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Home ज़ायका

क्या आप जानते हैं सरहद पार के स्वाद से सराबोर दाल मखनी की दास्तां?

कनुप्रिया गुप्ता by कनुप्रिया गुप्ता
April 9, 2021
in ज़ायका, फ़ूड प्लस
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लकीरों ने लोग बांट दिए घर की याद कैसे बांटोगे
बरसों से जीव्हा पर ठहरा स्वाद कैसे बांटोगे
हिन्दुस्तान, पाकिस्तान के बंटवारे की कितनी ही कहानियां पुरानी पीढ़ी की यादों में डेरा जमाए रहीं और उन्होंने वो यादें, वो दर्द नई पीढ़ी को विरासत में दे दिया. जानते हैं न? लोग अपना सबकुछ छोड़कर किसी की खींची लकीरों के चलते दो अलग-अलग देशों के हो गए. इधर से कुछ लोग उधर चले गए, उधर से कुछ लोग इधर चले आए. ये लोग अपने साथ अपनी रहन-सहन की, खानपान की आदतें भी ले आए और इन आदतों के साथ आए कई स्वाद और कई व्यंजन भी.

आज हम ऐसे ही एक बेहद प्रसिद्ध व्यंजन की बात कर रहे हैं, जो सरहद पार से आया, भारत आकर उसने अपना रूप बदला और फिर सारी दुनिया में फैल गया. बात हो रही है दाल मखनी की. नान हो, तंदूरी रोटी हो, परांठा हो या चावल सबके साथ इसकी जोड़ी हिट है.
आपको गुरद्वारों के लंगर तो याद होंगे ही, गुरबानी की मीठी धुन के साथ लंगर में मिलने प्रसाद में जो दाल मखनी परोसी जाती है, उसका स्वाद अद्भुत होता है! शायद ये भी सच है कि प्रसाद के रूप में मिलने वाली हर चीज़ अमृत के समान होती है, पर कहने वाले ये कहते हैं और सच कहते हैं कि लंगर से अच्छी दाल मखनी कहीं नहीं मिलती.

कहानी दाल मखनी की: पंजाबी घरों में उड़द की दाल बरसों से प्रचलन में है ख़ासकर काली उड़द से बनाई जानेवाली दाल, जिसे मा की दाल भी कहा जाता है, आपको ज़रूर देखने मिलेगी, जबकि पारंपरिक रूप से भारत के अन्य राज्यों में तुअर ,मूंग और चना दाल का प्रचलन अधिक रहा है.
अब आप कहेंगे कि मैंने सबसे पहले सरहदी बातें कर दीं और अभी तक वो कहानी बताई ही नहीं, जो बतानी थी, नाइंसाफ़ी की न? तो चलिए, पहले वही बता देती हूं, मूल रूप से ये दाल पश्चिमी पंजाब के पेशावर की देन है. ये शहर अब पाकिस्तान का हिस्सा है. तो बात ये है कि वहां कुछ ढाबे वाले थे, जो अपने ग्राहकों को काली उड़द की दाल बनाकर रोटी या नान के साथ सर्व करते थे और लोगों को ये बेहद पसंद आती थी. हालांकि ये दाल मखनी नहीं थी और इसमें खटाई के लिए टमाटर भी प्रयोग में नहीं लिया जाता था, पर इसे दाल मखनी की बेस दाल कहा जा सकता है. फिर? फिर क्या साहब, बंटवारा हो गया लोग अपने घर-बार सब छोड़कर इधर से उधर गए, उधर से इधर आए और साथ में ले आए अपने खानपान की धरोहर. क्योंकि भले ही इंसान देश छोड़कर कहीं भी चला जाए, सारा घर, सामान, पड़ोसी, नाते-रिश्तेदार तो वो अपने साथ नहीं ले जा सकता, पर स्वाद और याद ये ऐसी चीज़ें हैं, जो हर हाल में साथ जाती हैं. बस वही हुआ, पेशावरी दाल यहां भी चली आई.

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क़िस्सा दाल मखनी के जन्म का: दाल मखनी की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है इसका जनक “कुंदनलाल गुजराल” को माना जाता है, जिन्होंने आगे चलकर “मोतीमहल” रेस्टोरेंट्स की स्थापना की. कहा जाता है कि दाल मखनी उतनी ही पुरानी है जितना कि बटर चिकन. क़िस्सा प्रसिद्ध है कि कुंदनलाल जी जब तंदूरी चिकन बनाते थे तो कुछ समय के बाद वो बाहर से ड्राई हो जाता था तो बहुत खोज-बीन के बाद उनने एक मखनी ग्रेवी बनाई जिसमें टमाटर, मक्खन और क्रीम का ऐसा कॉम्बिनेशन था, जो चिकन को क्रीमी फ़्लेवर देता था और उसे ड्राई नहीं होने देता था. जब इसे सर्व किया गया तो ग्राहकों को इसका स्वाद बेहद पसंद आया. अब शाकाहारियों के लिए भी कोई ऑप्शन चाहिए था तो काली उड़द की दाल के साथ प्रयोग किए गए, उसमें डाला गया थोड़ा राजमा (क्रीमी टेक्स्चर के लिए), थोड़ी-सी चना दाल (गाढ़ेपन के लिए) और धीमी-धीमी आंच पर लम्बे समय तक उसे पकाया गया. फिर टमाटर और कुछ मसालों के साथ डाला गया ढेर सारा क्रीम और मक्खन, जिसने इसके ज़ायके को कई गुना बढ़ा दिया और यक़ीन मानिए, जितने चाहने वाले बटर चिकन के हैं, उतने ही चाहने वाले दाल मखनी के भी मिल जाएंगे. दाल में शाही फ़्लेवर का ये पहला प्रयोग माना जा सकता है, जो बहुत सफल भी हुआ और इतना ज़्यादा लोकप्रिय भी.

दाल मखनी वाली बातें: मध्यप्रदेश में हमारे घरों में दाल मखनी बनाने का प्रचलन आज भी लगभग नहीं है या बेहद कम ही है. हालांकि खाने का प्रचलन तो अब ख़ूब है: शादी, पार्टियों और रेस्तरां में लोग इसे चाव से खाते हैं. हां, घरों में इसे कभी-कभार ही बनाया जाता है, जब घर पर ही तंदूरी रोटी बनाई जा रही हो. हां, दिल्ली से आए और पंजाबी परिवारों में यह बनती रही है. मैंने दाल मखनी पहली बार किसी रेस्तरां में ही खाई थी. पहली बात तो पीली दालें खाने वाले हम लोगों के लिए काली उड़द की दाल ही नई बात थी, ऊपर से इसका मखनी स्वाद इसे बाक़ी सारी दालों से अलहदा लगा. फिर धीरे-धीरे दाल मखनी हमारे भोजन में भी जगह बनाने लगी और इसने अपनी पहुंच घर के खाने तक भी बना ली. अब तो छोटी-बड़ी पार्टीज़, पॉटलक और गेट-टु-गैदर्स में मेन्यू में दाल मखनी का स्वाद चमकने लगा है.
आपका भी दाल मखनी से जुड़ा कोई किस्सा होगा न? कब इसने आपके भोजन में जगह बनाई? हमें भी बताइएगा, इस आईडी पर: oye.aflatoon@gmail.com

फ़ोटो: पिन्टरेस्ट

Tags: dal makhanihistory of dal makhaniweekly columnWeekly column by Kanupriya Guptaकनुप्रिया गुप्तादालदाल मखनीदाल मखनी का इतिहासदाल मखनी की दास्तांसरहद पार का स्वादसाप्ताहिक कॉलम
कनुप्रिया गुप्ता

कनुप्रिया गुप्ता

ऐड्वर्टाइज़िंग में मास्टर्स और बैंकिंग में पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा लेने वाली कनुप्रिया बतौर पीआर मैनेजर, मार्केटिंग और डिजिटल मीडिया (सोशल मीडिया मैनेजमेंट) काम कर चुकी हैं. उन्होंने विज्ञापन एजेंसी में कॉपी राइटिंग भी की है और बैंकिंग सेक्टर में भी काम कर चुकी हैं. उनके कई आर्टिकल्स व कविताएं कई नामचीन पत्र-पत्रिकाओं में छप चुके हैं. फ़िलहाल वे एक होमस्कूलर बेटे की मां हैं और पैरेंटिंग पर लिखती हैं. इन दिनों खानपान पर लिखी उनकी फ़ेसबुक पोस्ट्स बहुत पसंद की जा रही हैं. Email: guptakanu17@gmail.com

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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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