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Home ओए हीरो

इस समय सही सूचनाओं की ज़रूरत है और हम लोगों तक वेरिफ़ाइड सूचनाएं पहुंचा रहे हैं: अणु शक्ति सिंह

शिल्पा शर्मा by शिल्पा शर्मा
May 9, 2021
in ओए हीरो, ज़रूर पढ़ें, मुलाक़ात
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कोविड-19 की दूसरी लहर हमारे देश के हर हिस्से में कहर ढा रही है, लोग असहाय से अपने क़रीबियों को लेकर अस्पतालों का चक्कर लगा रहे हैं. बेड्स, ऑक्सिजन, दवाइयां, प्लाज़्मा आदि की आवश्यकताओं के लिए भटक रहे हैं, ऐसे में सोशल मीडिया ने लोगों को थोड़ी राहत दी है. क्योंकि कई लोग इसके ज़रिए पैन इंडिया लेवल पर लोगों की मदद कर रहे हैं, उन तक सही सूचनाएं पहुंचा रहे हैं. अपने जॉब, घर के काम के साथ-साथ ये कुछ लोग, जो दिन-रात सत्यापित सूचनाएं लोगों तक पहुंचाने में लगे हैं, हमारी स्व-स्फूर्त कोरोना योद्धा सीरिज़ में हम आपकी इन कोरोना योद्धाओं से मुलाक़ात करवाएंगे.

जब कोरोना की दूसरी लहर ने अपना कहर बरपाना शुरू किया था, तब न तो अस्पताल तैयार थे, न प्रशासन. यूं तो आज भी हालात कमोबेश वैसे ही हैं, पर तब भी कुछ लोग ऐसे थे, जो सोच रहे थे कि हम मदद कैसे कर सकते हैं? अभूतपूर्व समस्या और मदद का कोई अनुभव नहीं, बावजूद इसके वे सबकुछ छोड़कर सोशल मीडिया के ज़रिए लोगों की मदद को आगे आए और कई लोगों के लिए राहत का सबब बने. और आज हम आपको जिनसे मिलवाने जा रहे हैं, मैंने पर्सनली फ़ेसबुक की कई पोस्ट्स में, कई लोगों को, उनसे मदद के लिए गुहार लगाते देखा. अणु शक्ति सिंह लेखिका हैं, कॉपी राइटर हैं. सिंगल मदर हैं, वर्किंग मदर हैं और इन सबसे पहले एक संवेदनशील इंसान हैं, क्योंकि वे छुट्टियां लेकर (लीव विदाउट पे), दिन-रात की परवाह किए बिना इस आपदाकाल में लोगों की मदद कर रही हैं, वो भी स्व-स्फूर्त और स्व-प्रेरणा से. यहां पेश हैं उनसे बातचीत के मुख्य अंश.

कोविड की दूसरी लहर के आते ही आपने कैसे मन बना लिया कि आपको लोगों की सहायता करनी है?
मैं जहां रहती हूं, उसके ठीक बगल में हाइवे है. मैं उन दिनों घर से ही काम कर रही थी और हर पांच-छह मिनट पर वहां से एक ऐम्बुलेंस गुज़र रही थी. मैं उस आवाज़ से बहुत व्यथित हो रही थी, मुझे डर लग रहा था. काम पर ध्यान ही नहीं दे पा रही थी. आज 15 दिन गुज़र जाने के बाद ये आवाज़ें आना कम हो गई हैं, क्योंकि शायद लोग जान गए हैं कि अस्पतालों में बिस्तर नहीं हैं, संसाधनों की क़िल्लत है, पर उन दिनों बहुत ऐम्बुलेंस आ-जा रही थीं. मैं ख़ुद भी कॉपी राइटर हूं तो जिस किसी कॉपी राइटर ने यह लिखा है कि ‘डर के आगे जीत है’, बिल्कुल सही लिखा है. जिस चीज़ से आपको डर लगे न उसके सामने डट कर खड़े हो जाना चाहिए तो डर ख़त्म हो जाता है. तो मुझे लगा कि इतने सारे लोग हैं, जिन्हें मदद चाहिए और मेरे पास एक ही चीज़ है, ह्यूमन रिसोर्स. यदि मैं आवाज़ उठाती हूं तो वह बहुत दूर तक जाती है. मैं ठीक-ठाक लोगों को जानती हूं, ठीक-ठाक लोग मुझे जानते हैं. ठीक-ठाक लोग मुझे सोशल मीडिया पर फ़ॉलो करते हैं. और कुछ नहीं यदि जनता की आवाज़ ही बन जाऊं तो शायद किसी का काम बन जाए. यह सोचकर मैंने एक पोस्ट लिखी कि अगर आप लोगों को लगता है कि मैं आपकी मदद कर सकती हूं तो मुझे बताइए, मैं पूरी कोशिश करूंगी.

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आप लोगों की मदद का ये काम किस तरह कर रही हैं?
मैं नौकरी करती हूं और अभी 10 दिनों से छुट्टी पर हूं, लीव विदाउट पे पर, जिसे ज़रूरत पड़ने पर आगे बढ़ा भी दूंगी. जिन लोगों के क़रीबी संक्रमित हैं, वो हमें फ़ोन करते हैं, कई बार पैनिक भी करते हैं. हम उन्हें उनकी ज़रूरत के अनुसार फ़ोन नंबर्स या हॉस्पिटल में बेड, वेंटिलेटर, ऑक्सिन आदि मुहैया कराने में मदद करते हैं. पहले तो मैं ख़ुद ही कॉल कर रही थी वेरिफ़िकेशन के लिए, लेकिन अब मेरे पास एक स्टैटिक सिस्टम बन गया है अब. कुछ वॉलंटियर्स जुड़ गए हैं. और जब आपके आसपास वॉलंटियर्स की टीम होती है तो चीज़ें आसान हो जाती हैं, जैसे- मैं यदि कोई पोस्ट डाल रही हूं और कोई दूसरा व्यक्ति जो उस क्षेत्र का है, उसकी वहां अच्छी पकड़ है, वो वॉलंटियर है तो वो कह देता/देती है कि मैं वेरिफ़िकेशन कर के सही स्थिति बताता/बताती हूं. तो हम दूसरे ज़रूरतमंद केस पर ध्यान देने लगते हैं, क्योंकि पता होता है कि इनका काम सही व्यक्ति कर रहा है. वह व्यक्ति सही जानकारी देता है, ज़रूरत पड़ती है तो मुझे फ़ॉलोअप करने कहता है. इस तरह काम करना, मदद करना आसान हो जाता है. तो मैंने बस शुरुआत की और मुझे काम करता देख बहुत से लोग इस काम में मेरी मदद करने लगे. तो ये हम सभी का साझा प्रयास बन गया, सही लीड्स मिलने लगे. लोगों की मदद होने लगी, लोगों की आस जुड़ गई.

ये काम करते हुए किस तरह के अनुभव हुए आपको?
कल ही कैनेडा से एक फ़ोन आया था, जिन्हें अपने रिश्तेदार के लिए आईसीयू की ज़रूरत थी. मैंने उन्हें बताया कि बेड्स ख़ाली नहीं हैं यहां तो आप होम आईसीयू का ऑप्शन देख सकते हैं. दिनभर बात चलती रही. मैंने उन्हें बहुत सारे नंबर्स दिए. होम आईसीयू वालों से बात की. शाम को होम आईसीयू अरेंज करने वालों का फ़ोन आया कि आपने जिनके बारे में कहा था उनकी ओर से कोई मैसेज नहीं आया है. जब मैंने उस व्यक्ति को कॉल किया तो उसने कहा कि मेरे रिश्तेदार के लिए तो बेड की व्यवस्था हो गई है. तो मैंने उन्हें कहा,‘‘मैं आपके पेशेंट के लिए चीज़ों की व्यवस्था कराने में अपना समय और एनर्जी दोनों ही लगा रही हूं. यदि आपके मरीज़ को बेड मिल गया तो इस बारे में मुझे इत्तला करने की कर्टसी भी नहीं है आप में? आप बता देते तो अपनी ऊर्जा मैं किसी और केस पर ख़र्च करती, जिन्हें वास्तव में ज़रूरत थी.’’ तो ऐसे अनुभव भी होते हैं. हमारे एक वॉलंटियर से यह भी पूछा गया,‘‘क्या आप गारंटी देंगे कि आप हॉस्पिटल बेड दिलवा सकते हैं? तभी हम पेशेंट के डीटेल्स शेयर करेंगे.’’ तो उसने जवाब दिया,‘‘मैं प्रयास कर सकता हूं. कोई सब्ज़ी तो लानी नहीं है, जिसकी गारंटी दी जा सके.’’ अभी ही एक ऑक्सिजन सिलेंडर की मांग आई. दिल्ली में सिलेंडर रीफ़िलिंग हो रही है, पर ख़ाली सिलेंडरों की कमी है. लोग अपने इस्तेमाल के लिए सिलेंडर ले रहे हैं और इस्तेमाल के बाद ख़ाली सिलेंडर घर में रख लेते हैं. हमारी टीम सुबह 10 बजे से लगी हुई है, ताकि ख़ाली सिलेंडर अरेंज हो जाए. इस बीच जिन्होंने इसके लिए मांग की थी वे मुझे रोते हुए बार-बार कॉल रही थीं, हमने उनकी बाक़ी की समस्या का निदान किया. लगभग 100 कॉल करने के बाद एक जगह, एक बंदे ने कहा कि वह 10 लीटर का सिलेंडर 20,000 रुपए में दे सकता है. मैंने तुरंत उन्हें फ़ोन किया और बताया तो वे बोलीं,‘‘ठीक है, लेकिन 20,000 में 20 लीटर का सिलेंडर अरेंज करवा दीजिए.’‘ मैंने उन्हें कहा कि मैं डीलर नहीं हूं. आपको डीलर का नंबर दे रही हूं, आप नेगोशिएट कीजिए. मैं सिर्फ़ लीड दे रही हूं. मेरे साथी मुझे पूरे वेरिफ़िकेशन के बाद नंबर दे रहे हैं और मैं उन्हें ही लोगों तक पहुंचा रही हूं. हम नंबरों को रोज़ वेरिफ़ाई करते हैं, सुबह-शाम वेरिफ़ाई करते हैं. और मदद करने के दौरान हमें पता चल भी जाता है कि संसाधनों की कमी के कारण चीज़ों की ब्लैक मार्केटिंग हो रही है, पर हम केवल और केवल मदद ही करना चाहते हैं, केवल लीड्स देना चाहते हैं.

इस तरह लोगों की मदद करने के अनुभव के बाद आप लोगों से क्या कहना चाहेंगी?
मैं लोगों से ये कहूंगी कि सबसे पहले तो ज़रूरी न हो तो प्लीज़ बाहर न निकलें. ख़ुद को स्वस्थ रखने के अतिरिक्त प्रयास करें. आज एक व्यक्ति का बीमार होना पूरी कम्यूनिटी का बीमार होना बन जाता है, क्योंकि यह बेहद संक्रामक बीमारी है. ये बीमारी वक़्त दे ही नहीं रही है, हम रातभर लगकर किसी के लिए व्यवस्था करते हैं तो पता चलता है कि सुबह वह व्यक्ति दुनिया से कूच कर चुका है. इसलिए ख़ुद को बीमार होने से बचाइए. बाहर जाते समय डबल लेयर मास्क पहनिए. लौटकर आने पर भाप लीजिए. पहली लहर में आप जो कर रहे थे, अब उन्हीं चीज़ों को दोगुना कर लें. दूसरी चीज़ मैं ये कहना चाहूंगी कि यदि आप सक्षम हैं तो मदद की चेन बनाएं. आज आप लोगों की मदद करेंगे तो कल कोई आपकी भी मदद करेगा.

फ़ोटो: गूगल

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शिल्पा शर्मा

शिल्पा शर्मा

पत्रकारिता का लंबा, सघन अनुभव, जिसमें से अधिकांशत: महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर कामकाज. उनके खाते में कविताओं से जुड़े पुरस्कार और कहानियों से जुड़ी पहचान भी शामिल है. ओए अफ़लातून की नींव का रखा जाना उनके विज्ञान में पोस्ट ग्रैजुएशन, पत्रकारिता के अनुभव, दोस्तों के साथ और संवेदनशील मन का अमैल्गमेशन है.

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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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