानी होगी और वर्तमान 6% से बढ़ाकर दो अंकों में ले जानी होगी. इसके लिए फिर आर्थिक सुधार करने होंगे और नए सेक्टर खोजने होंगे जहां से नई ग्रोथ आ सके, ठीक वैसे, जैसे 80 के दशक में राजीव गांधी की दूरदर्शी सरकार ने एक नया आईटी सेक्टर खोला था, जिसके अच्छे परिणाम हम आज तक प्राप्त कर रहे हैं.

सवाल इस बात का है कि क्या प्रोपोगंडा और प्रचार से इतर, इस सरकार में ऐसा करने की इच्छाशक्ति और लगन है?

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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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