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क्या आपने बच्चों को ये लाइफ़ स्किल्स सिखाई हैं?

जीवन जीने के लिए बच्चों को ज़रूर सिखाएं ये बातें

टीम अफ़लातून by टीम अफ़लातून
August 23, 2023
in ज़रूर पढ़ें, पैरेंटिंग, रिलेशनशिप
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क्या आपने बच्चों को ये लाइफ़ स्किल्स सिखाई हैं?
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बच्चों की परवरिश बच्चों का खेल नहीं है. हम उनसे स्नेह करते हैं, पर कभी-कभी हमें उन्हें सही आदतें सिखाने के लिए कठोर भी बनना पड़ता है. और जैसा कि हम सभी पैरेंट्स जानते हैं कि जीवन में केवल आसानियां ही नहीं होतीं, कठिनाइयां भी आती हैं. अत: हमें अपने बच्चों को ऐसी लाइफ़ स्किल्स ज़रूर सिखानी चाहिए, ताकि वे जीवन के साथ तालमेल बिठा सकें, अच्छी तरह जी सकें. आइए, जानते हैं कि कौन सी बातें हमें बच्चों को ज़रूर सिखानी चाहिए.

हम अपने बच्चों को चाहे जितना भी प्यार करते हों, उन्हें कितने ही लाड़ से पालें, लेकिन यह बात बिल्कुल सच है कि ज़िंदगी के उतार-चढ़ावों को आगे जाकर बच्चों को ख़ुद ही मैनेज करना होता है. अत: बहुत ज़रूरी है कि हम उम्र के अनुसार अपने बच्चों को धीरे-धीरे ये लाइफ़ स्किल्स सिखाएं, जो उनके भीतर आत्मविश्वास पैदा करे कि वे अपने जीवन को सही तरीक़े से जी सकते हैं.

गुड टच, बैड टच में फ़र्क़ करना
आपके बच्चे के तीन-चार साल के होने तक आपको इस बारे में उसे जानकारी दे देना चाहिए. बच्चों के साथ जिस तरह की वारदातें होती हैं, उन्हें देखते हुए चाहे लड़का हो या लड़की दोनों को इस बारे में जानकारी दें और यदि वे किसी का नाम लेकर आपको बताएं कि उसने मुझे बैड टच किया है तो भले ही वह व्यक्ति आपके घर का सदस्य या रिश्तेदार ही क्यों न हो, उससे सवाल करें. अपने बच्चे पर पूरा भरोसा करें.

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निर्णय लेना 
बच्चों को अपनी उम्र के साथ छोटे-छोटे निर्णय लेना सिखाएं. उन्हें कौन से कपड़े पहनना है, क्या खाना है, कौन सा रंग पसंद है, इसके बारे में विकल्प देकर आप उनसे पूछ सकते हैं. फिर वे जो कहें, उसे मानिए और उनकी प्रशंसा भी कीजिए कि उन्होंने अपना निर्णय ख़ुद लिया. इसी तरह वे कौन सा खेल खेलना चाहते हैं, क्या सीखना चाहते हैं जैसी बातें भी उनसे पूछी जा सकती हैं.

स्वास्थ्य और साफ़-सफ़ाई का ध्यान 
यह स्किल तो आप बच्चों को तीन वर्ष के बाद किसी भी उम्र में सिखा सकते हैं कि उन्हें किस तरह ख़ुद को स्वच्छ रखना है. ब्रश करना, नहाना, खाने से पहले हाथ धोना यह सब सिखाते हुए उन्हें बताएं कि ऐसा करना क्यों ज़रूरी है, क्योंकि यह उनकी सेहत का मामला है. एक बार आपने उन्हें समझा दिया तो वे बिन कहे ही इन बातों को अपनी आदत बना लेंगे. अपने कमरे, टॉय बॉक्स आदि में चीज़ों को जगह पर रखना भी उन्हें तीन वर्ष की उम्र के बाद से सिखाया जा सकता है.

बातचीत करने का सलीका 
बच्चों से बात करें और उन्हें समझाएं कि यदि उन्हें कुछ अच्छा लगता है तो इसकी तारीफ़ करें, बुरा लग रहा है तो बताएं कि क्यों बुरा लगा. यदि कोई चीज़ उन्हें पसंद आ रही है तो उसे दोबारा करने के लिए इजाज़त लेना सिखाएं, पसंद नहीं आ रही है तो उसे करने के लिए मना करना सिखाएं. कोई उनकी मदद करे तो उसे धन्यवाद कहना, ग़लती हो गई हो तो सॉरी कहना, मदद मांगनी हो तो विनम्रता के साथ कैसे किसी को अप्रोच करना है ये सभी बातें कहकर ही बताई जा सकती हैं. यदि वे नहीं कहेंगे तो दूसरा व्यक्ति उन्हें नहीं समझेगा. इस बात के बारे में आप बच्चों को बात करके ही समझा सकते हैं.

खाना बनाना, अपना पेट भरना
पांच साल की उम्र के बाद से बच्चों को अपना पेट भरने के तरीक़े सिखाए जाने चाहिए, ताकि कभी पैरेंट्स को कहीं देर हो जाए तो वे भूखे न रहें. शुरुआत ब्रेड पर जैम या बटर लगाना सिखाने से की जा सकती है. पतीले में से अपने लिए ग्लास में दूध निकालना, उसमें शक्कर डालकर घोलना और पी लेना. इसी तरह वेजटेबल सैंडविच भी सात-आठ साल तक के बच्चे आसानी से बना सकते हैं. आप भोजन पकाते समय बच्चों को किचन में ही रहने को कहें तो देख-देखकर भी बच्चे कुकिंग स्किल्स सीख जाते हैं.

आपात स्थित में हेल्प लाइन नंबर पर संपर्क करना
बच्चों को यह बात अच्छी तरह सिखाएं कि यदि वे मुसीबत में हों तो उन्हें किस तरह चाइल्ड हेल्प या पुलिस का नंबर डायल करना है. ये नंबर उन्हें याद करा दें या फिर उनके फ़ोन में स्पीड डायल पर रखें. तीन साल के बाद बच्चों को दोनों पैरेंट्स के फ़ोन नंबर भी ज़ुबानी याद करवाए जा सकते हैं, ताकि किसी आपातकालीन स्थिति में वह किसी की मदद ले कर आपसे संपर्क कर सकें. अपने घर का पता भी बच्चों को मुंह ज़ुबानी याद करवाएं और उन्हें बताएं कि अगर हम (पैरेंट्स) आपसे कहीं बिछड़ जाते हैं तो पुलिस या वॉचमैन से हमें फ़ोन करने कहो या अपना पता बता कर घर छोड़ आने को कहो.

उम्र के अनुसार ये बातें ज़रूर सिखाएं
बच्चे जैसे-जैसे बड़ें हों उन्हें ख़ुद कपड़े निकालकर, पहनना और तैयार होना सिखाएं. सप्ताह में कम से कम एक बार उन्हें बर्तन धोना और मशीन में कपड़े लगाना सिखाएं. जब कभी बाहर खाने जाएं, उनसे ऑर्डर करने को कहें. उन्हें चीज़ों के दाम देखकर ख़रीदारी करना सिखाएं. दवाओं को एक्स्पायरी डेट चेक कर के इस्तेमाल किया जाता है, यह बात भी बताएं. उन्हें पॉकेट मनी दें, उसमें से पैसे बचाना सिखाएं और जो पैसे इस्तेमाल किए हैं उनका हिसाब रखना भी सिखाएं.

ये बातें अभी आपको भले ही छोटी-छोटी लगें, लेकिन आगे जाकर यह आपके बच्चों को जीवन अच्छी तरह जीने के आत्मविश्वास से लबरेज़ कर देंगी.

फ़ोटो: फ्रीपिक

 

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टीम अफ़लातून

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