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Home ज़रूर पढ़ें

कढ़ी के साथ क्या खाया जाता है? हमें आपका जवाब पता है, लेकिन इसके कई और साथी भी हैं!

कनुप्रिया गुप्ता by कनुप्रिया गुप्ता
December 6, 2021
in ज़रूर पढ़ें, ज़ायका, फ़ूड प्लस
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कढ़ी तो हम सभी को पसंद आती है, फिर चाहे हम भारत के किसी भी हिस्से में रहते हों. हां, हर हिस्से में इसका स्वाद थोड़ा-थोड़ा बदलता जाता है, पर हर जगह लोग इसके दीवाने हैं. आपको बता दूं कि अमेरिका के लोग भी कढ़ी बहुत पसंद करते हैं! तो आज बात होगी सबकी पसंदीदा कढ़ी से जुड़ी

 

खाना कितनी ही तरह का होता है न, एक जी ललचाए रहा न जाए टाइप का, तो दूसरा जीभ जल जाए पर रुका न जाए वाला. कोई जीभ को मीठी अनुभूति करवाने वाला तो कोई देश दुनिया के स्वाद से परिचित करवाने वाला. पर एक खाना होता है कम्फ़र्ट देने वाला, मन को सुकून देने वाला, दुनियाभर की माथापच्ची से निपटकर जब आप घर आते हैं तो आपको घर का एहसास दिलाने वाला. अब जब भी ऐसे किसी खाने की बात होगी ज़्यादातर लोग या तो दाल-चावल की बात करेंगे या कढ़ी-चावल की. कभी ध्यान दिया है आपने कि ऐसा क्यों होता है? मुझे लगता है शायद इसलिए कि ये खाना पेट पर हल्का होता है, आराम से पचता है और ये बात तो सब जानते हैं कि पेट ही आधी बीमारियों का जन्मस्थान होता है और भारी, तले हुए या तेज़ मिर्च-मसालेदार खाने के बाद यही पेट हमसे उम्मीद करता है की हम कुछ सादा-सा खा लें और हम कम्फ़र्ट फ़ूड की शरण में चले जाते हैं.
याद कीजिए पिछली बार किसी शादी या पार्टी में बहुत गरिष्ठ खाना खाकर चले आए थे तो अगले दिन सुबह मन कैसे बार-बार कह रहा था की कहीं से दाल-चावल या कढ़ी-चावल खाने को मिल जाए. बस यही वह सुख है, जो कढ़ी को पसंद करनेवालों को मिलता है.

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कहानी कढ़ी की: कढ़ी शब्द का जन्म 1500 ईसा पूर्व के साउथ इंडिया के करी शब्द से हुआ माना जाता है, पर कढ़ी का जन्म राजस्थान में हुआ. आप कहेंगे की कढ़ी तो पंजाब और गुजरात और यहां तक कि महाराष्ट्र की भी फ़ेमस है… पर सच यही है कि कढ़ी राजस्थान में जन्मी है और गुजरात, महाराष्ट्र और पंजाब की कढ़ी, राजस्थान वाली कढ़ी का ही स्थानीय रूप है.
वैसे तो मोहनजोदड़ो की खुदाई में भी एक तरह का मसाला पाउडर मिला, जो मान गया कि कढ़ी में डालने के काम में लिया जाता होगा.
कढ़ी सबसे पहले किसने बनाई, ये किसी को नहीं पता, पर राजस्थान में क्योंकि रेगिस्तानी इलाक़ा ज़्यादा था और हरी सब्ज़ियां आसानी से नहीं मिलती थीं. और साथ ही वहां ऊंट और गाय, भैंस व अन्य दुधारू जानवर काफ़ी होते थे तो वहां रोज़ के भोजन में दूध दही का इस्तेमाल काफ़ी ज़्यादा था. इसी के चलते छाछ और दही जैसे पदार्थों का प्रयोग भोजन बनाने में किया जाता था. तो यहीं कढ़ी का जन्म हुआ और फिर यहीं से ये कढ़ी पंजाब, हरियाणा, गुजरात और महारष्ट्र भी पहुंची.

हर जगह अलग रंग: कढ़ी कहीं की भी हो मुख्यत: उसमे तीन चीज़ें होती हैं दही/छाछ, बेसन और किसी अपने के हाथ का स्वाद… मां के हाथ का स्वाद वाली बात अब पुरानी हुई, माओं को महान बनाने से छुट्टी दी जानी चाहिए! हाथ का स्वाद भी इसलिए कहा, क्योंकि कढ़ी को बनाने का अंदाज़ सबका अलग होता है, जिसके कारण उसके स्वाद में भी काफ़ी अंतर आता है.
राजस्थान में जहां कढ़ी थोड़ी पतली मतलब पानीवाली होती है, वहीं मारवाड़ में एक और कढ़ी बनती है मूंग दाल की कढ़ी, जो बनने में ज्यादा वक़्त और मेहनत लेती है, क्योंकि इसे मूंग की दाल गलाकर फिर पीसकर बनाया जाता है और पकोड़ी भी मूंग की ही बनाई जाती है. पंजाब में कढ़ी थोड़ी गाढ़ी होती है और साथ में होते हैं प्याज़ के पकौड़े, जो बेसन की कढ़ी में डाले जाते हैं. गुजरात की कढ़ी भी पतली और लाल मिर्च के बिना बनाई जाती है और इसके पकोड़े भी फीके होते होते हैं. साथ ही, गुजराती लोग कढ़ी में मन भरकर गुड़ या शक्कर डालते हैं इसलिए गुजरात की कढ़ी स्वाद में मीठी होती है. और हां, अलग-अलग जगह की कढ़ी और उसका स्वाद और उसमें मिलाया जानेवाला तड़का अलग अलग होता है

कढ़ी के साथी: कढ़ी के साथ क्या खाया जाता है ये किसी से पूछेंगे तो शायद पहला जवाब होगा-चावल, क्योंकि उत्तर भारतियों ने कढ़ी को चावल के साथ इस हद तक फ़ेमस कर दिया है कि इसके दूसरे साथियों पर ध्यान ही नहीं जाता पर सच ये है कि राजस्थान और मध्यप्रदेश में कढ़ी थुल्ली (मीठा दलिया) के साथ भी खाई जाती है. इसी के साथ आपको कढ़ी के साथ समोसा, पकौड़े, गोटे, फाफड़े, ढोकला जैसे स्नेक्स भी खाने को मिल जाएंगे और यक़ीन रखिए कि कढ़ी हर किसी चीज़ का स्वाद बढ़ा देती है. इसके अलावा कढ़ी और न जाने कितने ही व्यंजनों के साथ साइड डिश के रूप में भी खाई जाती है, जैसे-राजस्थान में दाल बाटी के साथ कढ़ी बनती है तो कुछ लोग पुलाव के साथ भी कढ़ी खाते हैं.
आपको जानकार आश्चर्य होगा की कढ़ी में काफी मात्रा में मैग्नीशियम पाया जाता है और ये पेट की अग्नि को भी बढ़ाता है इसलिए आयुर्वेद में भी इसके कई फ़ायदे बताए गए हैं.

किस्से कढ़ी वाले: कढ़ी आम घरों में सर्दियों में ज़्यादा बनाई जाती है और लोग सर्दी-ज़ुकाम के वक़्त गरमगरम कढ़ी पीकर भी सर्दी भगाने की कोशिश करते हैं, कई मामलों में ये कारगर भी होती है. आपको राजस्थान, मध्यप्रदेश में कई लोग मिल जाएंगे, जो सर्दी होते ही कहेंगे गर्म कढ़ी पी लो और ओढ़कर सो जाओ, सर्दी भाग जाएगी. तो कढ़ी सिर्फ़ एक व्यंजन नहीं है, ये कई लोगों के लिए कम्फ़र्ट फ़ूड है और तकलीफ़ में सहारे की तरह है. आपके कढ़ी से जुड़े कुछ क़िस्से हों तो हमें ज़रूर भेजिएगा, इस आई डी पर: oye.aflatoon@gmail.com अगली बार जल्द मिलेंगे…

फ़ोटो: पिन्टरेस्ट

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कनुप्रिया गुप्ता

कनुप्रिया गुप्ता

ऐड्वर्टाइज़िंग में मास्टर्स और बैंकिंग में पोस्ट ग्रैजुएट डिप्लोमा लेने वाली कनुप्रिया बतौर पीआर मैनेजर, मार्केटिंग और डिजिटल मीडिया (सोशल मीडिया मैनेजमेंट) काम कर चुकी हैं. उन्होंने विज्ञापन एजेंसी में कॉपी राइटिंग भी की है और बैंकिंग सेक्टर में भी काम कर चुकी हैं. उनके कई आर्टिकल्स व कविताएं कई नामचीन पत्र-पत्रिकाओं में छप चुके हैं. फ़िलहाल वे एक होमस्कूलर बेटे की मां हैं और पैरेंटिंग पर लिखती हैं. इन दिनों खानपान पर लिखी उनकी फ़ेसबुक पोस्ट्स बहुत पसंद की जा रही हैं. Email: guptakanu17@gmail.com

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हर वह शख़्स फिर चाहे वह महिला हो या पुरुष ‘अफ़लातून’ ही है, जो जीवन को अपने शर्तों पर जीने का ख़्वाब देखता है, उसे पूरा करने का जज़्बा रखता है और इसके लिए प्रयास करता है. जीवन की शर्तें आपकी और उन शर्तों पर चलने का हुनर सिखाने वालों की कहानियां ओए अफ़लातून की. जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर, लाइफ़स्टाइल पर हमारी स्टोरीज़ आपको नया नज़रिया और उम्मीद तब तक देती रहेंगी, जब तक कि आप अपने जीवन के ‘अफ़लातून’ न बन जाएं.

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