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Home ज़रूर पढ़ें

जानिए सावन में मायके की याद दिलानेवाली मिठाई घेवर का इतिहास

कनुप्रिया गुप्ता by कनुप्रिया गुप्ता
July 16, 2021
in ज़रूर पढ़ें, ज़ायका, फ़ूड प्लस
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सावन आया बादल छाए बुलबुल चहकी फूल खिले ,आने वाले सब आए हैं लेकिन तुम कब आओगे? बस आने ही वाला है सावन और साथ ही आने वाली है राखी. फिर चाहे बहनें भाई को राखी बांधने जा सकें या न जा सकें, या जा सकें तो जाने से पहले हर बहन के मन से एक तरंग तो उठेगी ही और मन गाएगा-
अब के बरस भेज भैया को बाबुल
सावन में लीजो बुलाय रे
लौटेंगी जब मेरे बचपन की सखियां
दीजो संदेशा भिजाय रे…
तो आज करेंगे सावन की बातें, सावन के पकवान घेवर के साथ…

हर ब्याहता को सावन में यूं महसूस होता है, जैसे- झूले सारी बहन, बेटियों का इंतज़ार करते होंगे, बचपन की सखियां, आंगन की चिड़ियां सब रास्ता देखेंगी और हम दूर परदेस में बैठी बेटियां फ़ोन पर बातें करते हुए मुस्कुराएंगी, पर अकेले में कहीं बैठी गुनगुनाएंगी- काहे को ब्याहे बिदेस, अरे लखियन बाबुल मोहे…
सावन का कितना महत्व है न हमारे देश में? और इस ख़ास महीने में होने वाले व्रत-उपवासों, त्योहारों का भी… सावन के ख़त्म होते ही कुछ दिन में आ जाती है राखी. और आज हम राखी के साथ जुड़ी ख़ास मिठाई की बात करेंगे- घेवर का नाम तो सुना ही होगा आपने? अगर नहीं सुना तो अब तो पढ़ ही लिया न? राजस्थान ने निकली ये ख़ास मिठाई शुभ कार्यों और बहन, बेटियों की मिठाई मानी जाती है. राजस्थान में कोई बड़ा उत्सव इसके बिना पूरा नहीं होता, चाहे वो रक्षाबंधन हो या बेटियों की गोद भराई; सगाई हो या शगुन; घेवर हर अच्छे काम में अपनी उपस्थिति दर्ज करता हुआ मिलेगा. बेटी घरआई है तो उसके साथ घेवर जाएगा, बेटी की गोद भराई है तो उसके लिए घेवर जाएगा, तीज है तो घेवर होगा ही होगा, शगुन का कोई काम है तो घेवर वहां ज़रूर होगा. राजस्थान और ब्रज क्षेत्र में ये मिठाई पारंपरिक रूप से सावन में बनाई और खाई जाती है. आजकल वैसे तो पूरे साल ये मिठाई आपको मिल जाएगी, पर सावन में घेवर का उतना ही महत्त्व है जितना बरसात में पकोड़ों का.

कहानी घेवर की: भारत में घेवर की जड़ें राजस्थान में हैं ये बात तो पक्की है और वहीं से ये ब्रज क्षेत्र में पहुंचा, पर प्रमाणिक रूप से इसका इतिहास कहीं नहीं मिलता. कहीं-कहीं कहा गया है कि घेवर भारत में पर्शिया से आया, पर इसके भी कोई पक्के प्रमाण नहीं हैं. वहीं राजस्थान के कुछ मिठाई वाले इसे ईरान की एक मिठाई से प्रेरित बताते हैं, पर प्रमाण उसके भी नहीं हैं. हां, ये कहा जाता है कि लखनऊ ये वाजिद अली शाह के वक़्त में पहुंचा और फिर वहां भी उतने ही चाव से खाया जाने लगा. अब जबकि कोई ख़ास प्रमाण नहीं तो सामान्य तौर पर इसकी उत्पत्ति राजस्थान की ही मानी जाती है.
सवान में घेवर सबसे ज़्यादा बिकता और खाया जाता है इसके पीछे एक कारण ये बताया जाता है कि पहली बारिश के बाद मौसम में जो नमी आ जाती है, वह घेवर के घोल के खमीर उठने में बड़ी सहायता करती है और उसी के कारण इस मौसम में बनने वाले घेवर में बेहतरीन जाली पड़ती है, जो इसके स्वाद को कई गुना बेहतर कर देती है. हालांकि, अब कई कृत्रिम साधनों से घेवर का खमीर उठाया जाता है पर फिर भी सावन के घेवरों की मांग सबसे ज़्यादा होती है, क्योंकि घेवर के रसिया लोग कहते हैं कि साल के दूसरे महीनो में बनाए जाने वाले घेवरों में वो स्वाद नहीं होता, जो सावन के घेवरों में होता है.

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कैसे बनाया जाता है घेवर: घेवर गोल मधुमक्खी के छत्ते जैसी मिठाई होती है इसीलिए इसे हनीकोम्ब स्वीट भी कहा जाता है. ये मैदे और घी से बनाई जाती है. कभी-कभी कुछ मिठाई वाले इसमें थोड़ा बेसन भी मिलाते हैं. खमीर उठे हुए मैदे को बड़ी-सी चपटी कढ़ाई में रखे सांचे में थोड़ा ऊपर से धीरे-धीरे डाला जाता है और घी में तला जाता है. सुनने में यह कितना आसन लगता है, पर घेवर में इसका सामान नहीं, बल्कि इसको बनाने की तकनीक और बनाने के पहले की तैयारी मायने रखती है. जब ये बन जाता है तो इसे चाशनी में डुबोया जाता है , कई बार लोग सूखे घेवर खरीदते और उन्हें घर लाकर ज़रूरत के हिसाब से चाशनी में डुबोते है. ये सूखे घेवर 25-30 दिनों तक आराम से रखे जा सकते हैं, जबकि चाशनी चढ़े हुए घेवर 5-7 दिन में खा लिए जाने चाहिए.
जयपुर में आपको घेवर के कई प्रकार मिल जएंगे. यहीं उत्पत्ति हुई पनीर घेवर की, जिसे घेवर के घोल में छेना मिलकर बनाया जाता है. इसी के साथ दूध घेवर भी बनाया जाता है, मावा घेवर भी आपको कहीं-कहीं मिल जाएगा. मलाई घेवर भी बहुत फ़ेमस है और रबड़ी घेवर भी. इनमें चाशनी वाले घेवर के ऊपर मलाई या रबड़ी फैलाई जाती है और फिर डाले जाते हैं ढेर सारे मेवे, जो घेवर के स्वाद में चार चाँद लगा देते हैं.

यादों में घेवर: मेरी घेवर वाली यादें नानाजी के साथ जुड़ी हुई हैं. हमारे नानाजी मीठे के बहुत शौक़ीन थे तो रक्षाबंधन पर जब भी मम्मी के साथ नानाजी के घर जाना होता घेवर से सामना होता. बाक़ी मैं घेवर की कल्पना थाली में गुलाबी काग़ज़ के बिना कर ही नहीं पाती, क्योंकि जैसा कि मैंने पहले भी कहा किसी की शादी हो तिलक हो या सगाई हो घेवर की थाली ज़रूर सजाई जाती है और उन घेवरों को रखा जाता है बड़ी-सी थाली में गुलाबी पेपर के ऊपर. मैंने जब भी कोई शादी, सगाई, गोद-भराई या तीज देखी, घेवर देखा ही देखा. जहां तक स्वाद की बात है घेवर सच में अद्भुत स्वाद लिए हुए होता है और शायद खुशियां और सावन दोनों मिलकर इसके स्वाद को बहुत बढ़ा देते हैं. मेरी तो आज इतनी ही बातें है आप भी बताइएगा आपको कैसा लगा घेवर के बारे में यह पढ़कर इस आई डी पर: oye.aflatoon@gmail.com मैं जल्द ही आऊंगी और नए क़िस्सों के साथ.

फ़ोटो: पिन्टरेस्ट

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कनुप्रिया गुप्ता

कनुप्रिया गुप्ता

ऐड्वर्टाइज़िंग में मास्टर्स और बैंकिंग में पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा लेने वाली कनुप्रिया बतौर पीआर मैनेजर, मार्केटिंग और डिजिटल मीडिया (सोशल मीडिया मैनेजमेंट) काम कर चुकी हैं. उन्होंने विज्ञापन एजेंसी में कॉपी राइटिंग भी की है और बैंकिंग सेक्टर में भी काम कर चुकी हैं. उनके कई आर्टिकल्स व कविताएं कई नामचीन पत्र-पत्रिकाओं में छप चुके हैं. फ़िलहाल वे एक होमस्कूलर बेटे की मां हैं और पैरेंटिंग पर लिखती हैं. इन दिनों खानपान पर लिखी उनकी फ़ेसबुक पोस्ट्स बहुत पसंद की जा रही हैं. Email: guptakanu17@gmail.com

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