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सलाद की रोचक कहानी, जो आप नहीं जानते होंगे

कनुप्रिया गुप्ता by कनुप्रिया गुप्ता
February 26, 2022
in ज़रूर पढ़ें, ज़ायका, फ़ूड प्लस
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तला-भुना खाना हमारे भोजन का हिस्सा रहा है पर हम हमेशा यही खाते रहे हैं, ऐसा बिल्कुल नहीं है. गरिष्ठ भोजन के साथ हम हल्के, सुपाच्य और हेल्दी फ़ूड के भी प्रसंशक रहे हैं और ये आज की बात नहीं है, सदियों से भारत में कंद-मूल-फल भोजन के रूप के में ग्रहण किए जाते रहे हैं. यही वजह है कि आज हम सलाद और उसकी रोचक कहानी पर चर्चा करने जा रहे हैं.

 

आजकल आपने देखा होगा हेल्दी डायट में लोगों ने सलाद का प्रयोग काफ़ी बढ़ा दिया है और सलाद, सैलेड हो गया है. ये ठीक वैसा ही है, जैसे योग जब तक हमारा था, हमें कद्र जरा कम थी पर जबसे वो पश्चिमी देशों में आया और वहां ‘योगा’ बन गया हमें भी अच्छा लगने लगा. उसके चाहने वाले भी बढ़ गए, ठीक इसी तरह हमारी पौराणिक कथाओं में भी भोजन रूप में कच्चे कंद-मूल, फल और सब्ज़ियों का सेवन करने के क़िस्से मिले जाएंगे. गांवों में किसी भी बड़े बुज़ुर्ग से पूछ लीजिए खेतों से गाजर, ककड़ी, मूली खाने की बातें करता मिल जाएगा तो यह पूरा मामला चीज़ वही, रूप नया वाला है.
बाक़ी आज जो सलाद का रूप हम देखते हैं, वह इन्ही सब चीज़ों का मिश्रण है, पर इसमें और भी कुछ स्वास्थ्य के लिए अच्छी चीज़ें डाली जाती है और उन्हें काटकर साफ़ करके एकसाथ मिला दिया जाता है.

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सलाद आख़िर क्या है और ये नाम आया कहां से?
आपको एक बड़ी मज़ेदार बात बताती हूं. सलाद नाम सुनकर कई लोगों को लग सकता है कि इसमें सलाद वाली पत्तियों यानी लेटस या उसके अन्य प्रकारों का होना ज़रूरी होता होगा, पर सच्चाई यह है कि सलाद के लिए मिलने वाली इन तरह-तरह की पत्तेदार चीज़ों का सलाद में होना उसे सलाद नहीं बनता, बल्कि सलाद शब्द तो “साल” शब्द से बना है, जिसका अर्थ होता है नमक. जी हां, फल, सब्ज़ियों को और दूसरी चीज़ों को धो काटकर एक साथ मिलाकर जब उसमें नमक मिला दिया जाता है तो टेक्निकली वो सलाद हो जाता है.

इतिहास की गलियों में सलाद
आप कहेंगे जब भारत में सलाद खाया ही जाता रहा है तो ये भारत में ही सबसे पहले खाया गया होगा. बात तो ठीक है, पर मुख्य बात तो यह है कि पूरे विश्व में स्थानीय फल और सब्ज़ियां हमेशा से खाई जाती रही हैं. लेकिन उन सबको सलाद नहीं माना जाता. शायद ये इसलिए कि उन्हें एक-दूसरे के साथ मिलाकर इस तरह नहीं खाया जाता रहा होगा. तो मुद्दे की बात यह है कि जिसे हम आज सलाद कहते हैं उसका जन्म रोमन साम्राज्य में माना जाता है.
ऐसा माना जाता है कि लगभग पहली सदी ईस्वी में रोमन लोग एक जगह इकट्ठे हुए और उन्होंने तरह-तरह की कच्ची खाई जा सकने वाली सब्ज़ियों को काटा एक साथ मिलाया, उसमें थोड़ा सिरका (विनेगर), तेल और थोड़ी हर्ब्स मिलाईं और यूं दुनिया का पहला सलाद बनकर तैयार हुआ.
ये सलाद लोगों को इतना पसंद आया कि लोग इसके दीवाने हो गए, पर बात यहीं ख़त्म नहीं हुई सलाद को कब खाया जाए इसको लेकर भी ख़ूब बहस हुई. दो धड़े बन गए, जिसमें से एक पक्ष के लोग कहते थे कि सलाद को मुख्य भोजन के पहले खाना चाहिए, क्योंकि इसमें मौजूद फ़ाइबर हमारी आंतों को साफ़ कर देता है, जिसके कारण मुख्य भोजन भी सही ढंग से पचता है. वहीं दूसरे पक्ष के लोगों का कहना था कि सलाद को भोजन के अंत में खाना चाहिए, क्योंकि सलाद में डाले हुए विनेगर के कारण खाने के साथ पी जाने वाली वाइन का स्वाद ख़राब हो जाता है.
ख़ैर धीरे-धीरे सलाद को भोजन के पहले खाने का प्रचलन बढ़ा. इसी के साथ सलाद अलग-अलग समय पर पूरे विश्व में पहुंचा और सभी ने अपने-अपने हिसाब से इसमें परिवर्तन किए. जो सलाद के पत्ते यानी सैलड लीव्स हम आजकल इसमें देखते हैं, उन्होंने भी बाद में इसमें अपनी जगह बनाई. बाद में ऐसे देशों में जहां मांसाहार का प्रचलन ज़्यादा था, उन्होंने इसमें प्रोटीन रूप में मीट को भी मिलाना शुरू कर दिया तो सलाद भी नॉन-वेज और वेज हो गया. .

भारत कैसे पहुंचा सलाद
आज वाला सलाद जिसे लोग सैलेड भी कहते हैं ऐसा माना जाता है कि ये रोम से अरब होता हुआ भारत पहुंचा, क्योंकि प्राचीन रूप से हरी सब्ज़ियों को इस तरह से खाने के ख़ास प्रमाण नहीं मिलते हैं. पर भारत में सलाद खाया ही नहीं जाता होगा ये कहना मुश्क़िल है, क्योंकि पंजाबी लोग बहुत लम्बे समय से सलाद का रूप कचूमर सलाद खाते रहे हैं, जिसे सब्ज़ियों और फलों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर बनाया जाता था. वही दक्षिण भारत में कोसंभारी जो मूंग की दाल से बनाया जाता था, वो भी सलाद का ही रूप है (हालांकि ये आधुनिक सलाद से बिल्कुल भी नहीं मिलता है!), पर हम कच्ची सब्ज़ियां और फल खाते रहे हैं इसमें कोई दोमत नहीं है.

बातें सलाद वाली
भारत के आम घरों में आजकल वाले सैलेड का प्रचलन 20 वर्ष पहले तक लगभग न के बराबर था, हालांकि ककड़ी, मूली, टमाटर, चुकंदर, प्याज़ सब खाया जाता था, पर आधुनिक सलाद अब भी आम घरों में कम ही देखने मिलता है. लेकिन जैसे-जैसे हमारी जीवनशैली बदल रही है सलाद का प्रचलन बढ़ रहा है. अब तो आपको हर रेस्तरां में इतने तरह के सलाद मिल जाएंगे कि आप सोच भी नहीं सकते. जहां अब तरह-तरह के सलादों ने भोजन का स्थान भी ले लिया है, वहीं बड़े शहरों बढ़ते सलाद बार आपको अलग ही दुनिया के दर्शन करवाते हैं. चाहती तो थी कि इस आलेख में आपको कुछ अच्छे सलाद की रेसिपी बताऊं, जो मुझे बहुत पसंद है या जिन्हें हम मील रिप्लेसमेंट की तरह प्रयोग में लेते हैं, पर आलेख यूं भी बहुत लंबा हो गया है इसलिए केवल नाम बताती हूं. फिर कभी किसी आलेख में हम तरह तरह के सलादों की बात करेंगे. तो मेरे फ़ेवरेट सलाद में सबसे ऊपर नाम आता है मैक्रोनी सलाद का. दूसरा पसंदीदा है सलाद है पास्ता सलाद. उसके बाद काबुली चने वाला सलाद तो है ही, पर इसी के साथ मुझे कचूमर सलाद भी काफ़ी पसंद है, लेकिन इसे मुख्य भोजन के साथ ही खाया जा सकता है इसे मील रिप्लेसमेंट की तरह प्रयोग नहीं कर सकते हैं. तो आप लोग भी बताइएगा अपना पसंदीदा सलाद इस आईडी पर: oye.aflatoon@gmail.com हो सका तो फिर कभी सलाद के प्रकारों की भी बातें करेंगे.

फ़ोटो: पिन्टरेस्ट

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कनुप्रिया गुप्ता

कनुप्रिया गुप्ता

ऐड्वर्टाइज़िंग में मास्टर्स और बैंकिंग में पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा लेने वाली कनुप्रिया बतौर पीआर मैनेजर, मार्केटिंग और डिजिटल मीडिया (सोशल मीडिया मैनेजमेंट) काम कर चुकी हैं. उन्होंने विज्ञापन एजेंसी में कॉपी राइटिंग भी की है और बैंकिंग सेक्टर में भी काम कर चुकी हैं. उनके कई आर्टिकल्स व कविताएं कई नामचीन पत्र-पत्रिकाओं में छप चुके हैं. फ़िलहाल वे एक होमस्कूलर बेटे की मां हैं और पैरेंटिंग पर लिखती हैं. इन दिनों खानपान पर लिखी उनकी फ़ेसबुक पोस्ट्स बहुत पसंद की जा रही हैं. Email: guptakanu17@gmail.com

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