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क्या आप वाक़ई ढोकले को जानते हैं? चेक कीजिए और जानिए इस हर-दिल-अज़ीज़ व्यंजन का इतिहास

कनुप्रिया गुप्ता by कनुप्रिया गुप्ता
May 14, 2021
in ज़ायका, फ़ूड प्लस
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गुजराती खाने की बात होती है आप सबसे पहले क्या याद करते हैं? ढोकला, थेपला, हांडवा, फाफड़ा… बताइए न क्या याद करते हैं? मुझे लगता है ज़्यादातर लोगों का जवाब ढोकला होगा और अगर मैं ये पूछूं कि इनमें से क्या ऐसा है, जो आपको किराने वाले, मिठाई वाले, चना चबेना बेचने वाले और यहां तक कि  पान वाले के पास भी मिल जाएगा? फिर तो पक्का सबका जवाब होगा-ढोकला… सच कहा न?

आज हम यहां ढोकले की बात करने जा रहे हैं तो सबसे पहले आप बताइए और फिर अपने अड़ोसी-पड़ोसी, यार-दोस्तों से भी पूछ लीजिएगा क आख़िर ढोकले का रंग क्या होता है? मुझे पता है कि अब आप हंसेंगे और हंसते-हंसते कहेंगे ये क्या बात कर रही हो, ये तो सबको पता है ढोकला पीला होता है! पर साहब सवाल का जवाब इतना ही आसन होता तो सवाल पूछा ही क्यों जाता? तो असली जवाब है ढोकला होता है “सफ़ेद”. और अब जो मैंने पूछ लिया कि ये बनता कैसे हैं तो सारे लोग एक आवाज़ में कहेंगे बेसन से. पर सारे लोग बैठ जाइए, क्योंकि ढोकला तो बनता है चावल, उड़द दाल और दही से. अब अपना सर खुजाइए और ख़ुद से सवाल पूछिए-तो फिर वो जो बेसन से बनता है, पीला होता है, वो क्या होता है ?
जानती हूं कुछ होशियार लोग हर जगह होते हैं और इसे पढ़ने वाले कुछ गुजराती लोग भी होंगे ही तो वे लोग पहले से जानते ही होंगे, पर जिन्हें नहीं पता उन्हें तो बता दूं कि वो होता है “खमण”. मतलब बात ये है कि सारी दुनिया में गली-मोहल्लों में आमतौर पर जिसे ढोकला कहा जाता है, वो महाराज खमण हैं. वैसे हैं ये भी ढोकला के परिवार के ही सदस्य, पर ये खमण हैं और यही ज्यादा प्रचलित भी हैं. कुछ लोग इसे खमण ढोकला के नाम से भी जानते हैं.

क्या है क़िस्सा खमण और ढोकले का?
जैसा कि ज़्यादातर लोग जानते हैं कि ढोकले का जन्म गुजरात में हुआ. इसके इतिहास के कोई ख़ास लिखित प्रमाण नहीं मिलते, पर ऐसा उल्लेख मिलता है कि ये 18वीं सदी में भी बनाया जाता था. तब इसे थोडा अधिक तीखा बनाया जाता था, फिर धीरे-धीरे इसका रूप आज वाले ढोकले के रूप में सामने आया. कुछ क़िस्सों के अनुसार अंग्रेजों के भारत आने के बाद इसके तीखेपन को कम किया गया, क्योंकि वो लोग मिर्ची कम खाते थे. पुराने समय से ही ढोकले को चावल, उड़द दाल और दही की खटाई के साथ खमीर उठाकर बनाया जाता रहा. कहा जाता है कि जैन धर्म के अनुयायियों ने इसके रूप में परिवर्तन किया, क्योंकि उनके अनुसार जब किसी भी खाद्य पदार्थ का खमीर उठाया जाता है तो उसमें जीव पनपते हैं और जब उसे पकाया जाता है तो ये जीव मारे जाते हैं इसलिए उन्होंने खमीर से बनने वाले व्यंजनों को फेर-बदल करके अपने भोजन में शामिल किया. हो सकता है खमण का जन्म भी शायद ऐसी ही किसी अवधारणा के चलते हुआ हो या एक कारण ये भी हो सकता है खमण बनाने के लिए चावल, दाल नहीं पीसना पड़ता बस बेसन में कुछ पदार्थ मिलकर इसे जल्दी बनाया जा सकता है यानी इसे इंस्टेंट रूप में बनाया जा सकता है.

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खमण या ढोकला क्या है ज़्यादा प्रसिद्ध?
आमतौर पर जनमानस के मन में ढोकले की जो छवि है, वो खमण वाली ही है. देश-विदेश में खमण को ही ढोकले के रूप में जाना जाता है. दुनिया की हर जगह जहां भारतीय लोग हैं, वहां खमण ही ढोकले के नाम से बिकता या बनाया जाता है. खमण की प्रसिद्धि का एक कारण ये भी है कि इसे लम्बे समय तक स्टोर करके रखा जा सकता है. साथ ही, इसके स्वाद में खटाई के साथ एक मिठास भी होती है जो ग़ैर-भारतीय लोगों को भी अपनी तरफ़ आकर्षित करती है, जबकि ढोकले के स्वाद में एक खट्टापन और तीखापन होता है जो शायद सबकी स्वाद-ग्रंथियों को आकर्षित नहीं करता. हालांकि किसी गुजराती से पूछेंगे तो शायद वो इस बात को दिल पर ले ले कि खट्टा ढोकला का अपना अलग स्वाद है और खमण का अपना अलग… तो तुलना की ही क्यों जाए? पर सामान्य तौर पर ये कहा जा सकता है कि खमण ज़्यादा प्रचलित भी है, ज़्यादा लोगो की पसंद भी और आसानी से उपलब्ध भी.

मेरी ढोकले वाली कहानी
मेरे लिए बरसों तक खमण ही ढोकला रहा. हमें पता ही नहीं था कि एक खट्टा ढोकला भी होता है, जो असली ढोकला है. मध्यप्रदेश में और उसके बाद मुंबई में भी एक प्लास्टिक के पैकेट में, चार चौकोर टुकड़ों में मिलने वाला ये ढोकला कई बार छोटी-छोटी भूख को बाय-बाय कहने का साथी रहा. स्कूल-कॉलेज में या जॉब के समय जब तेज़ भूख लगती और कुछ तला-भुना खाने का मन न होता तो ये खमण रूपी ढोकला ही काम आता. पोहे के साथ ढोकला, समोसे के साथ ढोकला कई बार नाश्ते को पूरा करने के लिए खाया गया.  फिर वक़्त के साथ घर में भी बनाया जाने लगा. खट्टा ढोकला तो शादी के बाद पता चला कि एक सफ़ेद ढोकला भी होता है और फिर तो एक ढोकला और बनने लगा, जो था रवा का ढोकला. यह रवा को दही में गलाकर उसके मीठा सोडा डालकर बनाया जाता है. सामान्य तौर पर मेरे घर में भी खमण और रवा ढोकला ज्यादा बनता है, क्योंकि यह झटपट भी है और स्वादिष्ट भी. तो आप भी हमें बताइए कि क्या पसंद है आपको खमण या ढोकला?

फ़ोटो: पिन्टरेस्ट

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कनुप्रिया गुप्ता

कनुप्रिया गुप्ता

ऐड्वर्टाइज़िंग में मास्टर्स और बैंकिंग में पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा लेने वाली कनुप्रिया बतौर पीआर मैनेजर, मार्केटिंग और डिजिटल मीडिया (सोशल मीडिया मैनेजमेंट) काम कर चुकी हैं. उन्होंने विज्ञापन एजेंसी में कॉपी राइटिंग भी की है और बैंकिंग सेक्टर में भी काम कर चुकी हैं. उनके कई आर्टिकल्स व कविताएं कई नामचीन पत्र-पत्रिकाओं में छप चुके हैं. फ़िलहाल वे एक होमस्कूलर बेटे की मां हैं और पैरेंटिंग पर लिखती हैं. इन दिनों खानपान पर लिखी उनकी फ़ेसबुक पोस्ट्स बहुत पसंद की जा रही हैं. Email: guptakanu17@gmail.com

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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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