अचार तो आपको भी पसंद होगा, पर आप कितना जानते हैं अचार के इतिहास को?
“दिल दे दो क्या दिल का अचार डालोगी” श्वेता तिवारी ने एक फ़िल्म में इस आइटम सॉन्ग पर डांस किया...
ऐड्वर्टाइज़िंग में मास्टर्स और बैंकिंग में पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा लेने वाली कनुप्रिया बतौर पीआर मैनेजर, मार्केटिंग और डिजिटल मीडिया (सोशल मीडिया मैनेजमेंट) काम कर चुकी हैं. उन्होंने विज्ञापन एजेंसी में कॉपी राइटिंग भी की है और बैंकिंग सेक्टर में भी काम कर चुकी हैं. उनके कई आर्टिकल्स व कविताएं कई नामचीन पत्र-पत्रिकाओं में छप चुके हैं. फ़िलहाल वे एक होमस्कूलर बेटे की मां हैं और पैरेंटिंग पर लिखती हैं. इन दिनों खानपान पर लिखी उनकी फ़ेसबुक पोस्ट्स बहुत पसंद की जा रही हैं. Email: guptakanu17@gmail.com
“दिल दे दो क्या दिल का अचार डालोगी” श्वेता तिवारी ने एक फ़िल्म में इस आइटम सॉन्ग पर डांस किया...
गर्मियों का आना सिर्फ़ मौसम का बदलना नहीं है, भोजन का, जीवन का बदल जाना भी रहा है. याद करके...
हल्की बरसात इनमें स्वाद बढ़ा देती है आम की क़िस्म उसे ख़ास बना देती है बात क्या हो रही है...
गुजराती खाने की बात होती है आप सबसे पहले क्या याद करते हैं? ढोकला, थेपला, हांडवा, फाफड़ा… बताइए न क्या...
स्वाद अजीब शय है. ये आपसे आपका धर्म, बोली, भाषा, रंग, राष्ट्रीयता कुछ नहीं पूछता और आप भी इसी स्वाद...
‘‘हलवा समझे हो क्या?’’ हिंदी फ़िल्मों में बहुत सुन लिया होगा अब तक यह आप सबने. और मतलब इसका शायद...
गुड़ सीं मीठा है बोसा तुझ लब का इस जलेबी में क़ंद ओ शक्कर है तेरे होंठों का चुम्बन गुड़...
भोजनान्ते पिबेत् तक्रं, दिनांते च पिबेत् पय:। निशांते पिबेत् वारि: दोषो जायते कदाचन:।। भोजन के बाद छाछ पीने वाला, सुबह...
लकीरों ने लोग बांट दिए घर की याद कैसे बांटोगे बरसों से जीव्हा पर ठहरा स्वाद कैसे बांटोगे हिन्दुस्तान, पाकिस्तान...
होली भले ही गुज़र चुकी हो, पर हमारे यहां तो रंग पंचमी तक सभी पर इसका ख़ुमार चढ़ा ही रहता...
हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.
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