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लोग समझ ही नहीं पाते कि ऐलपीशिआ केवल एक डिस्ऑर्डर है: केतकी जानी

#बॉडीशेमिंग से बचिए #संवेदनशील बनिए

शिल्पा शर्मा by शिल्पा शर्मा
April 3, 2023
in ओए हीरो, ज़रूर पढ़ें, मुलाक़ात
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लोग समझ ही नहीं पाते कि ऐलपीशिआ केवल एक डिस्ऑर्डर है: केतकी जानी
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बॉडी शेमिंग पूरी दुनिया की और हमारे देश की भी एक सच्चाई है, जिसके मूल में छुपी है: जागरूकता और संवेदनशीलता की कमी. ऐलपीशिआ (गंजापन) भी एक ऐसा ही मुद्दा है, जिस पर इसके शिकार लोगों की बॉडी शेमिंग की जाती है. ऐलपीशिआ अवेयरनेस ऐक्टिविस्ट केतकी जानी से मिलिए और जानिए कि किस तरह आज भी हमारा समाज किसी डिस्ऑर्डर को डिस्ऑर्डर की तरह नहीं ले पाता. वह उस व्यक्ति को ही बेचारा कहने लगता है या उसका मज़ाक उड़ाने लगता है, जो पहले ही ऐसे डिस्ऑर्डर को लेकर परेशानी और यहां तक कि डिप्रेशन से गुज़र रहा होता है. यदि इस इंटरव्यू को पढ़ कर आप बॉडी शेमिंग के प्रति संवेदनशील हो जाएं तो यही इसकी सार्थकता है.

आपको कैसे पता चला कि ये ऐलपीशिआ है?
एक दिन मैं आफ़िस में बैठी थी तो सिर के पीछे के एक छोटे हिस्से में खुजली महसूस हुई तो मुझे महसूस. हुआ कि बिंदी जितनी जगह के बराबर जगह में बाल नहीं हैं. मैंने अपनी कलीग से पूछा कि देखना ज़रा यहां क्या है? उन्होंने बताया कि मैडम एक छोटी-सी जगह पर बाल नहीं हैं और उसी दिन हम डर्मैटोलॉजिस्ट के पास गए और वहां पर उन्होंने डिटेक्ट किया कि ये ऐलपीशिआ है. उस समय यह बात मेरे लिए नई थी, पर मुझे डर बिल्कुल नहीं लगा, क्योंकि इतने घने बालों में एक बिंदी सी जगह पर बाल हों या न हों इससे मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा, ऐसा मेरा मानना था. लेकिन वो शॉकिंग रिऐक्शन तब आया जब अगले आठ से दस महीने में मेरे पूरे बाल झड़ गए.

आपका रिऐक्शन क्या था? घर, परिवार और जानने वालों का रिऐक्शन कैसा था?
दरअसल, शुरू में मुझे वो झटका नहीं लगा था, क्योंकि लगा था कि एक छोटे से हिस्से के ही तो बाल गए हैं, शायद वो ज़ोर का झटका था, जो मुझे धीरे से लगा था. रिऐक्शन का कहूं तो मुझे पता ही नहीं चल रहा था कि मेरे साथ क्या हो रहा है? मैं परेशान थी, डिप्रेशन में जाने लगी थी. घर-परिवार और जानने वालों का रिऐक्शन ऐसा था कि मेरे बच्चे छोटे थे तो मेरी फ़ीलिंग्स को समझना उनके लिए नामुमकिन था. बाक़ी दूसरे लोगों का रिऐक्शन भी ऐसा था, जैसे वो भी इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहे हों कि मेरे बाल नहीं हैं.
लोग तरह तरह की बातें बनाने लगे थे. क्या ये कैंसर की वजह से है? क्या हुआ? लोग मेरे बच्चों से कहते थे कि अब शायद तुम्हारी मां ज़्यादा नहीं जिएगी, उसे कोई ऐसी बीमारी हो गई है. कहने का मतलब ये कि लोग मुझे अनटचेबल की तरह ट्रीट करते थे. जैसे किसी समाज की लहर में रहने वाली किसी मछली को साइड लाइन कर दिया गया हो. जानने वालों, फ्रेंड्स और कुछ घर वालों का भी बहुत शॉकिंग रिऐक्शन था, जैसे उनका केतकी जानी के अस्तित्व से नहीं, बल्कि बालों के साथ वाली केतकी जानी से ही उनका संबंध था.

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आपने कैसे ख़ुद को समझाया?

जब मैं इस दौर से गुज़र रही थी, डिप्रेशन में थी तो मुझे लगा कि यदि मैं इस दुनिया में नहीं रहूंगी तो इस समस्या से बाहर निकल आऊंगी. उस दिन मैंने ख़ुदकुशी का मन बनाया, जब मैं ऐसा करने जा रही थी, तब मुझे मेरे बच्चों और डॉग्स का ख़्याल आया. उनके बारे में सोच कर मैं रुक गई, मुझे लगा कि मेरे बिना उनकी सुबह कैसी होगी? फिर मैं ख़ुद को समझाने लगी कि मेरे न होने से जिन लोगों को वाक़ई फ़र्क़ पड़ता है, उन मुट्ठीभर लोगों का सुख यदि दुनिया वालों को पसंद नहीं आता तो इसकी वजह से मुझे उनका सुख तो नहीं ही छीनना चाहिए. और मैंने ख़ुद को इस बात के लिए तैयार कि आज तक लोग इसे ऐसा समझते हैं कि ये बात किसी के सामने अनकवर न हो जाए कि उन्हें ऐलपीशिआ है. लोग इसे छुपाने की बात सोचते हैं, पर मैंने सोचा कि अब मैं ऐलपीशिआ को अनकवर करूंगी. मैंने ख़ुद को यह समझाया कि ये ऐलपीशिआ शायद मेरे हिस्से में इसलिए आया है कि शायद मैं इसे अनकवर कर सकूं. मेरे हाथों इसकी शुरुआत होने वाली है.

कोई घटना, जिसने आहत किया हो?
ऐसी तो बहुत सारी घटनाएं हैं जिन्होंने मुझे आहत किया: मुझे जब बोला जाता था कि कैसे जिएगी बिचारी? या जब मेरे फ्रेंड्स एक-दूसरे से मेरे बारे में बात करते थे तब बताते थे कि वो टकली का फ़ोन आया था और जब वे एक-दूसरे से बात करते थे तो कहते थे कि इसे कोई अंधेरे में देखा तो कोई कितना डर जाएगा. इसे कोई प्यार करने वाला कैसे मिल सकता है? अब इसका अभिमान टूट जाएगा, बहुत अभिमान था इसे अपनी ख़ूबसूरती का वगैरह. लेकिन इन सब से उबर कर जब मैंने ख़ुद ये तय कि अब मुझे लोग क्या कहेंगे यह नहीं सोचना है, मुझे सिर्फ़ मेरा अस्तित्व सहज रहे, मैं अच्छे से जी पाऊं, सिर्फ़ यही देखना है.

दूसरों को जागरूक करने का ख़्याल कैसे आया?
लोगों को मेरे बाल न होने पर क्या लगेगा, जब यह मेरा प्रश्न नहीं रहा, तब मैं इससे उबर पाई. तब एक दिन मैंने यह तय किया कि जो बात लोगों तक आज तक नहीं पहुंची है, वो शायद मेरे ज़रिए पहुंचनी चाहिए, क्योंकि मेरे हिस्से में तो यह डिस्ऑर्डर काफ़ी उम्र होने के बाद आया, लेकिन बहुत सारी ऐसी महिलाएं और पुरुष हैं, जिनके हिस्से में बहुत ही कम उम्र में यह बीमारी आ जाती है और वो लोग डिप्रेशन में चले जाते हैं. बहुत से लोग तो ख़ुदकुशी भी कर लेते हैं! मैं तो रुक गई थी.

तब मुझे लगा कि क्यूं न मैं इस बात को लोगों तक पहुंचाऊं कि ऐलपीशिआ अनटचेबल नहीं है, ऐलपीशिआ यानी हेयर लेस होना कोई गुनाह नहीं है, मुझे ऐलपीशिआ हुआ है तो इसका ये मतलब नहीं है कि मैंने कुछ ग़लत कर दिया है. मुझे ये पूछना था समाज से कि कोई भी एक डिस्ऑर्डर यदि किसी को भी होता है तो इसमें उसका क्या दोष है और इस बात के लिए आप उसे क्यों पनिशमेंट दे रहे हो? मैं पूछना चाहती थी कि कोई भी इंसान, जिसे ऐलपीशिआ होता है, वह क्यों गुमनामी के अंधेरे में रहे? वो क्यों लोगों से डर के रहे? वो क्यों लोगों के सामने जाने से डरे? तो मुझे लगा कि मुझे ऐलपीशिआ को अनकवर करने की कोशिश करनी चाहिए और मुझे ऐलपीशिआ के बारे में जागरूकता फैलाने की कोशिश करनी चाहिए. क्योंकि लोगों को यह पता ही नहीं है कि बाल न हों ऐसे, गंजे या टकले लोगों की भावनाएं क्या हैं, क्योंकि आज तक हमने उसे सिर्फ़ मज़ाक की विषयवस्तु ही समझा है. या तो हम उसका मज़ाक उड़ा सकते हैं या फिर उस पर दया कर सकते हैं. इन दोनों बातों के अलावा हमने ऐलपीशिआ से जूझ रहे लोगों की दुनिया के बारे में सोचा ही नहीं है.

इसलिए मुझे लगा कि मुझे लोगों को इसके बारे में बताना चाहिए और बहुत सारे केसेस जो मेरे पास आते हैं उनकी काउंसलिंग करते-करते मुझे लगा कि वाक़ई में समाज में इसके लिए जागृति की सख़्त ज़रूरत है और इसलिए मैंने ये सोच कि चलो, इसके लिए एक अभियान चलाया जाए. तब मैंने सपोर्ट ऐंड एक्सेप्ट ऐलपीशिआ विद केतकी जानी शुरू किया और इसे लोगों का भरपूर प्रतिसाद मिला.

आप बॉडी शेमिंग को ले कर क्या कहना चाहेंगी?
बॉडी शेमिंग के सब्जेक्ट पर यदि सोचा जाए तो मैं हर इंसान को और ख़ासतौर पर हर महिला को कहना चाहूंगी केवल अपने लिए एड्जस्ट करने की कोशिश कीजिए. अपने मन में ये रखो कि आपको सिर्फ़ अपने लिए जीना है. चाहे आप कैसे भी हो: आपके बाल नहीं है, आपका रंग थोड़ा सांवला है, आप आप ब्लैक ब्यूटी हैं, आप फ़ैट ऐंड फ़ैबुलस हैं, बहुत पतले हैं पर अपने आप में ख़ुश हैं… आप जैसे भी हैं, आप क़ुदरत का एक स्पेशल एडिशन हैं, बस! ये याद रखो.

ख़ूबसूरती के लिए समाज ने जो ब्यूटी बैरियर्स बनाए हैं, उसे फ़ॉलो करने की कोई ज़रूरत नहीं है. आप जैसे हैं, वैसे अपने आपको प्यार करो और इसके लिए ये मत सोचो कि मुझे कोई और प्यार करे. किसी और का सर्टिफ़िकेट आपको आपके जीवन में नहीं चाहिए. सिर्फ़ अपने आपको एक्सेप्ट करो. ख़ुद को रोज़ मिरर में देखो और आई लव यू बोलो न! क्यूं आप हमेशा, जो एक चीज़ नहीं है आपके पास, उसके लिए रोते हो? इससे तो अच्छा ये है कि आपके पास जो है, आप उसके लिए गर्व करो. और मैंने जो मुहिम चलाई है उसके मिशन में एक बात यह भी थी कि मैं चाहती थी कि आगे जिन लोगों को ऐलपीशिआ हो या फिर वो जो आज लड़ रहे हैं इस डिस्ऑर्डर से उन्हें हिम्मत मिले. मुझे उन शायर का नाम तो याद नहीं है, लेकिन उनका शेर याद आ रहा है:
इससे पहले कि नया तीर निशां तक जाए
चीख़ना है मुझे मेरी आवाज़ जहां तक जाए
बस, इसीलिए मैंने इस जागरूकता की मुहिम को छेड़ा.

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शिल्पा शर्मा

शिल्पा शर्मा

पत्रकारिता का लंबा, सघन अनुभव, जिसमें से अधिकांशत: महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर कामकाज. उनके खाते में कविताओं से जुड़े पुरस्कार और कहानियों से जुड़ी पहचान भी शामिल है. ओए अफ़लातून की नींव का रखा जाना उनके विज्ञान में पोस्ट ग्रैजुएशन, पत्रकारिता के अनुभव, दोस्तों के साथ और संवेदनशील मन का अमैल्गमेशन है.

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